भारत दुनिया में सबसे अधिक बाघों वाला देश है और बाघ संरक्षण की सफलता का माडल भी माना जाता है। लेकिन राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की एक ताजा समीक्षा रिपोर्ट ने इस सफलता के पीछे छिपी सबसे बड़ी चुनौती को सामने ला दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक देश के बाघ अभयारण्यों के ‘क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट’ के भीतर अब भी 742 गांव और 97,786 परिवार रह रहे हैं। यानी जिन क्षेत्रों को बाघों के लिए पूरी तरह निर्बाध और सुरक्षित आवास माना जाता है, वहां आज भी बड़ी संख्या में मानवीय गतिविधियां जारी हैं।
एनटीसीए क्या कहता है?
एनटीसीए ने माना है कि यदि बाघ संरक्षण को अगले स्तर तक ले जाना है तो स्वैच्छिक गांव पुनर्वास कार्यक्रम को तेज करना होगा और इसके लिए राज्यों को वित्तीय, प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी। एनटीसीए द्वारा देश के सभी बाघ अभयारण्यों से जुटाई गई जानकारी के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट बताती है कि पिछले वर्षों में जिन बाघ अभयारण्यों में गांवों का स्वैच्छिक पुनर्वास हुआ है, वहां बाघों और अन्य वन्यजीवों के लिए बेहतर और निर्बाध आवास विकसित हुए हैं। इसके बावजूद सैकड़ों गांव अभी भी कोर क्षेत्र में मौजूद हैं।
रिपोर्ट के अनुसार इन गांवों के कारण कई स्थानों पर मानव-वन्यजीव संघर्ष, संसाधनों पर दबाव और आवास विखंडन जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। इसलिए स्वैच्छिक पुनर्वास कार्यक्रम को पर्याप्त बजटीय सहायता, विभिन्न विभागों के समन्वय और स्थानीय समुदायों के विश्वास के साथ आगे बढ़ाने की जरूरत है।
रिपोर्ट इस बात पर भी जोर देती है कि पुनर्वास केवल गांव हटाने का कार्यक्रम नहीं होना चाहिए, बल्कि विस्थापित परिवारों के लिए बेहतर आवास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की भी समान रूप से व्यवस्था होनी चाहिए। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि बाघ अभयारण्यों के चारों ओर सुरक्षा कवच माने जाने वाले ‘इको-सेंसिटिव जोन’ (ईएसजेड) की प्रक्रिया भी अभी अधूरी है। देश के 58 बाघ अभयारण्यों में से केवल 29 में ही ईएसजेड की अधिसूचना पूरी हो सकी है, जबकि शेष 29 अभयारण्यों में यह प्रक्रिया प्रस्ताव, प्रारूप अधिसूचना, जनसुनवाई या परीक्षण के विभिन्न चरणों में अटकी हुई है। एनटीसीए ने राज्य सरकारों से इन प्रस्तावों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने को कहा है, क्योंकि ईएसजेड बाघों के प्राकृतिक गलियारों और आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को अनियंत्रित विकास गतिविधियों से बचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
रिपोर्ट ने वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की स्थिति पर भी ध्यान खींचा है। आंकड़ों के अनुसार 32 बाघ अभयारण्यों में वन अधिकार संबंधी दावों का निपटारा हो चुका है, जबकि 26 अभयारण्यों में आवेदन अब भी लंबित हैं। एनटीसीए ने कहा है कि इन दावों का समयबद्ध निपटारा जरूरी है ताकि संरक्षण और स्थानीय समुदायों के कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे। इसके लिए वन विभाग, राजस्व विभाग और जिला स्तरीय समितियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई गई है। रिपोर्ट का एक और महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि बाघ संरक्षण केवल सरकारी एजंसियों के भरोसे नहीं चल सकता। स्थानीय समुदायों की भागीदारी इसके लिए अनिवार्य है।
हालांकि, समीक्षा में पाया गया कि नागार्जुनसागर-श्रीशैलम, नामदाफा, गुरु घासीदास-तमोर पिंगला, पेंच (मध्य प्रदेश), संजय-दुबरी, माधव और धौलपुर-करौली बाघ अभयारण्यों में स्वयं सहायता समूह, ‘ईको-डेवलपमेंट कमेटी’ या गांव जंगल समिति जैसी संस्थाएं सक्रिय नहीं हैं। रिपोर्ट में इन संस्थाओं को मजबूत करने की सिफारिश की गई है ताकि स्थानीय लोगों की आय बढ़ाने के साथ-साथ संरक्षण कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी भी सुनिश्चित हो सके।
एनटीसीए ने यह भी माना है कि संरक्षण की शुरुआत स्कूलों से होनी चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई बाघ रिजर्व क्षेत्रों में केंद्रीय विद्यालय और जवाहर नवोदय विद्यालय जैसी संस्थाओं की पहुंच सीमित है। जहां ये विद्यालय मौजूद हैं, वहां पर्यावरण शिक्षा, जैव विविधता, वनस्पति विज्ञान और प्राणी विज्ञान को स्थानीय संरक्षण गतिविधियों से जोड़ा जाना चाहिए। ‘टाइगर कंजर्वेशन फाउंडेशन’ के माध्यम से प्रकृति शिविर, जैव विविधता भ्रमण, ईको-क्लब और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने की भी सिफारिश की गई है।
‘ग्रीन क्रेडिट’ क्या कहा?
रिपोर्ट में ‘ग्रीन क्रेडिट’ कार्यक्रम को भी बाघ अभयारण्यों के आसपास के क्षेत्रों में पारिस्थितिक पुनर्स्थापन का बड़ा अवसर बताया गया है। 26 बाघ अभयारण्यों ने ऐसे क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों की पहचान कर ली है, जहां इस योजना के तहत काम शुरू किया जा सकता है, जबकि 31 अभयारण्यों को अभी उपयुक्त भूमि चिह्नित करनी है। एनटीसीए ने स्पष्ट किया है कि यह कार्यक्रम केवल संरक्षित क्षेत्रों की अधिसूचित सीमा के बाहर ही लागू होगा।
आधारभूत संरचना परियोजनाओं और रेलवे लाइनों को भी रिपोर्ट में चिंता का विषय बताया गया है। अधिकांश परियोजनाओं में वन्यजीवों के लिए शमन उपाय शामिल किए गए हैं, लेकिन उनकी नियमित निगरानी जरूरी बताई गई है। वहीं, जिन क्षेत्रों से रेलवे लाइनें गुजरती हैं, वहां गति नियंत्रण, बाड़बंदी, वन्यजीव मार्ग, चेतावनी प्रणाली, ‘एलीफेंट इंट्रूजन डिटेक्शन सिस्टम’ और ‘एंटी-कोलिजन डिवाइस’ जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग का सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश बाघ अभयारण्यों में आक्रामक पौधों की प्रजातियां भी तेजी से फैल रही हैं, जिससे प्राकृतिक घासभूमि और स्थानीय जैव विविधता प्रभावित हो रही है। इनके नियमित सर्वेक्षण, मानचित्रण और वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रण की जरूरत बताई गई है।
एनटीसीए ने यह भी सिफारिश की है कि सभी बाघ अभयारण्यों में एक समान रिपोर्टिंग प्रणाली विकसित की जाए, ताकि संरक्षण कार्यों की तुलना, निगरानी और मूल्यांकन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके। रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है कि भारत में बाघ संरक्षण की अगली लड़ाई केवल शिकार रोकने की नहीं, बल्कि बाघों के आवास को मानवीय दबाव से मुक्त करने, स्थानीय समुदायों को संरक्षण का भागीदार बनाने और वैज्ञानिक प्रबंधन को मजबूत करने की है।
एनटीसीए रिपोर्ट में संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती उजागर। रिपोर्ट के मुताबिक देश के बाघ अभयारण्यों के ‘क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट’ के भीतर अब भी सैंकड़ों परिवार रह रहे हैं। यानी जिन क्षेत्रों को बाघों के लिए पूरी तरह निर्बाध और सुरक्षित आवास माना जाता है, वहां आज भी बड़ी संख्या में मानवीय गतिविधियां जारी हैं। एनटीसीए ने माना है कि यदि बाघ संरक्षण को अगले स्तर तक ले जाना है तो स्वैच्छिक गांव पुनर्वास कार्यक्रम को तेज करना होगा।
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