भारत के रजिस्ट्रार जनरल ने फैसला किया है कि जनगणना के दौरान जाति पूछने के लिए पहले से तय जातियों की सूची (ड्रॉप-डाउन मेन्यू) नहीं दी जाएगी। इसके बजाय लोगों से खुलकर पूछा जाएगा कि उनकी जाति क्या है और वे अपना जवाब खुद बता सकेंगे।

इस फॉर्मेट से वैसे ही नतीजे मिलने की उम्मीद है जैसे 2011 में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना के दौरान मिले थे। गृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि जनगणना करने वाले लोग लोगों से केवल उनकी जाति बताने के लिए कहेंगे और उनके उत्तर को हूबहू दर्ज करेंगे। वे उपनाम, उप-जाति या अन्य जवाबों को व्यापक जाति श्रेणियों में बांटने की कोशिश नहीं करेंगे।

अगले साल पूरे देश में होगी जाति जनगणना

जनसंख्या गिनती और जाति जनगणना अगले साल फरवरी में पूरे देश में होगी। हालांकि, पहाड़ी और बर्फबारी वाले इलाकों में यह प्रक्रिया इस साल 1 सितंबर से शुरू हो जाएगी ताकि सर्दियों के महीनों में दिक्कतों से बचा जा सके।

गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “यह अंतिम रूप से तय किया गया है कि जाति गणना के लिए किसी भी ड्रॉपडाउन मेनू या अन्य साधनों का उपयोग नहीं किया जाएगा। लोगों को केवल अपनी जाति बतानी होगी और उसे वैसे ही दर्ज किया जाएगा। गणनाकर्ताओं को किसी भी उपनाम या उपजाति को जाति श्रेणी में वर्गीकृत नहीं करना है। सब कुछ हूबहू दर्ज किया जाएगा।”

यह फैसला आरजीआई की ओर से केंद्रीय और राज्य स्तरीय जाति सूचियों, खास तौर पर ओबीसी के लिए, ड्रॉप-डाउन मेनू का उपयोग करने पर विचार करने के बाद लिया गया है। जनगणना में अधिसूचित अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों को दर्ज करने के लिए पहले से ही ड्रॉप-डाउन मेनू का उपयोग किया जाता है।

जाति पर ओपन-एंडेड सवाल का तरीका कैसा है?

जाति पर ओपन-एंडेड सवाल वाला तरीका ठीक वैसा ही है जैसा 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना में अपनाया गया था। यह प्रक्रिया काम के लायक जाति डेटा देने में नाकाम रही। इसकी मुख्य वजहें डेटा की खराब गुणवत्ता, मानकीकृत जाति रजिस्टर का न होना और ऑपरेशनल डिजाइन में कमियां थीं। चूंकि लोग बिना सत्यापन के खुद अपनी जाति बता सकते थे, इसलिए इस जनगणना ने प्रशासनिक रूप से बेहद जटिल स्थिति पैदा कर दी।

अंतिम डेटासेट में लगभग 46.7 लाख अलग-अलग जाति के नाम शामिल थे, जबकि 1931 में हुई पिछली व्यापक जाति जनगणना में केवल 4147 जातियां दर्ज की गई थीं। केंद्र सरकार ने आखिकार जाति के मूल आंकड़ों को रोक दिया।

एक केंद्रीय मंत्री ने कहा, “हां, यह सच है कि खुले सवालों से 2011 जैसे नतीजे आने की संभावना है। लेकिन हम क्या कर सकते हैं? हम हमेशा से यही कहते आए हैं कि जाति जनगणना में जटिलताओं के कारण गलत आंकड़े आने की काफी संभावना रहती है। लेकिन विपक्ष राजनीतिक कारणों से इसकी मांग कर रहा है। हमने इसे स्वीकार कर लिया है। अंतिम आंकड़ों से निपटने का काम उन्हें ही करने दीजिए।”

हालांकि, सरकार का कहना है कि जातिगत पहचानों के मामले में राज्य को मध्यस्थ बनने से रोकते हुए, इस प्रक्रिया को संचालित करने का एकमात्र तरीका एक खुली प्रतिक्रिया देना है। प्रस्तावित सिस्टम के तहत, डेटा इकट्ठा करने वाला व्यक्ति वही दर्ज करेगा जो जवाब देने वाला व्यक्ति कहेगा, न कि यह तय करेगा कि जवाब किसी मान्यता प्राप्त जाति, उप-जाति या श्रेणी से मेल खाता है या नहीं।

जनगणना अधिकारी जाति प्रमाण पत्र नहीं मांगेगा

गृह मंत्रालय के अधिकारी ने कहा, “जनगणना सत्यापन प्रक्रिया नहीं है, बल्कि केवल रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया है। इसमें दावों के विरुद्ध कोई सबूत नहीं मांगा जाता। अगर कोई ब्राह्मण खुद को यादव बताता है, तो जनगणना अधिकारी उससे जाति प्रमाण पत्र नहीं मांगेगा। इस प्रकार एक ड्रॉपडाउन मेनू बनाने से राज्य अविश्वसनीय आंकड़ों में शामिल हो जाएगा।”

इस फैसले में आरएसएस और संघ परिवार के कुछ वर्गों द्वारा मौजूदा केंद्रीय और राज्य जाति सूचियों के उपयोग को लेकर उठाई गई चिंता का भी समाधान किया गया है। उनका तर्क था कि ऐसी सूचियों पर निर्भर रहने से ब्रिटिश शासन के दौरान संस्थागत रूप से स्थापित जातिगत संरचना और भी मजबूत हो सकती है।

हालांकि, ओपन-एंडेड फॉर्मेट चुनने से सरकार के सामने वही समस्या आ जाती है जिसने 2011 की प्रक्रिया को मुश्किल बना दिया था, लाखों लोगों के अलग-अलग जवाबों को भरोसेमंद और स्टैंडर्ड जाति डेटा में कैसे बदला जाए, बिना यह दिखाए कि सरकार लोगों द्वारा बताई गई जानकारी को तय या बदल रही है।

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अंतिम जाति जनगणना वर्ष 1931 में हुई थी। इस गणना को लेकर भाजपा, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के जो भी दृष्टिकोण रहे हों, लेकिन इसके बाद इस मुद्दे पर विराम लग जाएगा। अब सरकार की ताजा घोषणा के मुताबिक, भारत की संपूर्ण जातियों की गिनती होगी। इसमें मुसलिम, ईसाई और पारसी भी शामिल रहेंगे। इसके परिणाम क्या होंगे, यह भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन जातियों की गणना को लेकर जिस तरह से इसे सामाजिक न्याय का मुद्दा बना कर उछाला गया है, उसके नतीजों में बहुत कुछ शेष नहीं रह गया है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…