इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (मेंटेनेंस) से जुड़े मामले में महिला के खिलाफ सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की। अदालत ने वैवाहिक कानून में एक अहम सिद्धांत को दोहराते हुए कहा है कि भरण-पोषण ऐसा सहारा नहीं है, जिससे किसी सक्षम जीवनसाथी को काम न करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। कोर्ट ने एक उच्च शिक्षित डॉक्टर पत्नी की अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) की मांग खारिज कर दी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि जो जीवनसाथी कमाने में सक्षम है, वह खुद काम न करके दूसरे पर आर्थिक बोझ नहीं डाल सकता।

यह फैसला प्रथम अपील संख्या 594/2025 में जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने दिया। मामला दो उच्च शिक्षित डॉक्टरों के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा था। पत्नी जो स्त्रीरोग विशेषज्ञ हैं, उन्होंने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 और 26 के तहत उनकी भरण-पोषण की याचिका आंशिक रूप से खारिज कर दी गई थी।

पत्नी ने बेरोजगार होने की दी दलील

ट्रायल कोर्ट ने तीन बच्चों के लिए भरण-पोषण मंजूर करते हुए पति जो न्यूरोसर्जन है, उनको 60,000 रुपये प्रति महीने देने का निर्देश दिया था। लेकिन पत्नी को धारा 24 के तहत भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया था। इस आंशिक अस्वीकृति से नाराज होकर पत्नी ने हाई कोर्ट का रुख किया और दलील दी कि वह फिलहाल बेरोजगार हैं।

उन्होंने कहा कि वैवाहिक जीवन के दौरान वह जिस स्तर की जिंदगी जी रही थीं, उसे बनाए रखने के लिए उन्हें आर्थिक सहायता की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि विवाद शुरू होने के बाद उन्हें नौकरी से हटा दिया गया और उनके पास फिलहाल आय का कोई स्रोत नहीं है। पत्नी की ओर से चतुर्भुज वी सीताबाई के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि जहां जीवनसाथी खुद का भरण-पोषण नहीं कर सकता, वहां उसे मेंटेनेंस मिलना चाहिए।

वहीं, पति ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि वह पहले से ही बच्चों के भरण-पोषण के लिए 60,000 रुपये प्रति माहहर महीने दे रहे हैं। उन्होंने यह भी दलील दी कि पत्नी एक उच्च शिक्षित डॉक्टर हैं और उनकी कमाई की क्षमता पति से भी अधिक हो सकती है। इसलिए वे खुद को आश्रित नहीं बता सकतीं।

पत्नी पूरी तरह सक्षम और योग्य

हाई कोर्ट ने सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि चतुर्भुज मामले का फैसला उन परिस्थितियों में लागू होता है, जहां पत्नी सही में खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो, जबकि इस मामले में पत्नी पूरी तरह सक्षम और योग्य हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी के पास एमडी (स्त्रीरोग विशेषज्ञ) की डिग्री है और वे अपने पेशे में अच्छी कमाई कर सकती हैं। ऐसे में उनकी योग्यता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह मानने से इनकार किया कि पत्नी की बेरोजगारी अनिवार्य है और इसे स्वेच्छा से काम न करने का मामला माना।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा – “अगर कोई योग्य व्यक्ति अपनी विशेषज्ञता के आधार पर पर्याप्त आय अर्जित कर सकता है फिर भी जानबूझकर काम नहीं करता और अपने जीवनसाथी पर आर्थिक बोझ डालने का प्रयास करता है तो ऐसी स्थिति में अदालत धारा 24 के तहत भरण-पोषण से इनकार कर सकती है।”

आयकर रिटर्न का भी हवाला दिया

अपने फैसले में कोर्ट ने आयकर रिटर्न का भी हवाला दिया जिसमें पत्नी की वार्षिक आय 31 लाख रुपये से अधिक बताई गई थी। इससे उनकी आर्थिक क्षमता स्पष्ट होती है और उनकी निर्भरता का दावा कमजोर पड़ता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों के भरण-पोषण को लेकर कोई विवाद नहीं है और पति पहले से ही 60,000 रुपये हर महीने दे रहे हैं।

आखिर में हाई कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि पत्नी, जो एक उच्च शिक्षित और कमाने में सक्षम पेशेवर हैं धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण की हकदार नहीं हैं क्योंकि वे खुद अपना भरण-पोषण कर सकती हैं।

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