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विवाहेत्‍तर संबंधों के लिए महिला भी हो जिम्‍मेदार, सुप्रीम कोर्ट में याचिका का केंद्र ने किया विरोध

याचिका में ये कहा गया है कि विवाहेत्तर संबंध में पुरुष और महिला को बराबर का दोषी माना जाए। इंडियन पीनल कोड की धारा 497 के तहत दोषी उस पुरुष को ही माना जाता है, जिसने किसी महिला से यौन संबंध बनाए हों, जो उसकी पत्नी नहीं है।

भारत की सुप्रीम कोर्ट का विहंगम नजारा। Express photo by Abhinav Saha.

केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करके एक याचिका का विरोध किया है। याचिका में ये कहा गया है कि विवाहेत्तर संबंध के मामले में पुरुष और महिला को बराबर का दोषी माना जाए, जो वर्तमान में नहीं है। वर्तमान में इंडियन पीनल कोड की धारा 497 के तहत इस अपराध का दोषी उस पुरुष को ही माना जाता है, जिसने किसी ऐसी महिला से यौन संबंध बनाए हों, जो उसकी पत्नी नहीं है।

केंद्र ने दायर किया हलफनामा: केंद्र सरकार ने कहा, धारा 497 को शादी की पवित्रता को बरकरार रखने के लिए अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए। इसे यदि किसी भी प्रकार से कमजोर किया जाता है तो ये विवाह संबंधों के लिए घातक होगी। पिछले साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड विधान के 157 साल पुराने लैंगिक असमानता नियम पर सुनवाई के लिए हामी भरी थी। अभी तक इस ​कानून में किसी दूसरे की पत्नी के साथ विवाहेत्तर संबंधों को रखने पर सिर्फ पुरुष को ही दोषी माना जाता है।

इन्होंने दायर की है याचिका: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की अदालत ने केन्द्र सरकार से इस याचिका पर चार हफ्तों में अपना मत साफ करने के लिए कहा था। ये जनहित याचिका केरल के रहने वाले जोसफ शाइन ने दायर की है। जोसफ वर्तमान में इटली के ट्रेंटो में कार्यरत हैं। याचिका में कहा गया था कि आखिर क्यों सिर्फ विवाहित पुरुष को इन संबंधों के लिए जिम्मेदार माना जाता है? उसके साथ अपराध में बराबर की भागी होने के बावजूद किसी दूसरे की पत्नी को अपराधी नहीं समझा जाता है?

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बराबर के अपराध में सिर्फ पुरुष दोषी क्यों?: जिस बात पर सुप्रीम कोर्ट इस नियम की संवैधानिक वैधता के परीक्षण के लिए तैयार हुआ है, संभवत: वह यही बिंदू है जिसमें ये कहा गया है कि क्या विवाहेत्तर संबंधों में बराबर की जिम्मेदार महिला को क्लीन चिट दी जा सकती है? यही बात याचिकाकर्ता के वकील कलीश्वरम राज ने अपनी बहस में कही। उन्होंने तर्क दिया कि धारा 497 के तहत अपराध नहीं माना जाता है अगर अनैतिक संबंध किसी व्‍यस्‍क अविवाहित पुरुष और व्‍यस्‍क अविवाहित महिला के बीच बने हों। अगर यौन संबंध किसी अविवाहित पुरुष और विवाहित महिला के बीच बनें हों या फिर विवाहित पुरुष और अविवाहित महिला के बीच बने हों, दोनों ही स्थितियों में धारा 497 के तहत इसे अपराध नहीं माना  जाता है।

क्या कहता है नियम: धारा 497 कहती है,”जो भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के साथ यौन संभोग करता है और जिसे वह जानता है या उस व्यक्ति की सहमति या असहमति के बिना किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी होने का विश्वास करने के कारण है, ऐसे यौन संबंध में बलात्कार के अपराध की मात्रा नहीं है, वह व्यभिचार के अपराध का दोषी है, उसे किसी भी अवधि के लिए कारावास के साथ दंडित किया जाएगा जो कि पांच साल तक, या जुर्माना या दोनों हो सकता है। ऐसे मामले में पत्नी को अबोध के रूप में दंडित नहीं किया जाएगा।”

क्या कहा है कोर्ट ने: सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा,”प्रथम दृष्टया, भारतीय दंड विधान की धारा 497 का अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि ये कानून महिला से पीड़िता की तरह व्यवहार करके उसे राहत देता है। ये बात भी गौर करने लायक है कि जब अपराध दोनों ने मिलकर किया है, तो एक को आपराधिक मामले का दोषी मान लिया जाता है जबकि दूसरे को छोड़ दिया जाता है। ऐसा लगता है कि ये कानून सामाजिक अनुमानों के आधार पर व्यवहार करता है।”

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