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वित्तीय और मौद्रिक नीति के साथ विकास व महंगाई की चुनौती

वर्ष 2022 में आर्थिक उत्पाद का अनुमानित आंकड़ा 3.2 फीसद है, जिसे 2023 में घटकर 2.9 फीसद होने की संभावना है।

वित्तीय और मौद्रिक नीति के साथ विकास व महंगाई की चुनौती
सांकेतिक फोटो।

भारत दीर्घकालिक रूप से निम्न रोजगार, ऊंचे वित्तीय घाटे (वित्तीय वर्ष 2022-23 में लक्षित 6.4 फीसद बनाम सकल घरेलु उत्पाद के चार फीसद के स्तर पर रहने का मानक), निम्न निजी पूंजी निवेश और महामारी के बाद के कालखंड में सुस्त आर्थिक उभार से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है। स्थिर दरों पर भारत की जीडीपी, महामारी से पूर्व के स्तरों (वित्त वर्ष 2019-20) को इस वित्तीय वर्ष के अंत तक ही हासिल कर सकेगी।

वर्ष 2022-23 में महंगाई के 6.7 फीसद रहने का अनुमान है, जो चार फीसद के स्वीकार्य मानक से ऊपर है। भारत की प्रति व्यक्ति आय अमेरिका और यूरोपीय संघ की प्रति व्यक्ति आय का क्रमश: 10 फीसद और 15 फीसद है। प्रति व्यक्ति आय का निम्न स्तर आर्थिक झटकों से निपटने के लिए जरूरी व्यक्तिगत लोच में भारी कमी ला देता है।

आय सहायता और वित्तीय दबाव

महामारी की आमद के बाद से केंद्र और राज्य की सरकारें एक विशाल आबादी को प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण की सुविधा मुहैया करवा रही हैं। इनमें सात करोड़ किसान शामिल हैं। दूसरी ओर, भोजन के अधिकार कानून के जरिए 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज और दलहन दिए जा रहे हैं। आय सहायता मुहैया कराने के लिए ग्रामीण कार्यों से जुड़े कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा खाद के फुटकर भाव को स्थिर कर दिया गया है। खुदरा कीमतों में कमी लाने के मकसद से र्इंधन पर उत्पाद करों में कटौती कर दी गई। महंगाई के चलते कर राजस्व में आंशिक बढ़ोतरी के बावजूद ऊपर के तमाम उपायों से वित्तीय मोर्चे पर दबाव पड़ा है।

वैश्विक परिदृश्य

वैश्विक आर्थिक परिदृश्य अनिश्चित है। वर्ष 2022 में आर्थिक उत्पाद का अनुमानित आंकड़ा 3.2 फीसद है, जिसके 2023 में घटकर 2.9 फीसद हो जाने का अंदेशा है। न्यूनतम रूप से इन दोनों ही आंकड़ों के क्रमश: 2.6 फीसद और दो फीसद तक चले जाने की संभावना है। यूक्रेन से खाद्य निर्यातों के बहाल होने और यूक्रेन और रूस में सैन्य क्षमता का पुनर्संतुलन हो जाने से टकराव की जगह कूटनीतिक कवायदों की ओर रुझान होता दिखाई दे रहा है।

घरेलू मोर्चे पर देखें तो वास्तविक नियंत्रण रेखा पर मौजूद टकराव बिंदुओं पर भारत और चीनी सेना के बीच लगातार कम होता तनाव परिपक्व कूटनीति का संकेत दे रहा है। इसका असर अर्थव्यवस्था पर दिख सकता है। हम अगले पांच साल में छह फीसद से भी ज्यादा रफ्तार वाले तेज विकास के दौर की उम्मीद कर सकते हैं, जबकि इसी कालखंड में वैश्विक वृद्धि दर के लगभग तीन फीसद रहने का अनुमान लगाया गया है।

विकास और महंगाई

महंगाई पर नकेल कसने के मकसद से रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में की गई बढ़ोतरी और विकास को बढ़ावा देने वाले खुदरा ब्याज दर के स्तरों में सामंजस्य कैसे बने। हाल ही में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारतीय संदर्भ में एकाकी रूप से संचालित मौद्रिक नीति, महंगाई पर नकेल कसने के लिहाज से एक बेअसर औजार साबित हो सकती है।

जानकारों की राय में भारत में वित्तीय संकेतकों के हिसाब से ब्याज दरों में बदलाव की रफ्तार सुस्त रहती है। मिसाल के तौर पर वर्ष 2015 से 2019 के बीच महंगाई दर छह फीसद (मानक बाहरी सीमा) से नीचे थी और दो साल के दौरान तो चार फीसद के मानक से भी नीचे थी। रेपो रेट को आठ फीसद (अप्रैल 2014) से सात फीसद (अप्रैल 2016) तक आने में दो साल लग गए। यह दर अप्रैल 2019 तक छह फीसद से ऊपर बना रहा।

गैर-मौद्रिक व्यवस्था पर जोर

वित्त मंत्री ने महंगाई पर लगाम लगाने के लिए गैर-मौद्रिक नीतिगत व्यवस्था के प्रयोग की वकालत की है। हालांकि, अभी महंगाई को बढ़ावा देने वाली वस्तुओं (जैसे पेट्रोलियम) पर कर वसूलने के मामले में केंद्र और तमाम राज्य सरकारों के बीच तालमेल का अभाव है। मौजूदा व्यवस्था कर उगाही को हवा दे रही है। इस सिलसिले में तालमेल हासिल करने का एक कार्यकुशल तरीका है- पेट्रोलियम को जीएसटी के दायरे में लाना।

चालू खाते के घाटे से जुड़े गैर-मौद्रिक नीतिगत पहलों (जिसमें वित्तीय घाटे को कम करना शामिल है) से रिजर्व बैंक को अपनी ब्याज दर नीति सटीक रूप से तैयार करने में मदद मिलेगी। यह ध्यान रखना होगा कि मौद्रिक नीति के तहत खुदरा ब्याज दरों का असर एक लंबी मियाद में ही दिखाई देता है, जबकि निवेशकों की धारणाओं का तात्कालिक असर होता है।

रुपए के भाव में गिरावट

भारतीय रिजर्व बैंक की दरों को निर्णायक रूप से घटाने से परहेज करने की नीति के पीछे भारत में महंगाई के ऊंचे स्तरों से मुकाबले के लिए रक्षा-कवच बरकरार रखने की जरूरत और विदेशी निवेशकों की जोखिम धारणाओं से निपटने की सोच काम करती है। विदेशी निवेशकों की विदाई से मुद्रा के भाव में भारी उतार आ सकता है। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के वाणिज्यिक बैंकों के कोष इकट्ठा करने की लागत और उनके द्वारा बांटे जाने वाले ऋणों से कमाई जाने वाली ब्याज के बीच का अंतर कम करने की कवायद अब भी अधूरी है।

क्या कहते हैं जानकार

पूरी दुनिया में ब्याज दरों में जल्दबाजी में बढ़ोतरी हो रही है। भारत को इसकी नकल से परहेज करना चाहिए, क्योंकि इससे महामारी के बाद पटरी पर लौटती अर्थव्यवस्था पर सीधा दुष्प्रभाव पड़ सकता है।

  • बिमल जालान, पूर्व गवर्नर, आरबीआइ

आर्थिक नीति-निर्माताओं को अक्सर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। दरअसल, वे वैकल्पिक समाधानों के बीच सामंजस्य बिठाते हैं, लेकिन इनमें से कुछ ही समाधान हर मायने में लाभदायक होते हैं।

  • संजीव सान्याल, अर्थशास्त्री

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First published on: 27-09-2022 at 01:48:59 am
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