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न्यायपालिका पर नहीं डाल सकते केसों का बोझ, चीफ जस्टिस ने जताया केंद्र की निष्क्रियता पर अफसोस

सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर रविवार को एक सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में भावुक हो गए।

न्यायपालिका पर नहीं डाल सकते केसों का बोझ, चीफ जस्टिस ने जताया केंद्र की निष्क्रियता पर अफसोस
सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर

सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर रविवार को एक सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में भावुक हो गए। मुकदमों की भारी बाढ़ से निपटने के लिए न्यायाधीशों की संख्या को मौजूदा 21 हजार से 40 हजार किए जाने की दिशा में सरकार की निष्क्रियता पर अफसोस जताते हुए उन्होंने कहा- आप सारा बोझ न्यायपालिका पर नहीं डाल सकते। बेहद भावुक नजर आ रहे न्यायमूर्ति ठाकुर ने नम आंखों से कहा कि 1987 में विधि आयोग ने न्यायाधीशों की संख्या प्रति 10 लाख लोगों पर 10 से बढ़ाकर 50 करने की सिफारिश की थी, लेकिन तब से लेकर अब तक इस पर कुछ नहीं हुआ।

मुख्यमंत्रियों व हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा कि इसके बाद सरकार की अकर्मण्यता नजर आती है क्योंकि न्यायाधीशों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हुई। प्रधान न्यायाधीश जब ये बातें कह रहे थे, उस समय उन्हें अपने आंसू पोंछते देखा जा सकता था। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां मौजूद थे और पूरी गंभीरता से उनकी बातें सुन रहे थे। उन्होंने आगे कहा- और इसलिए यह मुकदमा लड़ रहे लोगों या जेलों में बंद लोगों के नाम पर नहीं है, बल्कि देश के विकास के लिए भी है। इसकी तरक्की के लिए मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करता हूं कि इस स्थिति को समझें और महसूस करें कि केवल आलोचना करना काफी नहीं है। आप सारा बोझ न्यायपालिका पर नहीं डाल सकते।

बाद में सम्मेलन में हुई चर्चा के मुद्दे पर एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने माना कि भावुक होना उनकी कमजोरी है। किसी को भावुक नहीं होना चाहिए। न्यायमूर्ति खेहर, जो अगले प्रधान न्यायाधीश बन सकते हैं, एक मजबूत शख्स हैं। वे भावुक नहीं होंगे।

विधि मंत्रालय के तय कार्यक्रम के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी को सम्मेलन में बोलना नहीं था, इसके बाद भी मोदी ने कहा- मैं उनका (प्रधान न्यायाधीश) दर्द समझ सकता हूं क्योंकि 1987 के बाद से अब तक काफी समय बीत चुका है। चाहे जो भी मजबूरियां रही हों, लेकिन कभी नहीं से बेहतर है कि यह कुछ देर से ही हो। हम भविष्य में बेहतर करेंगे। आइए, देखें कि अतीत का बोझ कम करने के लिए कैसे आगे बढ़ा जा सकता है।

प्रधानमंत्री ने कहा- अगर संवैधानिक सीमाएं कोई समस्या पैदा नहीं करें तो शीर्ष मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश एक साथ बैठकर इस मुद्दे का कोई समाधान निकाल सकते हैं। मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर ऐसे ही एक सम्मेलन में भाग लेने की घटना को याद करते हुए कहा कि उन्होंने उस समय अदालतों में छुट्टियां कम करने और सुबह व शाम अदालतें लगाने का सुझाव दिया था। लेकिन सम्मेलन में भोजनावकाश के दौरान कुछ न्यायाधीशों ने उनके इस विचार पर सवाल उठा दिए थे।

न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा कि विधि आयोग की सिफारिशों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में न्यायपालिका की संख्या बढ़ाने का समर्थन किया था। प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाली विधि विभाग संबंधी संसद की एक स्थाई समिति ने भी न्यायाधीशों की संख्या और आबादी के अनुपात को 10 से बढ़ाकर 50 करने की सिफारिश की थी। प्रधान न्यायाधीश ने धन के आबंटन, बुनियादी संरचना और अन्य मुद्दोंं पर केंद्र व राज्यों के बीच चलने वाली रस्साकशी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस समय लोगों और न्यायाधीशों के अनुपात की बात करें तो यह प्रति दस लाख लोगों पर 15 है। उन्होंने कहा कि भारत में एक मुंसिफ से लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश तक हर साल औसतन 2,600 मामले निपटाते हैं जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा प्रति वर्ष 81 है।

भावुकता मेरी कमजोरी
’न्यायामूर्ति ठाकुर के मुताबिक इस समय भारत में प्रति दस लाख लोगों पर 15 न्यायाधीश हैं। भारत में एक मुंसिफ से लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश तक हर साल औसतन 2,600 मामले निपटाते हैं जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा प्रति वर्ष 81 है।
’बाद में सम्मेलन में हुई चर्चा के मुद्दे पर एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने माना कि भावुक होना उनकी कमजोरी है। किसी को भावुक नहीं होना चाहिए। न्यायमूर्ति खेहर, जो अगले प्रधान न्यायाधीश बन सकते हैं, एक मजबूत शख्स हैं। वे भावुक नहीं होंगे।

मैं उनका दर्द समझ सकता हूं

विधि मंत्रालय के तय कार्यक्रम के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी को सम्मेलन में बोलना नहीं था, इसके बाद भी मोदी ने कहा- मैं उनका (प्रधान न्यायाधीश) दर्द समझ सकता हूं क्योंकि 1987 के बाद से अब तक काफी समय बीत चुका है। चाहे जो भी मजबूरियां रही हों, लेकिन कभी नहीं से बेहतर है कि यह कुछ देर से ही हो। हम भविष्य में बेहतर करेंगे। आइए, देखें कि अतीत का बोझ कम करने के लिए कैसे आगे बढ़ा जा सकता है।

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First published on: 25-04-2016 at 12:47:49 am