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जीएसटी : केंद्र-राज्य की खींचतान, मुआवजा भरपाई पर कैसे टले टकराहट

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में चलने वाली पांच घंटे की जीएसटी परिषद की बैठक में हालांकि दर में वृद्धि के मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई। इसके बावजूद कुछ वस्तुओं पर अधिक मुआवजा उपकर या अधिक उत्पादों को शामिल करने की बात से इनकार नहीं किया गया।

जीएसटी काउंसिल की बैठक (ऊपर) तथा प. बंगाल के वित्तमंत्री अमित मित्रा और पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग।

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की हाल में हुई बैठक में राजस्व मुआवजा भरपाई को लेकर राज्यों ने केंद्र सरकार पर जबरदस्त दबाव बनाया। इस मुद्दे पर बुलाई गई जीएसटी परिषद की बैठक में केंद्र ने राज्यों को दो विकल्प दिए। पहला, रिजर्व बैंक के जरिए राज्यों को एक विशेष खिड़की उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे वाजिब ब्याज दर पर 97,000 करोड़ रुपए रकम उधार हासिल कर पाएं।

दूसरा, राज्य एक विशेष खिड़की के द्वारा समूचे जीएसटी मुआवजे की कमी के बराबर यानी 2.35 लाख करोड़ रुपए का उधार ले सकें। केंद्र के सामने यह नौबत इसलिए आई है कि राज्यों की उधारी का पहाड़ खड़ा हो गया है। नियमानुसार, राज्यों को इस मद में भुगतान हर दूसरे महीने होना चाहिए। लेकिन केंद्र ने कई महीनों से उधारी बकाया रखी है। कोविड-19 काल में केंद्र और राज्य दोनों के सामने राजस्व का संकट मुंह बाए खड़ा है।

केंद्र के वादे और नियम
सरकार ने एक देश-एक टैक्स को काफी फायदेमंद बताते हुए जोरशोर से जीएसटी प्रणाली एक जुलाई 2017 को लागू किया था। इसके तहत टैक्स की वसूली तो आसान हुई, लेकिन राज्यों को राजस्व का नुकसान होना तय था। तब इसे लागू करते समय केंद्र सरकार ने कहा था कि राज्यों के नुकसान की पूरी भरपाई की जाएगी। इसी आधार पर राज्यों को मनाया गया था। जीएसटी राजस्व के नुकसान की भरपाई के लिए फॉर्मूला तय किया गया।

जीएसटी कानून में यह तय किया गया था कि इसे लागू करने के बाद पहले पांच साल में राज्यों को राजस्व का जो भी नुकसान होगा, उसकी केंद्र सरकार भरपाई करेगी। आधार वर्ष 2015-16 को मानते हुए यह तय किया गया कि राज्यों के इस संरक्षित राजस्व (प्रोटेक्टेड रेवेन्यू) में हर साल 14 फीसद की बढ़त को मानते हुए गणना की जाएगी। पांच साल अवधि तक केंद्र सरकार हर दो महीने पर राज्यों को मुआवजे की रकम देगी। यह रकम जीएसटी के तहत गठित मुआवजा उपकर कोष से दिया जाएगा।

सरकार के ताजा प्रस्ताव को लेकर राज्यों, खासकर विपक्ष शासित राज्यों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस शासित राज्यों ने कहा कि केंद्र सरकार आम सहमति आधारित निर्णय प्रक्रिया से दूर हट रही है और अपनी मर्जी थोप रही है। भाजपा शासित कर्नाटक और भाजपा की सहभागिता वाली बिहार सरकार- दोनों का भी यह मानना है कि इस मामले में और सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए।

पंजाब सरकार ने कहा कि हम पर केंद्र अपना निर्णय थोप रहा है। केंद्र सरकार को अपने समेकित निधि से एक-तिहाई हिस्सा देना चाहिए और बाकी हिस्सा राज्य छठे या सातवें साल में उधार ले सकते हैं। दिल्ली सरकार ने इसे केंद्र का धोखा बताया है।

क्या है मुआवजा उपकर कोष
राज्यों को मुआवजे की भरपाई के लिए जीएसटी के तहत ही एक कम्पेनसेशन सेस यानी मुआवजा उपकर लगाया जाता है। यह उपकर तंबाकू, वाहन उद्योग जैसे गैर जरूरी और ऐश्वर्य की वस्तुओं पर लगाया जाता है। इस उपकर के संचय से जो फंड बनता है, उसी से राज्यों के मुआवजे की भरपाई सरकार करती है। लेकिन पूर्णबंदी और बाद की मौजूदा अवधि में इस कोष में भी कुछ खास रकम नहीं आई जिसके बाद केंद्र सरकार के लिए राज्यों को मुआवजा देने में काफी मुश्किल आने लगी।

समस्या पिछले दो साल में शुरू हुई जब जीएसटी मुआवजे के संग्रह में कोई बढ़त नहीं हुई और राज्यों के बकाए में 14 फीसद के चक्रवृद्धि दर से बढ़त होने लगी। अगस्त 2019 में ही जीएसटी राजस्व वसूली का लक्ष्य राज्यों को दिए जाने वाले हिस्से का आधा भी नहीं मिल पाया था।

हकीकत क्या है?
केंद्र सरकार ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार किया है कि जीएसटी के तहत निर्धारित कानून के तहत राज्यों की हिस्सेदारी देने के लिए उसके पास पैसे नहीं है। सरकार को यह आभास हो गया था कि राज्यों को मुआवजा देने के लिए उपकर संग्रह काफी नहीं है। इस मद में संग्रह हर महीने सात हजार से आठ हजार करोड़ रुपए हो रहा था, जबकि राज्यों को हर महीने 14,000 करोड़ रुपए देने पड़ रहे थे।

ऐसे में अगर सरकार कुछ वस्तुओं पर इस मद में उपकर बढ़ा भी दे तो राजस्व में सालाना दो हजार से तीन हजार करोड़ रुपए की ही बढ़त होगी। इस साल अप्रैल से जून के बीच इस उपकर के रूप में सिर्फ 14,675 करोड़ रुपए जमा हो पाए। इसमें से 7,665 करोड़ रुपए तो अकेले जून महीने का है। केंद्र सरकार ने जून महीने में राज्यों को नवंबर से फरवरी तक का 36,400 करोड़ रुपए का बकाया जारी किया। फरवरी से अगस्त तक का सरकार ने अभी तक कोई मुआवजा नहीं दिया है।

उपभोक्ता पर बोझ की तैयारी
केंद्र और राज्य सरकार में तो सहमति अभी तक नहीं बनी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि उपभोक्ताओं को अतिरिक्त उधारी का बोझ वहन करना होगा। कारों, शीतल पेय, पान मसाला, तंबाकू और कोयले पर लगाए गए मुआवजे के उपकर को मौजूदा समय सीमा जून, 2022 तक लागू किया जाएगा।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में चलने वाली पांच घंटे की जीएसटी परिषद की बैठक में हालांकि दर में वृद्धि के मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई। इसके बावजूद कुछ वस्तुओं पर अधिक मुआवजा उपकर या अधिक उत्पादों को शामिल करने की बात से इनकार नहीं किया गया। हालांकि, जानकारों की राय में उपकर को पांच साल से आगे बढ़ाने का कोई भी निर्णय एक मिसाल बन सकता है, लेकिन उपकर समय सीमा कम से कम और पूर्वनिर्धारित होनी चाहिए। ध्यान रखना होगा कि यह किसी तरह का स्थाई उप कर न बन जाए।

मुआवजा उपकर कोष की स्थिति

वित्त वर्ष 2019-20 में केंद्र सरकार ने राज्यों को जीएसटी मुआवजे के रूप में 120,498 करोड़ रुपए जारी किए। जबकि उसे मुआवजा उपकर के रूप में महज 95,000 करोड़ रुपए मिले। इसके पहले 2018-19 में केंद्र सरकार ने 95,081 करोड़ रुपए मुआवजा उपकर हासिल किया था और राज्यों को 69,275 करोड़ दिए थे। इसी तरह 2017-18 में केंद्र ने 62,611 करोड़ रुपए का उपकर हासिल किया था और राज्यों को 41,146 करोड़ रुपए दिए थे। 31 मार्च 2019 तक की बात करें तो सरकार के पास इस मद से 47,271 करोड़ रुपए बचे हुए थे। एक अगस्त 2019 से ही सरकार को यह आभास हो गया था कि राज्यों को मुआवजा देने के लिए मुआवजा उपकर संग्रह काफी नहीं है।

क्या कहते हैं जानकार

केंद्र को उधार लेना चाहिए। सवाल यह है कि किसे उधार लेना चाहिए। केंद्र के पास उधार लेने की अधिक क्षमता है। वह अधिक कर्ज देने की क्षमता रखता है। अगर राज्य उच्च ब्याज दरों पर उधार लेते हैं, तो यह उपकर को अनावश्यक रूप से प्रभावित करेगा और अंतिम बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
– अमित मित्रा, वित्त मंत्री, पश्चिम बंगाल

वित्तीय बाधाओं के कारण राज्यों के लिए ऋण लेना संभव नहीं है। जबकि केंद्र सरकार को कम ब्याज पर कर्ज मिल सकता है। केंद्र सरकार को उधार लेकर राज्यों को जीएसटी राजस्व में कमी का भुगतान करना चाहिए। यह साल 2016-17 में किए गए वायदे के अनुरूप ही होगा।
– सुभाष चंद्र गर्ग, पूर्व वित्त सचिव

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