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केंद्र सरकार ने की गोशालाओं के बजट में की बेतहाशा कटौती

एनजी जयसिम्हा के अनुसार, केंद्र की मौजूदा सरकार ने गोशालाओं में देखभाल के बजट में 50 फीसद से ज्यादा की कटौती कर दी है।

Author नई दिल्ली | Published on: August 3, 2017 3:58 AM
cow, cow illustration, indian expressप्रतीकात्मक तस्वीर

दीपक रस्तोगी 

वन और पर्यावरण मंत्रालय के पशु कल्याण बोर्ड के एक वरिष्ठ सदस्य की लिखी चिट्ठी गोरक्षा और संवर्द्धन पर मौजूदा केंद्र सरकार की पोल खोलती है। बोर्ड के सदस्य एनजी जयसिम्हा ने देश भर की 3500 गोशालाओं को पत्र लिखकर मौजूदा केंद्र सरकार की एक नीति पर आपत्ति जताई है। उन्होंने दावा किया है कि गोशालाओं को आवंटित फंड में बेतहाशा कटौती की गई है। मंत्रालय के आंकड़े भी उनके दावे की तस्दीक करते हैं।  दूसरी तरफ, मोदी सरकार ने गो पालन को बढ़ावा देने की तमाम योजनाओं का एलान किया है। देसी गायों की बेहतरीन नस्ल पालने वाले किसानों और गोशालाओं को नकद इनाम देने से लेकर नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर से भरपूर एसएमएस भेजने तक। इन दो तथ्यों के संदर्भ में नई देखी जा रही तीसरी परिपाटी गौरतलब है। गो पालन और गोसंरक्षण को लेकर कॉरपोरेट घराने सक्रिय होने लगे हैं। हालांकि, वे अपने सीएसआर को इसमें खर्च करते हैं और गो पालन उनके लिए मुनाफे का जरिया बनने लगा है।

सिर्फ इनाम, नहीं कोई ठोस काम

कई संस्थाओं ने विभिन्न राज्यों में गोरक्षण सभाएं, गोरक्षण केंद्र, गोशालाएं तथा गोविज्ञान अनुसंधान केंद्रों की स्थापना की है। लेकिन केंद्रीय स्तर पर विस्तृत नीति का अभाव खटकता रहा है। उनलोगों के बारे में आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, जो गायों को पालन पोषण करने में असमर्थ हैं। भोजन की तलाश में भटकने वाले पशुधन को गोशालाओं तक कैसे पहुंचाया जाए, इस बारे में कोई नीति नहीं है। पशुधन और मत्स्य विभाग के के सचिव देवेंद्र चौधरी के अनुसार, देसी नस्ल की गाय के बेहतर पालन के लिए पांच लाख नकद इनाम दिया जाएगा। नवंबर में राष्ट्रीय दुग्ध दिवस पर पांच लाख, तीन लाख और एक लाख रुपए के कुल 30 पुरस्कार दिए जाएंगे। ऊंची उत्पादकता वाले पांच सौ सांड चुने जा रहे हैं। इनका प्रजनन में इस्तेमाल कर सात हजार बेहतरीन गायों को तैयार किया जाएगा। हर साल 50 लाख देसी गायों की नस्ल बेहतर बनाई जाएगी। सरकार का लक्ष्य पंजाब के सहिवाल, राजस्थान के राठी और गुजरात के गिर जैसी देसी नस्लों पर ध्यान केंद्रित करना है। सरकार का मानना है कि देश की जलवायु के लिहाज से देसी गायें ज्यादा अनुकूल हैं।

कारपोरेट की पौ बारह

इन हालात में गो-पालन और गो-संरक्षण का नारा कॉरपोरेट घरानों के लिए मुनाफे का रास्ता दिखा रहा है। औद्योगिक और कारोबारी घरानों ने अपने समाजिक दायित्व फंड (सीएसआर) को गोशाला योजनाओं में लगाना शुरू कर दिया है। गुजरात में अमदाबाद के पास एक कंपनी ने सवा लाख गायों की गोशाला बनाई है। इस दवा कंपनी ने पिछले तीन साल में गोशाला की देखरेख पर खर्च तीन गुना कर दिया है। इस क्षेत्र में टाटा पावर, फुलर्टन इंडिया क्रेडिट कंपनी और एलेंबिक फार्मास्यूटिकल समेत आधा दर्जन कंपनियां अपने सीएसआर का एक हिस्सा गोशालाओं पर खर्च कर रही हैं। कंपनीज एक्ट-2013 में कहा गया है कि जिन कंपनियों की संपदा 500 करोड़ रुपए, कारोबार 1000 करोड़ रुपए या सकल मुनाफा पांच करोड़ रुपए हो, उन्हें तीन वर्षों के अपने औसत सकल मुनाफे का दो फीसद हिस्सा सीएसआर से जुड़ी गतिविधियों में लगाना होगा।

कोट

भारत में डेयरी व्यवसायी व गोशालाएं गिर, साहिवाल, रेड सिंधी, थारपारकर, मालवी, हरियाणा, काकरेज आदि अच्छी दूध देनेवाली नस्ल की गायों को पालते हैं। इसलिए इन गायों को भी रक्षा की जरूरत नहीं होती है।
एम रवि कुमार, पशु कल्याण बोर्ड के सचिव

गोशाला बजट में 50 फीसद कटौती

जमीनी हालात पर गौर करने से तस्वीर स्पष्ट हो जाती है। एनजी जयसिम्हा के अनुसार, केंद्र की मौजूदा सरकार ने गोशालाओं में देखभाल के बजट में 50 फीसद से ज्यादा की कटौती कर दी है। सरकार ने एंबुलेंस अनुदान, गो आश्रय कोष, नियमित अनुदान, गो तस्करी पर रोक लगाने के लिए निर्धारित फंड, प्राकृतिक आपदा के मद में पशु कल्याण बोर्ड को महज सात करोड़ 84 लाख 85 हजार रुपए का बजट दिया है। यह पिछले वर्ष के 12 करोड़ 74 हजार रुपए के मुकाबले बेहद कम है। 13-14 में यह बजट 12 करोड़ 99 लाख रुपए का था। यूपीए सरकार ने वर्ष 2012-13 में 16 करोड़ छह लाख रुपए और 2011-12 में 21 करोड़ 77 लाख रुपए दिए थे। बेतहाशा कटौती जाहिर है।

 

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