गुजरात में चांदीपुरा वायरस (CHPV) का प्रकोप लगातार चिंता बढ़ा रहा है। करीब पांच सप्ताह में इस वायरस से 25 बच्चों की मौत हो चुकी है, जबकि राज्य सरकार ने 39 बच्चों के संक्रमित होने की पुष्टि की है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि बड़े पैमाने पर जांच के बावजूद वैज्ञानिक अभी तक यह पता नहीं लगा पाए हैं कि मौजूदा संक्रमण का प्रसार किस वेक्टर या स्रोत से हो रहा है।
30 जून से शुरू हुए इस प्रकोप के बाद गुजरात में बड़े स्तर पर निगरानी और सैंपलिंग अभियान चलाया गया। सबसे पहले सैंडफ्लाई यानी बालू मक्खियों के सैंपल लिए गए, क्योंकि इन्हें चांदीपुरा वायरस का स्थापित वेक्टर माना जाता है। इसके बाद मच्छरों, टिक और माइट्स जैसे अन्य संभावित वाहकों की भी जांच शुरू की गई।
हजारों सैंपल की जांच, फिर भी नहीं मिला वायरस
हालांकि, अब तक एक हजार से अधिक सैंडफ्लाई और दूसरे संभावित वेक्टर के सैंपलों में वायरस की मौजूदगी नहीं मिली है। यही स्थिति 2024 के प्रकोप के दौरान भी सामने आई थी। उस समय 78 बच्चों में चांदीपुरा वायरस जैसे लक्षण पाए गए थे और 28 बच्चों की मौत हुई थी, लेकिन जांच में भी किसी स्पेसिफिक वेक्टर की पहचान नहीं हो सकी थी।
गुजरात के साथ राजस्थान में भी मामले
मौजूदा प्रकोप में चांदीपुरा वायरस से संक्रमित पाए गए मरीज गुजरात के 12 और राजस्थान के 3 जिलों से हैं। गुजरात में पाटन जिले में सबसे ज्यादा 5 मामले सामने आए हैं, जबकि साबरकांठा में 4 मामले दर्ज किए गए हैं।
एक दिलचस्प पहलू यह है कि मरीज अलग-अलग इलाकों में सामने आ रहे हैं और किसी एक स्थान पर मामलों का बड़ा क्लस्टर नहीं मिला है। पशुपालन विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, कई इलाकों में केवल एक-एक मामला सामने आया है। ऐसे में किसी एक जगह बड़ी संख्या में संक्रमित वेक्टर मिलने की संभावना भी कम हो सकती है।
सैंडफ्लाई पर शक, लेकिन जांच में नहीं मिला वायरस
सैंडफ्लाई को चांदीपुरा वायरस का प्रमुख वेक्टर माना जाता है। खासकर गुजरात में 2018 के प्रकोप के दौरान सैंडफ्लाई में वायरस की मौजूदगी के आणविक प्रमाण मिले थे। शोधकर्ताओं ने सर्जेंटोमिया प्रजाति की सैंडफ्लाई को संभावित वेक्टर बताया था।
लेकिन 2026 के मौजूदा प्रकोप में अब तक सैंडफ्लाई के किसी सैंपल में वायरस नहीं मिला है। वैज्ञानिक एडीस एजिप्टी और क्यूलेक्स प्रजाति के मच्छरों को भी संभावित वेक्टर के तौर पर जांच रहे हैं, लेकिन इनके सैंपल भी अभी तक निगेटिव आए हैं।
RT-PCR से कैसे होती है जांच?
वेक्टर से जुटाए गए सैंपलों को प्रयोगशाला में करीब -20 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है। इसके बाद उन्हें क्रश करके उनसे न्यूक्लिक एसिड निकाला जाता है। फिर RT-PCR जांच के जरिए यह पता लगाया जाता है कि सैंपल में चांदीपुरा वायरस मौजूद है या नहीं।
वैज्ञानिकों की मुश्किल यह है कि मरीजों में संक्रमण की पुष्टि हो रही है, लेकिन आसपास मौजूद संभावित वेक्टर में वायरस का पता नहीं चल रहा। इससे संक्रमण के पूरे चक्र को समझना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।
अब पशुओं और दूध के सैंपल भी लिए जा रहे
जांच अब केवल कीट-पतंगों तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक यह भी पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कहीं घरेलू पशु वायरस के संभावित रिजर्वायर यानी ऐसे मेजबान तो नहीं हैं, जिनमें वायरस मौजूद रहकर इंसानों तक पहुंचता है।
इसके लिए प्रभावित इलाकों के मवेशियों, भैंसों और बकरियों के रक्त के सैंपल लिए जा रहे हैं। दूध के नमूनों की भी जांच की जा रही है। अब तक करीब 70 पशुओं के खून का सैंपल एकत्र किए जा चुके हैं और इनमें चांदीपुरा वायरस समेत दूसरे संभावित रोगजनकों की जांच की जा रही है।
टिक और माइट्स की भी जांच
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, वैज्ञानिक अब संभावित संक्रमण चक्र को समझने के लिए सैंडफ्लाई के अलावा मच्छरों, टिक और माइट्स समेत दूसरे आर्थ्रोपोड्स की भूमिका भी जांच रहे हैं।
सरकार का कहना है कि वैज्ञानिक जांच पूरी होने से पहले किसी एक वेक्टर को मौजूदा प्रकोप के लिए जिम्मेदार बताना जल्दबाजी होगी। 2024 के प्रकोप की जांच में भी किसी एक स्पेसिफिक वेक्टर की पहचान नहीं हो पाई थी।

एक्सपर्ट ने बताई निगरानी की बड़ी कमी
इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी (ICGEB) की वेक्टर-बोर्न डिजीज एक्सपर्ट डॉ. सुजाता सुनील ने निगरानी के समय और उसके दायरे को महत्वपूर्ण बताया है। उनके मुताबिक, केवल प्रकोप के दौरान वेक्टर की तलाश करना पर्याप्त नहीं हो सकता।
उनका कहना है कि शोधकर्ताओं को संभावित सभी वेक्टर और पशु रिजर्वायर पर नजर रखनी होगी। खासतौर पर उन इलाकों में लगातार निगरानी जरूरी है, जहां पहले संक्रमण के मामले सामने आ चुके हैं।
जून से अगस्त तक लगातार निगरानी की जरूरत
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, वेक्टर की संख्या और वायरस के संक्रमण की दर को देखते हुए सैंपलिंग सामान्य मच्छरजनित बीमारियों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक होनी चाहिए। केवल सैकड़ों सैंडफ्लाई या मच्छरों के सैंपल की जांच से वायरस का स्रोत मिलना मुश्किल हो सकता है।
डॉ. सुजाता के अनुसार, निगरानी केवल उस समय नहीं होनी चाहिए जब बीमारी का प्रकोप सामने आए। जून से अगस्त तक संभावित हॉटस्पॉट इलाकों में रेगुलर और ठोस निगरानी की जानी चाहिए, चाहे उस समय कोई नया मामला सामने आया हो या नहीं। इससे वायरस के नेचुरल साइकिल और उसके संभावित वेक्टर का पता लगाने की संभावना बढ़ सकती है।
बच्चों के लिए क्यों खतरनाक है चांदीपुरा वायरस?
चांदीपुरा वायरस मुख्य रूप से 15 साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करता है। संक्रमण गंभीर स्थिति में एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) का कारण बन सकता है। इसमें दिमाग में सूजन जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति पैदा हो सकती है और बीमारी तेजी से जानलेवा रूप ले सकती है।
1965 में हुई थी वायरस की पहली पहचान
चांदीपुरा वायरस की पहचान पहली बार 1965 में महाराष्ट्र के नागपुर के पास स्थित चांदीपुरा गांव में हुई थी। इसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर इसके प्रकोप सामने आते रहे हैं।
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अदालत ने माना कि हत्या हुई, लोगों को चोटें आईं और बड़ी संख्या में हिंसा भी हुई। लेकिन किसी भी हत्यारे को दोषी नहीं ठहराया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि उस दिन उन छह लोगों को आखिर किसने मारा? पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
