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नारदा स्कैमः TMC नेताओं के वकील ने CBI पर निशाना साध कहा- स्पेशल कोर्ट के सामने क्यों बोलती हो गई थी बंद?

एडवोकेट लूथरा ने उस दौर का जिक्र किया जब पंजाब में हालात ठीक नहीं थे। उनका कहना था कि उस दौर में भी कोर्ट निष्पक्ष होकर फैसला करती थीं। लूथरा की इस दलील पर कोर्ट का सवाल था कि पंजाब में आतंकवाद के दौरान कितने मामलों में सजा होती थी?

अपने मंत्रियों की गिरफ्तारी के बाद सीएम ममता ने बोला था सीबीआई दफ्तर पर धावा (फाइल फोटो)

नारदा केस में टीएमसी नेताओं की तरफ से पैरवी करते हुए एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने सीबीआई पर जोरदार हमला बोला। उनका सवाल था कि स्पेशल कोर्ट करे सामने एजेंसी की बोलती क्यों बंद हो गई थी। जब आरोपियों को जमानत दी जा रही थी तब एजेंसी ने आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई। उनका कहना था कि एजेंसी ने केस ट्रांसफर की बात तब कही जब स्पेशल कोर्ट का फैसला उसके मुताबिक नहीं आया। फैसला उलटा होता तो कोई विवाद नहीं था।

लूथरा ने कहा कि सीबीआई एक जांच एजेंसी है। उसे किसी को सजा देने का हक नहीं है। एजेंसी को आरोपियों के खिलाफ ठोस साक्ष्य एकत्र कर कोर्ट के सामने पेश करने थे, लेकिन नारदा मामले में सीबीआई शुरू से ही झूठ पर झूठ बोल रही है। एजेंसी के हलफनामे देखें तो साफ हो जाता है कि अरेस्ट मेमो में क्या दर्ज है और कोर्ट में दाखिल हलफनामे में क्या लिखा गया है। उनका कहना था कि सीबीआई के हिसाब से फैसला नहीं आया तो भीड़ तंत्र, दबाव जैसे जुमलों का सहारा लिया जाने लगा। लूथरा का कहना था कि जज संविधान के मुताबिक काम करने की शपथ लेते हैं। उन्हें नहीं लगता कि भीड़ की मौजूदगी से कोर्ट के कामकाज पर असर पड़ता है।

एडवोकेट लूथरा ने उस दौर का जिक्र किया जब पंजाब में हालात ठीक नहीं थे। उनका कहना था कि उस दौर में भी कोर्ट निष्पक्ष होकर फैसला करती थीं। उनका कहना सीबीआई कह रही है कि भीड़ से जज के फैसले पर असर पड़ा। प्रशिक्षित और अनुशासित जज 40 से 50 केस रोजाना सुनते हैं। उनका सवाल था कि क्या हम ये मान सकते हैं कि भीड़ के जमा भर हो जाने से ही जज दबाव में आ सकते हैं? उनका फैसला भीड़ को देखकर पलट सकता है?

लूथरा की इस दलील पर कोर्ट का सवाल था कि पंजाब में आतंकवाद के दौरान कितने मामलों में सजा होती थी? 5 जजों की बेंच का ये भी कहना था कि कोर्ट में बैठा न्यायाधीश कोई कंप्यूटर नहीं होता। बाहर के माहौल का उस पर असर नहीं पड़ा, ये कैसे कह सकते हैं? बेंच का कहना था कि कोर्ट के बाहर का माहौल इस तरह का नहीं होना चाहिए जिससे जज को उसके कर्तव्य पालन में बाधा उत्पन्न हो।

टीएमसी नेताओं के वकील का कहना था कि एक छोटे से अरेस्ट और बेल के मामले के लिए वो कोर्ट का तंग कर रहे हैं। उनका कहना था कि 17 मई को दोपहर 2.35 बजे सीबीआई ने मेल पर शिकायत भेजी थी। इससे पहले, मॉब अटैक एट निजाम पैलेस, टाइटल से मेल कोर्ट के भेजी गई थी। लेकिन जो मसौदा कोर्ट को भेजा गया वो पहले गवर्नर और दूसरे वकीलों के पास पहुंच चुका था।

उनका कहना था कि टीएमसी नेता मदन मित्रा को बगैर नोटिस के उठाया गया। उनकी अरेस्ट कहीं और से दिखाई गई। सीबीआई ने जो हलफनामे दिए उनमें से ज्यादातर झूठे और तथ्यों से परे है। सीबीआई कह रही है कि उसे चार्जशीट फाइल नहीं करने दी गई। लूथरा का सवाल था कि क्या एजेंसी के पास पुलिस प्रोटक्शन नहीं थी। उनका कहना था कि ये खुद को जिम्मेदार एजेंसी कहते हैं लेकिन उन्हें नहीं लगता कि ये सच है।

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