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गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कहा- सुरक्षा के लिए खतरा हैं रोहिंग्या

गृह मंत्रालय ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के साथ वे तमाम खुफिया सूचनाएं साझा करना चाहता है, जिससे पता चलता है कि रोहिंग्या शरणार्थियों के संपर्क पाकिस्तान पोषित आतंकवादी संगठनों के साथ हैं।

Author नई दिल्ली | September 19, 2017 1:55 AM
Rohingya Muslims Crisis: ज्यादातर रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश, भारत, इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड में शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं। (Source: AP)

केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि रोहिंग्या मुसलिम शरणार्थी देश में अवैध रूप से रह रहे हैं और उनका यहां रहना राष्ट्र की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को इस मामले में हलफनामा दाखिल कर कहा कि सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही देश के किसी भी हिस्से में रहने का मौलिक अधिकार है और गैरकानूनी शरणार्थी इस अधिकार के लिए सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
गृह मंत्रालय ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के साथ वे तमाम खुफिया सूचनाएं साझा करना चाहता है, जिससे पता चलता है कि रोहिंग्या शरणार्थियों के संपर्क पाकिस्तान पोषित आतंकवादी संगठनों के साथ हैं।

गृह मंत्रालय की ओर से अतिरिक्त महान्यायवादी तुषार मेहता ने सोमवार सुबह ही प्रधान न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड के तीन सदस्यीय खंडपीठ को सूचित किया कि इस मामले में सरकार हलफनामा दाखिल करेगी। पीठ ने मेहता के कथन पर विचार के बाद रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजे जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई तीन अक्तूबर के लिए स्थगित कर दी। दो रोहिंग्या मुसलिमों- मोहम्मद सलीमुल्ला और मोहम्मद शाकिर ने जनहित याचिका दाखिल की थी।

हलफनामे में गृह मंत्रालय ने कहा, ‘संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रदत्त संवैधानिक अधिकारों से स्पष्ट है कि भारत की सीमा के किसी भी हिस्से में रहने व बसने और देश में स्वतंत्र रूप से कहीं भी आने जाने का अधिकार सिर्फ भारत के नागरिकों को ही उपलब्ध है। कोई भी गैरकानूनी शरणार्थी इस अदालत से मौलिक अधिकारों का दावा करते हुए अनुरोध नहीं कर सकता।’ केंद्र ने कहा कि रोहिंग्या शरणार्थी गैरकानूनी हैं और उनका यहां लगातार रहना देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। साथ ही केंद्र ने कहा कि वह इस मामले में विभिन्न सुरक्षा एजंसियों द्वारा इकट्ठा की गई जानकारियों का ब्योरा  सीलबंद लिफाफे में पेश कर सकता है।  अदालत में केंद्र ने कहा कि चूंकि भारत ने 1951 की शरणार्थियों के दर्जे से संबंधित संधि और 1967 के शरणार्थियों के दर्ज से संबंधित प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए याची इस मामले में इनका सहारा नहीं ले सकते हैं। केंद्र के अनुसार इन्हें वापस भेजने पर प्रतिबंध संबंधी प्रावधान की जिम्मेदारी 1951 की संधि के तहत आती है। यह जिम्मेदारी सिर्फ उन्हीं देशों के लिए बाध्यकारी है जो इस संधि के पक्षकार हैं।

अदालत ने इस याचिका पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को नोटिस जारी नहीं किया जिसके पास पहले से ही यह मामला है। आयोग ने केंद्र को 18 अगस्त को नोटिस जारी किया था।अदालत में दाखिल जनहित याचिका में दावा किया गया है कि वे संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थियों के उच्चायोग के तहत पंजीकृत शरणार्थी हैं और उनके समुदाय के प्रति बडेÞ पैमाने पर भेदभाव, हिंसा और खूनखराबे की वजह से म्यांमा से भागने के बाद उन्होंने भारत में शरण ली है। याचिका में कहा गया है कि म्यांमा की सेना के अत्याचार की वजह से इस समुदाय के लोगों ने म्यांमा के पश्चिम रखाइन प्रांत से पलायन कर भारत और बांग्लादेश में पनाह ली है। भारत आने वाले रोहिंग्या मुसलिम जम्मू, हैदराबाद, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली- राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र व राजस्थान में रह रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की पहचान पत्र वाले 14 हजार रोहिंग्या भारत में रह रहे हैं। अवैध रूप से घुस आने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या 40 हजार से ज्यादा बताई जाती है।

 

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