2027 की जनगणना में जातियों की गिनती का मुद्दा राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। सरकार ने जातियों की जानकारी जुटाने के लिए ड्रॉप-डाउन मेन्यू के बजाय ‘ओपन-एंडेड सवाल’ का तरीका अपनाने का फैसला किया है। इस फैसले पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सही आंकड़ों के बिना सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों को प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।

इंडियन एक्सप्रेस को पता चला है कि इस पूरी प्रक्रिया से जुड़ी सरकार की दो प्रमुख इकाइयां- भारत के रजिस्ट्रार जनरल का कार्यालय (ORGI) और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय (MoSJE) भी हर मुद्दे पर एकमत नहीं थीं।

सूत्रों के मुताबिक, एक जून को हुई एक अहम बैठक में मंत्रालय के अधिकारियों ने जातियों की गिनती के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) के पास मौजूद OBC जातियों की सूची साझा करने की इच्छा जताई थी। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय की ओर से तैयार बैठक के शुरुआती मसौदा में इस प्रस्ताव को सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया।

मंत्रालय की ओर से आपत्ति जताए जाने के बाद रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय ने संशोधित मसौदा स्वीकार कर लिया।

जातियों की कोई सूची उपलब्ध नहीं

सूत्रों के मुताबिक, मंत्रालय की ओर से यह प्रस्ताव भारत के रजिस्ट्रार जनरल मृत्युंजय कुमार नारायण की अध्यक्षता में हुई बैठक में रखा गया था। बैठक में अतिरिक्त रजिस्ट्रार जनरल सुनील कुमार, मंत्रालय के संयुक्त सचिव शैलेंद्र कुमार और अन्य अधिकारी भी शामिल हुए थे।

सूत्रों ने बताया कि 8 जून को रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय ने बैठक को लेकर चार पैराग्राफ का एक नोट जारी किया। इस नोट में लिखा था कि मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि जातियों की सूची तैयार रखने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है और इसलिए ऐसी कोई लिस्ट उनके पास उपलब्ध नहीं है।

हालांकि, नोट के मुताबिक मंत्रालय ने यह भी बताया था कि उसके पास अनुसूचित जातियों (SC) की अधिसूचित सूची है जिसमें 1258 प्रविष्टियां हैं। इसके अलावा उसके पास अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की केंद्रीय सूची है जिसमें 2483 प्रविष्टियां हैं। जरूरत पड़ने पर ये दोनों सूचियां रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय को उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

सूत्रों के अनुसार, नोट में आगे कहा गया कि चूंकि जातियों की कोई सूची उपलब्ध नहीं है। इसलिए 2027 की जनगणना में सवाल के अंदर पहले से तय जातियों की सूची देकर जातियों की गिनती करना संभव नहीं हो सकता।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बातचीत में मंत्रालय के अधिकारियों ने इस भाषा पर आपत्ति जताई और इसे ‘एक जाल’ बताया। एक अधिकारी ने कहा, ”हमें लगा कि पहले से तय सूची के साथ आगे नहीं बढ़ने की जिम्मेदारी हम पर डाली जा रही थी।”

11 जून को मंत्रालय ने इस नोट का संशोधित संस्करण रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय को भेजा। सूत्रों के मुताबिक, इस नोट में कहा गया कि मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया है कि संविधान के तहत जातियों के संबंध में मंत्रालय अनुसूचित जाति (SC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सूची रखता है।

सूत्रों के अनुसार नोट में कहा गया, ”अनुसूचित जातियों की सूची और OBC की केंद्रीय सूची के अलावा अलग से ‘जातियों’ की कोई सूची रखना विभाग के लिए जरूरी नहीं है।”

नोट में यह भी बताया गया कि 1258 प्रविष्टियों वाली अनुसूचित जातियों की सूची 25 सितंबर 2025 को एक पत्र के जरिए पहले ही भारत के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय (ORGI) को दी जा चुकी है। वहीं करीब 2483 प्रविष्टियों वाली OBC की केंद्रीय सूची जरूरत पड़ने पर ORGI को उपलब्ध कराई जाएगी।

सूत्रों के मुताबिक, नोट में आगे कहा गया कि अनुसूचित जातियों और OBC की केंद्रीय सूची के अलावा अलग से ‘जातियों’ की सूची रखने का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग (DoSJ&E) के अधिकारी इस मामले में आगे कोई मदद नहीं कर सके। जानकारी के मुताबिक, 30 जून को रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय ने संशोधित नोट को स्वीकार कर लिया।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने इस मामले पर रजिस्ट्रार जनरल मृत्युंजय कुमार नारायण और मंत्रालय के सचिव सुधांश पंत से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की लेकिन दोनों की ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

फरवरी से देशभर में जातिगत जनगणना

पिछले महीने जारी सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, अगले साल फरवरी में देशभर में जनगणना के साथ जातिगत जनगणना भी कराई जाएगी। वहीं पहाड़ी और बर्फीले इलाकों में सर्दियों के दौरान होने वाली दिक्कतों से बचने के लिए यह प्रक्रिया 1 सितंबर से ही शुरू हो गई है।

सरकार का कहना है कि जातियों की गिनती के लिए लोगों से खुले तौर पर उनकी जाति पूछना ही सबसे सही तरीका है। इससे सरकार खुद किसी जाति की पहचान तय करने वाली संस्था नहीं बनेगी। हालांकि इस तरीके से एक बड़ी चुनौती भी सामने आती है। सवाल यह है कि लोगों की ओर से बताए गए लाखों अलग-अलग जाति नामों को बिना उनकी पहचान बदले या तय किए एक भरोसेमंद और एक जैसी सूची में कैसे बदला जाए।

मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, 2027 की जातिगत जनगणना में पिछली कवायद की ‘नाकामी दोहराए जाने’ का खतरा है। 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) पर करीब 4900 करोड़ रुपये खर्च हुए थे।

2011 की SECC में लोगों ने 46.7 लाख अलग-अलग जातियों के नाम बताए थे। यह संख्या 1931 में दर्ज 4147 जातियों के मुकाबले बेहद ज्यादा थी। इतने बड़े अंतर के कारण 2011 की जातिगत गणना के आंकड़ों को व्यवस्थित और मानकीकृत करना एक बड़ी चुनौती बन गया था।

जनगणना में अधिसूचित अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए पहले से तय ड्रॉप-डाउन सूची का इस्तेमाल किया जाता है। 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) के आंकड़े 2016 में ग्रामीण विकास और शहरी विकास मंत्रालयों ने जारी किए थे लेकिन जाति से जुड़े आंकड़े इसमें शामिल नहीं किए गए।

जाति से जुड़े आंकड़े सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को सौंपे गए थे। मंत्रालय ने इन आंकड़ों को वर्गीकृत और व्यवस्थित करने के लिए तत्कालीन नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में विशेषज्ञों का एक समूह बनाया था। हालांकि, इन आंकड़ों को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।

सरकार ने पुरानी नीति बदली

2027 की जनगणना में जातियों की गिनती को 30 अप्रैल 2025 को कैबिनेट कमेटी ऑन पॉलिटिकल अफेयर्स (CCPA) ने मंजूरी दी थी। इसके साथ ही सरकार ने इस मुद्दे पर अपनी पुरानी नीति बदली और लंबे समय से चली आ रही जातिगत जनगणना की मांग को स्वीकार किया।

मई 2010 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने 2011 की जनगणना के साथ जातियों की गिनती कराने का वादा किया था। इसके बाद इस मुद्दे पर विचार करने के लिए मंत्रियों का एक समूह (GoM) बनाया गया। समूह की सिफारिशों के आधार पर सितंबर 2010 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अलग से सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) कराने का फैसला लिया।

हालांकि, सरकार ने 21 सितंबर और 14 दिसंबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामों में कहा था कि 2011 की SECC के दौरान जुटाए गए जाति के आंकड़े इस्तेमाल करने लायक नहीं हैं। सरकार ने इसकी वजह आंकड़ों में गलतियां और तकनीकी कमियां बताई थीं।

15 दिसंबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार के हलफनामे में बताई गई व्यावहारिक कमियों का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा था कि सरकार ने अपने हलफनामे में साफ तौर पर माना है कि तैयार किए गए आंकड़े सटीक नहीं हैं और किसी भी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं किए जा सकते।