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मरकज़ मामले में मीडिया रिपोर्टिंग का केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में किया बचाव, पर महाराष्ट्र सरकार ने कोरोना रिपोर्टिंग पर कई पत्रकारों पर किया केस

केंद्र ने कहा कि पूरे मीडिया के खिलाफ एक समग्र आदेश लेने का प्रयास… देश में समाज के संबंधित वर्गों के मामलों के बारे में जानने के लिए नागरिक की स्वतंत्रता अधिकार और सूचित समाज सुनिश्चित करने पत्रकार के अधिकार को प्रभावी ढंग से नष्ट कर देगा।

COVID-19, centre govt, Nizamuddin Markaz,याचिका पर सुनवाई के दौरान मरकज में भाग लेने वालों के जरिये कोरोना के प्रसार की रिपोर्टों को अपवाद माना गया। (फाइल फोटो)

केंद्र सरकार ने मरकज मामले में मीडिया रिपोर्टिंग का सुप्रीम कोर्ट में बचाव किया है। सुप्रीम कोर्ट में निजामुद्दीन मरकज मुद्दे पर घृणा फैलाने वाली मीडिया रिपोर्टों के खिलाफ कार्रवाई के लिए जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की याचिका पर सुनवाई चल रही थी। सुनवाई के दौरान केंद्र ने तथ्यों और नागरिकों की जानकारी प्राप्त करने की स्वतंत्रता के लिए मीडिया के अधिकार का बचाव किया।

केंद्र ने कहा कि पूरे मीडिया के खिलाफ एक समग्र आदेश लेने का प्रयास… देश में समाज के संबंधित वर्गों के मामलों के बारे में जानने के लिए नागरिक की स्वतंत्रता अधिकार और सूचित समाज सुनिश्चित करने पत्रकार के अधिकार को प्रभावी ढंग से नष्ट कर देगा। लॉकडाउन के दौरान मरकज में लोगों में शामिल होने वालों से कोरोना फैलने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं पर हमले आदि की रिपोर्ट को छोड़कर, केंद्र ने कहा कि वे (रिपोर्ट्स) “न तो झूठे हैं और न ही फर्जी … हालांकि अलग-अलग मामलों में यह अतिरंजित हो सकते हैं।

केंद्र ने फैक्ट चेक पोर्टलों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया, जिनकी रिपोर्ट को जमीयत की याचिका का आधार बनाया था। केंद्र ने कहा कि वे अनियमित वेबसाइट हैं और ज्यादातर धारणा, अनुमान पर आधारित हैं।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 6 अप्रैल सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सरकार और मीडिया को यह निर्देश देने की मांग की थी कि निजामुद्दीन मरकरज कार्यक्रम के कारण कोरोना फैलाने के लिए समूचे मुस्लिम समाज को गलत रूप से चित्रित ना किया जाए।

इस बीच देश में कई राज्यों ने कोरोना से जुड़ी गलत खबरों के जरिए फैल रहे डर को खत्म करने के लिए प्रावधान भी बनाए हैं। वहीं, महाराष्ट्र सरकार ने तो कोरोना के इलाज में कमियां उजागर करने वाले पत्रकारों की ही आवाजें दबानी शुरू कर दी है।

अब तक 15 ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जहां महाराष्ट्र सरकार ने अपने खिलाफ खबर प्रकाशित या ऑनएयर करने वाले  प्रिंट, टीवी और ऑनलाइन पोर्टल के पत्रकारों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज कराए हैं। वह भी लॉकडाउन के पहले महीने यानी मार्च में ही।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार करीब दर्जनभर पत्रकारों को नोटिस भेजकर जवाब भी मांगा गया है। कुछ अन्य केसों में पत्रकारों पर मानहानि तक के केस किए गए हैं, जिनमें लाखों रुपए के हर्जाने की मांग की गई। इसके अलावा एक ही रिपोर्टर या संपादक के खिलाफ एक से ज्यादा केस भी दर्ज किए गए हैं।

इन सब मामलों में जो एक बात सामान्य रही है, वह यह है कि सभी की रिपोर्ट्स राज्य में कोरोना के हालात पर थीं। मार्च से ही पुलिस ने अब तक लॉकडाउन के नियम तोड़ने के लिए 1.3 लाख केस दर्ज किए हैं और करीब 28 हजार लोग जेल भेजे जा चुके हैं। इसके बावजूद राज्य में संक्रमितों की संख्या अब 5 लाख के करीब पहुंच चुकी है, जबकि 16,792 लोगों की जान भी गई है।

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