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विद्यार्थियों को वास्तविक नंबर ही मिलेंगे, सीबीएसई ने साफ किया मॉडरेशन नीति पर अपना रुख

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की ओर से बोर्ड परीक्षाओं विशेषकर कक्षा 12 में लागू मॉडरेशन नीति को लेकर इन दिनों शिक्षा जगत में काफी चर्चा हो रही है।

Author नई दिल्ली | June 8, 2017 4:27 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

सुशील राघव  

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की ओर से बोर्ड परीक्षाओं विशेषकर कक्षा 12 में लागू मॉडरेशन नीति को लेकर इन दिनों शिक्षा जगत में काफी चर्चा हो रही है। पहले सीबीएसई ने वर्ष 2017 से ही इस नीति को बंद करने का निर्णय किया था। मामला जब दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष पहुंचा तो कोर्ट ने सीबीएसई के निर्णय पर रोक लगाते हुए मॉडरेशन नीति को इस वर्ष लागू रखने का फैसला सुनाया। इसके बाद बोर्ड ने बारहवीं कक्षा के परिणामों को इस नीति के अनुरूप ही घोषित किया। इस पूरे मामले पर जनसत्ता ने सीबीएसई के परीक्षा नियंत्रक केके चौधरी से बात की। केके चौधरी ने बताया कि सीबीएसई काफी समय से मॉडरेशन नीति का पालन कर रहा है। सीबीएसई देश और विदेश के परीक्षा केंद्रों पर बोर्ड परीक्षाओं का आयोजन करता है। इस दौरान सीबीएसई अन्य बोर्डों से अलग हर परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र के कई सेट तैयार करवाता है। इन सेटों के कठिन स्तर को एक समान रखने के लिए मॉडरेशन का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा किसी प्रश्नपत्र के किसी सवाल को समझने में बच्चों को हुई परेशानियों को देखते हुए भी मॉडरेशन का सहारा लिया जाता है। ऐसे सवालों के बारे में विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षकों की ओर से बोर्ड को परीक्षा के बाद लिखा जाता है। इसी के आधार पर न समझ आने वाले सवालों की पहचान की जाती है। मुख्य रूप से इन दो मामलों में ही मॉडरेशन का इस्तेमाल किया जाता है। उसके अलावा कुछ और मामलों में भी इस नीति का उपयोग किया जाता है जैसे कभी प्रश्नपत्र में कोई सवाल पाठ्यक्रम के बाहर से आ गया या फिर कोई प्रश्न गलत आ गया हो।

चौधरी के मुताबिक समय के साथ बोर्डों के बीच प्रतिस्पर्धा की वजह से मॉडरेशन नीति के तहत अधिक अंक दिए जाने लगे। इसकी वजह से विद्यार्थियों को ज्यादा अतिरिक्त अंक दिए जाने लगे और 90 फीसद से अधिक अंक पाने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ। इसकी वजह से दिल्ली विश्वविद्यालय सहित उन केंद्रीय विश्वविद्यालयों की कटआॅफ अधिक बढ़ने लगी जिनमें बारहवीं कक्षा के अंकों के आधार पर दाखिले होते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में तो यह कटआॅफ पिछले कुछ सालों में 100 फीसद तक जा पहुंची। इसके बाद सीबीएसई ने मॉडरेशन नीति को खत्म कर विद्यार्थियों को वास्तविक अंक देने का निर्णय लिया। चौधरी से जब पूछा गया कि मॉडरेशन नीति खत्म करने से परीक्षा में कठिन प्रश्नपत्र पाने वाले विद्यार्थियों के साथ नाइंसाफी होगी। इस पर उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है। उन्होंने बताया कि सीबीएसई उत्तरपुस्तिकाओं की जांच के लिए हर विषय और उसके प्रत्येक सेट के हिसाब से मार्किंग स्कीम तैयार करता है। अगर कोई सेट कठिन आया है तो मार्किंग स्कीम के माध्यम से विद्यार्थियों को राहत पहुंचाई जा सकती है। इसके लिए मॉडरेशन की आवश्यकता नहीं है।

चौधरी ने बताया कि सीबीएसई के वर्ष 1972 में बने नियम एवं विनियमन में मॉडरेशन नीति का उल्लेख किया गया था जिसके आधार पर 1990 के दशक में इसे लागू किया गया। शुरुआत में यह बहुत अच्छे लागू हुआ और बच्चों की समस्याओं को दूर भी किया गया लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे बोर्डों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी, मॉडरेशन के अंकों में इजाफा होता रहा। चौधरी के मुताबिक मॉडरेशन नीति के आधार पर दिए जाने वाले अंकों के लिए कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं होता, हां लेकिन एक तार्किक आधार जरूर होता है। उसी आधार पर इस नीति को लागू किया जाता है। चौधरी ने बताया कि अगर अगले वर्ष से हम इस नीति को लागू करना बंद कर देंगे तो विद्यार्थियों को वास्तविक अंक ही दिए जाएंगे। मॉडरेशन नीति के तहत उनके अंकों में इजाफा नहीं किया जाएगा। ऐसे में अधिक अंक पाने वाले विद्यार्थियों की संख्या तो कम होगी ही, साथ ही पास फीसद में भी गिरावट आने की संभावना है।

 

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