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हो गई सीबीआइ निदेशक रंजीत सिन्हा की 2-G जांच से छुट्टी

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) के निदेशक रंजीत सिन्हा को सेवानिवृत्ति से 12 दिन पहले गुरुवार को उस समय जबरदस्त झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 2-जी स्पेक्ट्रम मामले से खुद को अलग रखने का निर्देश दे दिया। इससे पहले, न्यायालय ने कहा कि उनके खिलाफ कुछ अभियुक्तों को संरक्षण देने के बाबत लगे आरोप […]

Author Updated: November 21, 2014 10:07 AM

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) के निदेशक रंजीत सिन्हा को सेवानिवृत्ति से 12 दिन पहले गुरुवार को उस समय जबरदस्त झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 2-जी स्पेक्ट्रम मामले से खुद को अलग रखने का निर्देश दे दिया। इससे पहले, न्यायालय ने कहा कि उनके खिलाफ कुछ अभियुक्तों को संरक्षण देने के बाबत लगे आरोप ‘पहली नजर में विश्वसनीय’ लगते हैं।

शीर्ष अदालत ने एक अभूतपूर्व आदेश में 2-जी मामले के जांच दल में सिन्हा के बाद दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी को यह मामला सौंप दिया। प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू, न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति एके सीकरी के खंडपीठ ने इस मसले पर विस्तृत आदेश देने से इनकार करते हुए कहा कि इससे इस प्रमुख जांच एजंसी की ‘प्रतिष्ठा और छवि’ ‘खराब’ होगी।

जांच एजंसी के मुखिया सिन्हा की स्थिति उसी समय स्पष्ट हो गई थी जब भोजनावकाश के लिए जाते वक्त न्यायाधीशों ने सिन्हा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह से विकल्पों के बारे में पूछा और कहा कि वे विस्तृत आदेश पारित नहीं करना चाहते क्योंकि यह जांच एजंसी के हितों और प्रतिष्ठा के खिलाफ होगा। न्यायाधीशों ने कहा, ‘पहली नजर में अर्जी में (गैरसरकारी संगठन सेंटर फार पब्लिक इंटरेस्ट लिटीगेशंस की ओर से) लगाए गए आरोप विश्वसनीय लगते हैं और इन्हें स्वीकार करना होगा।’

हालांकि सिन्हा के वकील इस बात पर जोर देते रहे कि सीबीआइ प्रमुख के खिलाफ 2-जी की जांच को प्रभावित करने संबंधी आरोप ‘असत्य’ हैं। शीर्ष अदालत की ओर से नियुक्त विशेष लोक अभियोजक आनंद ग्रोवर ने जांच ब्यूरो के मुखिया की भूमिका की आलोचना की। उन्होंने सीबीआइ की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल पर भी सवाल उठाए और सीबीआइ के एक वरिष्ठ आइपीएस अफसर को जांच टीम का भेदिया कहे जाने संबंधी सिन्हा की टिप्पणी को दोहराने पर सवाल उठाया।

इस बीच, शीर्ष अदालत ने रंजीत सिन्हा के निवास पर अगंतुक रजिस्टर और अन्य दस्तावेज प्रशांत भूषण को उपलब्ध कराने वाले विसल ब्लोअर का नाम उजागर करने संबंधी अपना पहले का आदेश वापस ले लिया।

इससे पहले, मामले की सुनवाई शुरू होते ही विशेष लोक अभियोजक आनंद ग्रोवर ने जांच एजंसी के मुखिया के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए और दावा किया कि यदि मुकदमे की सुनवाई में सिन्हा के निर्देश माने गए होते तो कुछ अभियुक्तों के खिलाफ पूरा मामला ही ‘ध्वस्त’ हो जाता। ग्रोवर ने कहा कि सिन्हा का दृष्टिकोण जांच एजंसी के नजरिए से ‘पूरी तरह विपरीत’ था। उन्होंने कहा कि मुकदमे की सुनवाई के अंतिम चरण में भी सिन्हा ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की जब अभियोजन के सबूत पेश करने की कार्यवाही लगभग पूरी हो चुकी थी।

ग्रोवर ने कहा कि सारे निष्कर्षों के अवलोकन के बाद उन्होंने जो जानकारी एकत्र की, वह हतप्रभ करने वाली है और इसे खुली अदालत में नहीं बताया जा सकता। उन्होंने 2-जी मामले में मुकदमे का सामना कर रही कुछ कंपनियों के प्रति कथित पक्षपात करने संबंधी विधि मंत्रालय की राय पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मंत्रालय कैसे काम करता है, यह एक दुखद कहानी है। एक अधिकारी ने गवाही में कहा कि ऐसा फाइल पर मंत्री के टिप्पणी के आधार पर किया गया लेकिन सवाल यह है कि मंत्री के पीछे कौन व्यक्ति है। यह हतप्रभ करने वाला है।

कार्यवाही के इसी चरण में सुनवाई ने नया मोड़ ले लिया जब वकील प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि सिन्हा ने सीबीआइ के वकील केके वेणुगोपाल को इस मामले में बहस नहीं करने का निर्देश दिया था। इस पर न्यायाधीशों ने सवाल किया कि किसने निर्देश दिया था। अदालत में मौजूद संयुक्त निदेशक अशोक तिवारी ने कहा कि शीर्ष अदालत में वेणुगोपाल ही सीबीआइ के वकील हैं। उन्होंने मौजूदा विवाद में अपनी संस्था के मुखिया का बचाव करने का भी प्रयास किया।

न्यायालय ने तिवारी द्वारा अपने बॉस को बचाने के प्रयास पर कड़ी आपत्ति की और साथ ही अदालत कक्ष में सीबीआइ के नौ वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति पर सवाल किए। न्यायाधीशों ने कहा- आप निदेशक के एजंट नहीं हैं और आप उनके प्रवक्ता नहीं हो सकते। आपको यह जिम्मेदारी लेने की जरूरत नहीं है। यहां पर आपकी उपस्थिति की क्या जरूरत है। न्यायाधीशों ने कहा, ‘सीबीआइ के इतने अधिक अधिकारी यहां क्यों हैं। अदालत कक्ष में इतने अफसर क्यों बैठे हैं। हमें उनकी उपस्थिति की जरूरत नहीं है। हम 2-जी मामले की जांच की सुनवाई नहीं कर रहे हैं। हम निदेशक के खिलाफ एक अर्जी पर सुनवाई कर रहे हैं।’

इसके साथ ही न्यायाधीशों ने इन अधिकारियों को न्यायालय से बाहर जाने की हिदायत दी और कहा कि अदालत की कार्यवाही सुनने की बजाए उन्हें अपनी ड्यूटी करनी चाहिए। इसके बाद ये अफसर अदालत कक्ष से बाहर चले गए।

इसके बाद, वेणुगोपाल ने निदेशक के निवास के आगंतुकों की सूची और दूसरे दस्तावेज भूषण को मुहैया कराने वाले ‘भेदिया’ के रूप में सिन्हा द्वारा पुलिस उप महानिरीक्षक स्तर के अधिकारी संतोष रस्तोगी का नाम लिए जाने संबंधी मीडिया की खबरों की ओर न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया। वेणुगोपाल के जरिए सीबीआइ ने सिन्हा की टिप्पणी की तीखी आलोचना की और न्यायालय से अनुरोध किया कि उनसे यह बयान वापस लेने के लिए कहा जाए। उन्होंने कहा कि बुधवार का यह बयान सही नहीं था कि वह अधिकारी सीबीआइ के अंदर का भेदिया है। यदि इस संबंध में कोई सबूत है तो उसे पेश किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वह बयान वापस लिया जाए क्योंकि उस अधिकारी को संरक्षण की जरूरत है।

भूषण ने भी कहा कि वे कभी भी इस अधिकारी से नहीं मिले हैं। किसी अन्य व्यक्ति ने उन्हें वे दस्तावेज दिए थे और इसी संबंध में हलफनामा दाखिल किया था।

न्यायालय ने भी कहा कि किसी अधिकारी की छवि खराब करने की छूट नहीं दी जा सकती और मामले की सुनवाई के दौरान सिन्हा के वकील को उस अधिकारी का नाम नहीं लेना चाहिए था। इस अधिकारी के तबादले की फाइल पर की गई टिप्पणी का अवलोकन करते हुए न्यायाधीशों ने कहा, ‘ऐसा लगता है कि आप रास्ता साफ करना चाहते हैं क्योंकि यह अधिकारी आपके कुछ फैसलों के खिलाफ था।’

न्यायालय ने कहा कि इस अधिकारी का तबादला करने का निदेशक का फैसला शीर्ष अदालत के आदेश से ‘बचकर निकलने’ जैसा था जिसने निर्देश दिया था कि उसके आदेश के बगैर 2-जी जांच दल के किसी भी सदस्य को हटाया नहीं जाएगा। न्यायालय ने कहा कि ‘सब कुछ ठीक नहीं लगता’ और उनके (सिन्हा के) खिलाफ कुछ आरोप पहली नजर में विश्वसनीय लगते हैं। न्यायालय ने सिन्हा से इस मामले में उपलब्ध विकल्पों के बारे में पूछा क्योंकि वह इस प्रमुख जांच एजंसी की प्रतिष्ठा और छवि को ध्यान में रखते हुए विस्तृत आदेश नहीं देना चाहता था।

इसके बावजूद, सिन्हा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने बहस जारी रखी और कहा कि निदेशक के खिलाफ विशेष लोक अभियोजक और दूसरे लोगों के बयान पूरी तरह गलत और निराधार हैं। उन्होंने कहा कि निदेशक का फैसला हो सकता था है कि सर्वश्रेष्ठ नहीं हो लेकिन इसके पीछे कोई विद्वेष या दुर्भावना नहीं थी। लेकिन अदालत ने इन दलीलों को दरकिनार करते हुए कहा कि हर कदम को न्यायोचित ठहराने के तर्क हैं लेकिन न्यायोचित ठहराने की कवायद हमें संतुष्ट करने वाली होनी चाहिए।

 

 

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