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सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, चार महीने से विवाद, फिर रातोंरात फैसला क्यों

गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्रीय सतर्कता आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि असाधारण स्थिति के लिए असाधारण उपाय जरूरी है। सर्तकता आयोग ने आलोक वर्मा को केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक के अधिकारों से वंचित कर अवकाश पर भेजने के केंद्र के फैसले के खिलाफ उनकी याचिका पर सुनवाई के दौरान यह दलील दी।

Author December 7, 2018 8:36 AM
छुट्टी पर भेजे गए सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा। (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा को केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक के अधिकारों से वंचित कर अवकाश पर भेजने के सरकार के निर्णय के खिलाफ उनकी याचिका पर गुरुवार को सुनवाई पूरी कर ली। अदालत इस मामले में फैसला बाद में सुनाएगी। सुनवाई के दौरान जजों ने सरकार और केंद्रीय सतर्कता आयोग से पूछा कि सीबीआइ में वरिष्ठ अधिकारियों के बीच विवाद की शुरुआत जब जुलाई में ही गई थी, फिर कार्रवाई करने के समय सरकार को चयन समिति की सलाह लेने में क्या मुश्किल थी। प्रधान न्यायाधीश ने सीवीसी से पूछा कि किस वजह से उन्हें यह कार्रवाई करनी पड़ी, क्योंकि यह सब रातोरात नहीं हुआ।
प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसफ के पीठ ने इस मामले में गुरुवार को सुनवाई पूरी कर ली।
सीवीसी की दलीलों पर सुनवाई करते हुए जजों ने कहा कि सरकार की कार्रवाई के पीछे की भावना संस्थान के हित होने चाहिए। ऐसा नहीं है कि सीबीआइ निदेशक और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच झगड़ा रातोंरात सामने आया, जिसकी वजह से सरकार को चयन समिति से परामर्श के बगैर ही निदेशक के अधिकार वापस लेने को विवश होना पड़ा। जजों ने कहा कि सरकार को ‘निष्पक्षता’ रखनी होगी।

गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्रीय सतर्कता आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि असाधारण स्थिति के लिए असाधारण उपाय जरूरी है। सर्तकता आयोग ने आलोक वर्मा को केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक के अधिकारों से वंचित कर अवकाश पर भेजने के केंद्र के फैसले के खिलाफ उनकी याचिका पर सुनवाई के दौरान यह दलील दी। सीवीसी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत के फैसलों और सीबीआइ को संचालित करने वाले कानूनों का जिक्र किया और कहा कि (सीबीआइ पर) आयोग की निगरानी के दायरे में इससे जुड़ी आश्चर्यजनक और असाधारण परिस्थितियां भी आती हैं।
इस पर जजों ने कहा कि अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने उन्हें बताया था कि जिन परिस्थितियों में ये हालात पैदा हुए उनकी शुरूआत जुलाई में ही हो गई थी। जजों ने कहा, सरकार की कार्रवाई के पीछे की भावना संस्थान के हित में होनी चाहिए।

जजों ने कहा- ऐसा नहीं है कि सीबीआइ निदेशक और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच झगड़ा रातोरात सामने आया जिसकी वजह से सरकार को चयन समिति से परामर्श के बगैर ही निदेशक के अधिकार वापस लेने को विवश होना पड़ा हो। राकेश अस्थाना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने शीर्ष अदालत से कहा कि इस मामले में वे तो विसिल-ब्लोअर थे परंतु सरकार ने उनके साथ भी एक समान व्यवहार किया। आलोक वर्मा बाकी पेज 8 पर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरिमन ने कहा कि केंद्र के आदेश ने उनके सारे अधिकार ले लिए। उन्होंने कहा कि सामान्य उपबंध कानून की धारा 16 भी इस बिंदु के बारे में है कि सीबीआइ निदेशक जैसे अधिकारी को कौन हटा सकता है, लेकिन यह अधिकारी को उसके अधिकारों से वंचित करने के बारे में नहीं है। नरिमन ने कहा, अधिकारी के पास निदेशक के अधिकार होने चाहिए। दो साल के कार्यकाल का यह मतलब नहीं कि निदेशक बगैर किसी अधिकार के सिर्फ पद के साथ विजिंिटंग कार्ड रख सकता है। इस पर अदालत ने नरिमन से पूछा कि क्या वह किसी और की नियुक्ति कर सकती है तो नरिमन ने कहा, ‘हां।’

आलोक वर्मा पर कई पक्षों की दलीलें सुनीं सर्वोच्च अदालत ने
अदालत ने आलोक वर्मा, केंद्र सरकार, केंद्रीय सतर्कता आयोग और अन्य पक्षों की दलीलें सुनी। अदालत ने जांच ब्यूरो के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना सहित जांच एजंसी के कई अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शीर्ष अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल से कराने के लिए गैर सरकारी संगठन कामन काज की याचिका पर भी सुनवाई की। जजों ने लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खरगे और राकेश अस्थाना का पक्ष भी सुना। आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। इन दोनों के बीच लड़ाई तेज होने पर सरकार ने केंद्रीय सतर्कता आयोग की सिफारिश पर वर्मा को निदेशक के अधिकारों से वंचित करते हुए अवकाश पर भेज दिया था।

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