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बेबाक बोल : जात न पूछो

बिहार में 1931 में पिछड़े वर्ग का अनुपात 50 फीसद से ज्यादा ही था। जबकि 20 फीसद से भी ज्यादा दलित (जिनमें अब के महादलित भी शामिल हैं) और करीबन 17 फीसद मुसलिम थे..
Author नई दिल्ली | September 19, 2015 13:56 pm
1931 में भी बिहार में पिछड़े वर्ग का अनुपात 50 फीसद से ज्यादा ही था। जबकि 20 फीसद से भी ज्यादा दलित (जिनमें अब के महादलित भी शामिल हैं) और करीबन 17 फीसद मुसलिम थे। (पीटीआई फोटो)

बिहार में इस बार स्थानीय क्षत्रपों की ही नहीं, देश के महान सम्राट अशोक की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। जाति केंद्रित चुनाव में इस बार मौर्यों के वंशधर या अशोकवंशी होने का दावा करने वाले भी संगठित होकर मैदान में हैं। अशोक के नाम पर चुनाव लड़ने की कवायद बिहार में पहले ही शुरू हो गई थी। उत्तर प्रदेश के शाक्यों-मौर्यों की तरह, बिहार के ताकतवर कुशवाहा समुदाय का दावा है कि मगध नरेश चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक दोनों ही उनकी जाति के थे। हालांकि इतिहास के पन्नों पर इससे भिन्न मत भी हैं। नौ फीसद वोट के साथ इस जाति की प्रदेश में पाएदार उपस्थिति है। इसका लाभ हर पार्टी उठाना चाहती है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने पहले ही इस समुदाय की ताकत को पहचान लिया था और उन्हें लुभाने के प्रयास शुरू कर दिए थे। यही वजह रही कि भाजपा ने राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेंद्र कुशवाहा से राजनीतिक गठजोड़ कर लिया।

बहरहाल, 2300 साल पहले अशोक ने जिस धरती पर जन्म लिया और देश को गर्व के लिए एक महान सम्राट का व्यक्तित्व दिया, वहां शायद कभी इस बात का इल्म रहा होगा कि एक दिन उसी धरती पर उनकी जाति के नाम पर चुनावी संग्राम होगा। इतना ही नहीं इसके भी आगे कुशवाहा अपने आपको लव-कुश में से कुश की संतान मानते हैं। वहीं बिहार की महाभारत में खुद को भगवान कृष्ण का वंशज कहने वाले अपनी यदुवंशी की पहचान को भुनाने में लगे हैं। और, विपक्षी रामविलास इसकी काट में अपने सेनापति नरेंद्र मोदी को ‘द्वारिका से आया हुआ असली यदुवंशी’ बताते हैं।

बिहार में कुशवाहा समुदाय अर्धकिसानी के लिए जाना जाता है और उनकी संख्या इतनी है कि यह चुनाव का पासा पलट दे। आखिर नौ फीसद वोट अगर किसी भी एक पक्ष में एकमुश्त पड़ जाएं तो बाकी अपने कॉडर के बल पर मुख्यधारा का कोई भी दल सत्ता के शिखर को छूने में कामयाब हो ही जाएगा। ऐसे में अगर यह समुदाय एक निर्णायक भूमिका की ओर देख रहा है तो यह स्वाभाविक ही है। लोक समता पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा कभी जनता दल (एकी) का ही हिस्सा थे। कुशवाहा ने 2014 का चुनाव भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर लड़ा और तीन सीटें हासिल कीं। कुशवाहा ने बिहार में तकरीबन एक दशक से चले आ रहे नीतीश कुमार के जादू को भंग करते हुए उनके अभेद्य माने जाने वाले वोट दुर्ग में सेंध लगाई। यही कारण है कि उनका राजनीतिक सिक्का धड़ल्ले से चला और ऐन मौके पर अगर मांझी एक नए राजनीतिक अस्तित्व के साथ नमूदार न हुए होते तो वे शायद सीटों का एक बड़ा हिस्सा हासिल कर जाते। अब भी वे 23 सीटें लेकर मांझी के 20 सीटों के हिस्से पर भारी ही हैं।

बहरहाल पिछड़ों से प्रेरणा लेकर अगड़ों में भी इतिहास में अपना कोई ठोस भुनाने लायक नेता ढूंढ़ना होगा। यह मंथन-चिंतन शायद अभी जारी हो। लेकिन हाल मेंइतिहास के जर्द पन्नों से एक सफा निकाल कर भूमिहारों ने हिंदी के महान कवि व उर्वशी के रचनाकार रामधारी सिंह दिनकर पर तो अपना हक जता ही दिया है। भूमिहार दिनकर को भूमिहारों की अस्मिता का प्रतीक मानकर उनके आसपास अपनी जातीय राजनीति का ताना-बाना बुनते हैं। सर्वविदित है कि राजपूत तो सदा ही महाराणा प्रताप के नाम पर अपनी राजनीति चमकाते हैं। सम्राट अशोक और राणा प्रताप जैसी बड़ी हस्तियों को जाति के बंधन में बांधकर हो रही बिहार की राजनीति पर बरबस ही तरस आता है, क्योंकि शायद ही कोई सम्राट, शासक किसी एक जाति के भले के लिए प्रयास करता हो, कवि एक समुदाय के लिए अपनी कलम चलाता हो।

लेकिन बिहार में ऐसा ही है। यहां के राजनीतिक गणित के मद्देनजर अगर कबीर को अपनी रचना करनी होती तो उनको भी ‘जाति ही पूछो साधु की’ लिखना पड़ता। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चाहे जितना विकास की डुग्गी पीट लें और विकास पुरुष से महिमामंडित हो लें, लेकिन लोगों के सामने वोट के लिए हाथ फैलाते समय वे भी जाति के नाम पर ही वोट मांगते हैं। दक्षिण भारत को छोड़ दें तो बिहार ही एक ऐसा प्रमुख राज्य है जहां पिछड़े वर्ग का अपनी संख्या के चलते सियासी दबदबा है। बाकी देश में भी पिछड़े वर्ग के नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच बना लेते हैं, लेकिन बिहार में यह ज्यादा है। यहां सत्ता की कुंजी एक अरसे से पिछड़ों के हाथ में ही है। हालांकि यहां भी पिछड़ों का एक बड़ा वर्ग महज जाति से ही पिछड़ा है, न कि अपनी माली हालत से। अब यहां यह देखना भी रोचक है कि बिहार के जातिगत समीकरण में कमजोर आंकड़ा रखने वाले ब्राह्मणों की अस्मिता हाशिए पर है। नंद वंश को खत्म कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना करने वाले और चंद्रगुप्त मौर्य को राजनीति का ककहरा पढ़ाने वाले कूटनीतिज्ञ चाणक्य की न तो जयंती मनाई जा रही है और न ही उनके वंशज अपनी मजबूत विरासत का राग अलाप रहे हैं।

बिहार ही शायद एक ऐसा प्रदेश है जहां हर चीज अति में होती है। यहां अगर अति पिछड़ा वर्ग है तो नीतीश कुमार के सदके महादलित भी हैं। कुमार ने अपने एक दशक के कार्यकाल में पासवान (दुसाध) के अलावा बाकी सभी अनुसूचित जातियों को महादलित घोषित कर दिया। इतना ही नहीं महादलितों के कल्याण के लिए नीतीश कुमार ने एक महादलित आयोग की स्थापना भी कर दी। इसी तरह अति पिछड़ों के लिए 20 फीसद आरक्षण की व्यवस्था भी कर दी। मसला यह कि आप सत्ता में हों या सत्ता से बाहर आपके फैसले और वादों के केंद्र में जाति ही रहती है। कुमार की महादलित की परिभाषा में से ही खुद उनके प्रयास से जीतन राम मांझी का उदय हुआ। कभी मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी देकर महादलित को यह सम्मान देने का दम भरने वाले नीतीश ने बाद में उसी फैसले को अपनी सबसे बड़ी भूल माना। लेकिन तब तक तो मांझी अपनी नाव खुद ही खेने में कामयाब हो चुके थे।

हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा आज एनडीए के चुनावी गठबंधन का हिस्सा है अपनी अलग हस्ती के साथ। महादलित की नई परिभाषा गढ़ते हुए कुमार ने जिस ताकत को अपने राजनीतिक फायदे के लिए सृजित किया था, इस बार वे खुद ही उसकी चुनौती झेलने वाले हैं। देखना होगा कि आखिर दिवाली से पहले अपने वोटों के दम पर महादलित किसके राजनीतिक शिविर को रौशन करते हैं। मुख्यमंत्री न होते तो मांझी इस चुनाव में महज एक उम्मीदवार भर ही होते, लेकिन हालात बदले और भाजपा गठबंधन में वे 20 सीटों का हिस्सा लेकर पहली बार राजनीति की गहराई नापने निकले हैं।

लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान की राजनीति तो जाति केंद्रित ही रही है। राष्ट्रीय जनता दल के लालू यादव जरूर धर्मनिरपेक्षता का दम भरते हैं, लेकिन उनका दावा पिछड़ों में सबसे अधिक संख्या रखने वाले यादव वोटों पर सदा ही रहा है। यह माना जाता है कि प्रदेश के करीबन 51 फीसद पिछड़ों में 15 फीसद हिस्सा यादव समुदाय का ही है। धर्मनिरपेक्षता के अपने दावे के कारण लालू यादव-मुसलिम (एमवाई) मतों पर भी अपना दावा जताते हैं। सन 2000 में जब प्रदेश की कमान उनकी पत्नी राबड़ी देवी के हाथ में थी तो उन्होंने मुसलमानों का एक सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण कराया था जिसके मुताबिक प्रदेश में करीब 17 फीसद मुसलमान हैं।

हालांकि 1931 के बाद कभी भी देश में जाति आधारित जनगणना के आंकड़े जाहिर नहीं किए गए, पुराने फीसद को आगे-पीछे करके बिहार के राजनीतिक अपनी संख्या की धौंस देते रहते हैं। हालांकि यह तय है कि 1931 में भी यहां पिछड़े वर्ग का अनुपात 50 फीसद से ज्यादा ही था। जबकि 20 फीसद से भी ज्यादा दलित (जिनमें अब के महादलित भी शामिल हैं) और करीबन 17 फीसद मुसलिम थे। सवर्ण जातियों में यहां भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ मिलकर 15 फीसद के आंकड़े ही छू पाते हैं। लिहाजा उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा जैसे प्रगतिशील राज्यों में जहां सवर्ण जातियां मुख्य भूमिका निभाती हैं, यहां पिछड़े ही राजनीति की दिशा तय करते हैं।

बिहार की इसी धरती पर, जिन लोगों के बीच तथागत बोध प्राप्त कर बुद्ध हुए थे, उनके ही डीएनए को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सियासी सुर्रा छोड़ा तो विवाद उठना ही था। आज डाक विभाग बालों और नाखूनों के नमूनों की बहुतायत से जूझ रहा है जो प्रदेश के नागरिकों ने प्रधानमंत्री को अपने डीएनए का विश्वास दिलाने के लिए प्रेषित किए हैं। देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी इसी मिट्टी से पैदा हुए थे। लेकिन ये सब लोग जाति के बंधन से कहीं ऊपर उठे हुए थे। लेकिन यह विडंबना ही है कि उनके नाम पर जो चुनाव लड़ा जाता है वह जाति को ही केंद्र में रख के लड़ा जाता है।

किसका गणित सुलझाएगा जातीय समीकरण:
1931 में भी यहां पिछड़े वर्ग का अनुपात 50 फीसद से ज्यादा ही था। जबकि 20 फीसद से भी ज्यादा दलित (जिनमें अब के महादलित भी शामिल हैं) और करीबन 17 फीसद मुसलिम थे। सवर्ण जातियों में यहां भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ मिलकर 15 फीसद के आंकड़े को ही छू पाते हैं। लिहाजा उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा जैसे प्रगतिशील राज्यों में जहां सवर्ण जातियां मुख्य भूमिका निभाती हैं, यहां पिछड़े ही राजनीति की दिशा तय करते हैं।

अशोक की अस्मिता:                                                                                                                                              महाराष्ट्र चुनावों के समय चाहे भाजपा हो, शिवसेना या राकांपा सभी ने मराठा अस्मिता छत्रपति शिवाजी के नाम पर वोट मांगे। पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश में भी ‘मौर्यवंशी’ अपनी अलग पहचान को लेकर छटपटाए। अब बिहार में महान सम्राट की अस्मिता के नाम पर वोट मांगने की रणनीति है। क्षेत्रीय अस्मिताओं के उभार के इस दौर में बिहार ने चक्रवर्ती सम्राट अशोक को चुना। इतिहास के पन्नों में अशोक महान (ईसापूर्व 273-232 ) का पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य है।

ये प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती राजा थे। उनके समय मौर्य राज्य उत्तर में हिंदुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण और मैसूर तक और पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफगानिस्तान तक पहुंच गया था। यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था। सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य से बेहतर कुशल प्रशासन और बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। जीवन के उत्तरार्ध में अशोक गौतम बुद्ध की मानवतावादी शिक्षाओं से प्रभावित होकर बौद्ध हो गए।

उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र और यूनान में भी करवाया। अशोक अपने पूरे जीवन मे एक भी युद्ध नहीं हारे। सम्राट अशोक के ही समय में 23 विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई जिसमें तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, कंधार आदि प्रमुख थे। इन्हीं विश्वविद्यालयों में विदेश से कई छात्र शिक्षा पाने भारत आया करते थे।

‘कुरुक्षेत्र’ में दिनकर:
रामधारी सिंह दिनकर का जन्म (23 सितंबर 1908- 24 अप्रैल 1974) बिहार प्रांत के बेगूसराय जिले के सिमरिया घाट में हुआ था। दिनकर स्वतंत्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गए। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रांति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल शृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ नामक कृतियों में मिलता है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि दिनकरजी गैर-हिंदीभाषियों के बीच हिंदी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे और अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतीक थे। दिनकर के इसी प्रतीक को बिहार चुनाव के ‘कुरुक्षेत्र’ में भुनाने की कोशिश की जा रही है। लेखक डॉक्टर राजू रंजन प्रसाद कहते हैं कि दिनकर बहुत बड़े कवि हैं। दिनकर को भूमिहार और मंचीय कवि बनाने में वामपंथियों की भूमिका है।

जबकि दिनकर अपने समय के एकमात्र ऐसे कवि थे जो अपने समय में विश्व संस्कृति, विश्व साहित्य से परिचित हैं और उनकी रचनाओं में उनका अक्स दिखता है। कविता में ऐसा बिरला उदाहरण है जहां कवि पूरा परिवार लेकर चल रहा है। उन्हें सत्ता का करीबी बताया जाता है, लेकिन उन्होंने कभी अपना सम्मान बेचा नहीं। जाति व्यवस्था ऐसी है कि हर व्यक्ति किसी न किसी जाति की पहचान लेकर खड़ा है। इसलिए अब चुनावी समय में दिनकर की पहचान भी भूमिहार की है।

डाकखाने में डीएनए:
नीतीश कुमार पर डीएनए को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हमले (नीतीश कुमार के डीएनए में कुछ खोट है) ने डाक विभाग का सिरदर्द बढ़ा दिया। दिल्ली के निर्माण विभाग डाकखाने में (जो पीएमओ के खतों की देखरेख करता है) में बिहार से आए खतों का अंबार लग गया और इन खतों में डीएनए के नमूने भी थे। डाकखाने को 117 बड़े मेल बैग्स मिले हैं, जिनमें से प्रत्येक में करीब 1,000 खत थे। इमनें 1 लाख से ज्यादा डीएनए सैंपल्स थे जिनमें ज्यादातर में सिर के बाल और नाखून के टुकड़े हैं। ये सारी चीजें अब पीएमओ की संपत्ति है। और अब इनकी रिपोर्ट तो 8 नवंबर को ही सामने आएगी।

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