सोमवार को राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने राघव चड्ढा समेत आम आदमी पार्टी के सात सांसदों के भाजपा में विलय को मंजूरी दी। हालांकि आम आदमी पार्टी ने सीपी राधाकृष्णन को पत्र लिखकर इन सभी सांसदों की सदस्यता रद्द किए जाने की मांग की थी। संसद के ऊपरी सदन में पहले आप के 10 सांसद थे। अब यह संख्या घटकर तीन रह गई है। जबकि भाजपा की संख्या 106 से बढ़कर 113 हो चुकी है।
सांसदों के पाला बदलने के बाद आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सभी सात सांसदों के खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग की थी। संवैधानिक जानकारों के अनुसार चूंकि राज्यसभा के सभापति ने बागी सासंदों के भाजपा में विलय को मंजूरी दे दी है इसलिए आम आदमी पार्टी के पास सुप्रीम कोर्ट का रुख करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।
अगर यह मामला सुप्रीम कोर्ट जाता है तो राघव चड्ढा समेत आप के अन्य सात राज्यसभा सांसदों की सदस्यता रहेगी या जाएगी, यह सर्वोच्च अदालत तय करेगी मगर कुछ पुराने मामलों और संवैधानिक हवालों से कुछ रोशनी पड़ती है। राघव चड्ढा ने अन्य बागी सांसदों के साथ पार्टी छोड़ने की घोषणा करते समय दावा किया कि उनका कदम दलबदल नहीं करार दिया जाएगा क्योंकि यह संविधान की 10वीं अनुसूची में अपवाद को आकर्षित करेगा।
संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत पार्टी छोड़ना अयोग्यता का आधार माना जाता है। हालांकि, अनुच्छेद-4 में विलय का अपवाद मौजूद है, जिसमें अगर दो तिहाई विधायक या सांसद पार्टी छोड़कर दूसरे दल में विलय करते हैं तो सदन में उनकी सदस्यता नहीं रद्द होगी।
एक सदन या दोनों सदन का पेंच
आप के सात राज्यसभा सांसदों के पार्टी बदल में एक अहम सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक सदन के सांसदों का दो-तिहाई होना किसी पार्टी के विलय के लिए काफी है या या फिर मूल राजनीतिक पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों का विलय जरूरी है? इस मामले में विवाद का केंद्र यह है कि सिर्फ सांसदों का समूह अलग होना “विलय” नहीं माना जा सकता। क्या पूरी आम आदमी पार्टी भाजपा में मर्ज हुई है? अगर नहीं तो यह दलबदल माना जा सकता है और कार्रवाई के रूप में राघव समेत सातों सांसदों की सदस्यता जा सकती है।
ऐसे में मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का संदर्भ देखा जा सकता है, जिसमें यह स्थापित है कि पार्टी और विधायक दल अलग होते हैं। पहले भी कोर्ट ने अपने फैसलों में कहा है कि सिर्फ विधायकों या सांसदों का समूह टूटना पर्याप्त नहीं है। मूल राजनीतिक पार्टी की भूमिका महत्वपूर्ण है। अगर कोई नेता स्वेच्छा से पार्टी छोड़ता है तो यह खुद में अयोग्यता का आधार है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे “संवैधानिक पाप” तक कहा है।
हालांकि, पूरे विवाद में एक जटिल विषय है – विलय की परिभाषा। यही इस केस को कानूनी रूप से पेचिदा बनाता है। चूंकि इस मामले में राज्यसभा अध्यक्ष ने स्वीकृति दे दी है। ऐसे में आप सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है। अगर, पार्टी ऐसा करती है तो यह मामला तय करेगा कि “दो तिहाई का गणित” ज्यादा महत्वपूर्ण है या “पूरी पार्टी की सहमति”। ऐसा इसलिए क्योंकि विभिन्न अदालती फैसलों और विधानसभा या संसद के अध्यक्षों के निर्णयों ने अक्सर ‘विधायी दल’ के दो तिहाई बहुमत को ही विलय का आधार मान लिया है।
क्या है दल-बदल विरोधी कानून?
भारतीय राजनीति में दल-बदल की प्रवृत्ति कोई नई बात नहीं है। 1960 और 70 के दशक में विधायकों और सांसदों द्वारा बार-बार पार्टी बदलने की घटनाओं ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अस्थिर कर दिया था। इसी पृष्ठभूमि में “आया राम, गया राम” जैसी कहावत प्रचलन में आई। इस राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए 1985 में दल-बदल विरोधी कानून लागू किया गया, जिसने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित किया।
दलबदल विरोधी कानून को 1985 में 52वां संविधान संशोधन के जरिए संविधान में जोड़ा गया। इसके तहत संविधान की दसवीं अनुसूची में विशेष प्रावधान शामिल किए गए। साल 2003 में 91वां संविधान संशोधन के माध्यम से इसे और सख्त बनाया गया, ताकि राजनीतिक दलों में टूट-फूट को रोका जा सके।
कब लागू होता है यह कानून?
यह कानून उन परिस्थितियों में लागू होता है जब कोई जनप्रतिनिधि चाहे वह सांसद हो या विधायक अपनी पार्टी के खिलाफ जाकर काम करता है। यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ देता है या पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
इसके अलावा, निर्दलीय सदस्य यदि चुनाव के बाद किसी दल में शामिल हो जाता है, या नामित सदस्य छह महीने के भीतर पार्टी नहीं चुनता और बाद में शामिल होता है, तो वह भी इस कानून के दायरे में आता है।
निर्णय की प्रक्रिया और न्यायिक दखल
दलबदल के मामलों में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार सदन के अध्यक्ष या स्पीकर के पास होता है। लोकसभा में लोकसभा अध्यक्ष और विधानसभा में सभापति। हालांकि, इस प्रक्रिया को लेकर निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू में स्पष्ट किया कि स्पीकर का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएगा।
शुरुआत में कानून में यह प्रावधान था कि अगर किसी दल के एक-तिहाई सदस्य अलग होकर नया समूह बनाते हैं, तो उसे वैध माना जाएगा। लेकिन इस प्रावधान का दुरुपयोग होने लगा। इसे रोकने के लिए 91वें संशोधन में स्प्लिट की व्यवस्था खत्म कर दी गई और अब केवल तब ही विलय मान्य होगा जब किसी दल के दो-तिहाई सदस्य एक साथ पार्टी बदलें।
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राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों ने आम आदमी पार्टी छोड़ दी। यह सभी बीजेपी ज्वाइन कर चुके हैं। हालांकि राघव चड्ढा और अन्य 6 सांसदों की सदस्यता अभी नहीं जाएगी। अगर चार साल पहले राज्यसभा के सबसे युवा सदस्य के तौर पर उन्होंने जो पहला बिल पेश किया था, वह कानून बन जाता, तो राघव चड्ढा AAP छोड़कर BJP में मर्ज नहीं कर पाते। पूरी खबर पढ़ें…
