मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने घोषणा की कि उनकी सरकार 18 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों को आधार कार्ड जारी करना बंद कर देगी। हिमंता ने यह कदम अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों द्वारा भारतीय पहचान दस्तावेजों को प्राप्त करने पर रोक लगाने के उपाय के रूप में प्रस्तुत किया।
हालांकि, इसको लेकर एक्सपर्ट की राय बंटी हुई है कि क्या राज्य सरकार, जिसकी भूमिका आधार व्यवस्था में केवल एक “रजिस्ट्रार” की होती है, आधार नामांकन के लिए पहले से मंजूरी (प्री-क्लियरेंस) लेने की शर्त लगा सकती है। क्योंकि ऐसी कोई व्यवस्था न तो 2016 के आधार कानून में है और न ही भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) द्वारा बनाए गए नियमों और प्रक्रियाओं में शामिल है।
आधार अधिनियम के अंतर्गत, रजिस्ट्रार वह संस्था होती है जिसे यूआईडीएआई लोगों का आधार नामांकन करने के लिए अधिकृत या मान्यता देता है। राज्य सरकारें भी प्रमुख रजिस्ट्रारों में शामिल हैं और यूआईडीएआई के साथ हुए समझौते (एमओयू) के तहत उनकी जिम्मेदारी केवल उन्हें सौंपे गए कार्यों और नियमों का पालन करना है।
हिमंता सरमा ने कहा कि अब असम में जिला स्तर पर वयस्कों के लिए आधार कार्ड स्वीकृत नहीं किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि अगर कोई वास्तविक व्यक्ति आधार कार्ड जारी करता है, तो उपायुक्त प्रस्ताव भेजेंगे और सरकार उसे मंजूरी देगी। लेकिन उपायुक्त स्तर पर 18 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी नागरिक को आधार कार्ड जारी नहीं किया जाएगा।
विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के सह-संस्थापक आलोक प्रसन्ना कुमार कहते हैं, “राज्य सरकार के पास आधार नामांकन रोकने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। ज्यादा से ज़्यादा, राज्य सरकार केंद्र सरकार से अनुरोध कर सकती है कि वह यूआईडीएआई को भी ऐसा करने के लिए कहे।”
प्रसन्ना कुमार ने आगे कहा कि आधार कार्ड जारी करने में राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं है। व्यक्ति सीधे यूआईडीएआई को आवेदन करता है। बायोमेट्रिक्स की प्रक्रिया केंद्रीय स्तर पर की जाती है और यूआईडीएआई कार्ड जारी करता है।
आधार प्रणाली पर व्यापक रूप से लिखने वाली कार्यकर्ता उषा रामनाथन का भी कहना है कि असम की कार्रवाई “सत्ता का सीधा दुरुपयोग… कानून की अवहेलना का एक बेशर्म बयान” प्रतीत होती है।
आधार को लेकर दिशा-निर्देश
UIDAI अधिनियम की धारा 3(1) के अनुसार, भारत में रहने वाला हर व्यक्ति आधार नंबर बनवाने का हकदार है। इसके लिए उसे नामांकन प्रक्रिया के दौरान अपनी व्यक्तिगत जानकारी (जैसे नाम, पता, जन्मतिथि) और बायोमेट्रिक जानकारी (जैसे उंगलियों के निशान और आंखों की स्कैनिंग) देनी होती है।
कानून के मुताबिक, “निवासी” वह व्यक्ति है जो आधार के लिए आवेदन करने से पहले के पिछले 12 महीनों में कुल मिलाकर कम से कम 182 दिन या उससे अधिक समय तक भारत में रहा हो। आधार बनवाने के लिए कोई न्यूनतम या अधिकतम आयु सीमा तय नहीं की गई है। यानी नवजात शिशु भी आधार कार्ड बनवा सकता है। धारा 3(1) का प्रावधान केवल केंद्र सरकार को ही ऐसे व्यक्तियों की किसी अतिरिक्त श्रेणी को अधिसूचित करने का अधिकार देता है जो पात्र हो सकते हैं।
अधिनियम की धारा 9 में कहा गया है कि आधार संख्या स्वतः ही “नागरिकता या अधिवास का कोई अधिकार प्रदान नहीं करती है, न ही इसका प्रमाण है। अतः आव्रजन पर नियंत्रण के लिए आधार नामांकन का उपयोग करने के निर्णय को अधिनियम में आधार की परिभाषाओं के संदर्भ में ही किए गए दावों का सामना करना होगा।
केंद्र सरकार के सूत्रों का कहना है कि वयस्क नामांकन के लिए पहले से ही राज्य सरकार की मंजूरी आवश्यक है और असम का “घुसपैठ” वाला तर्क महज़ इसका एक बहाना है। इन अधिकारियों के अनुसार, 18 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति द्वारा आधार कार्ड के लिए आवेदन करने पर, UIDAI दस्तावेज़ स्वीकार तो करता है, लेकिन सत्यापन के बाद संबंधित राज्य सरकारों की मंजूरी मिलने पर ही आगे की प्रक्रिया शुरू करता है।
असम सरकार के एक अधिकारी ने भी यही तर्क दिया है। उनका कहना है कि आधार कार्ड के लिए जिला स्तर पर सत्यापन का प्रोटोकॉल पहले से ही लागू था, खासकर अगस्त 2025 में कैबिनेट के उस फैसले के बाद जिसमें 1 अक्टूबर से सभी वयस्क नामांकन के लिए जिला कलेक्टर की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई थी।
अधिकारी ने कहा कि लगभग 2021 तक लक्ष्य आधार कवरेज बढ़ाना था, लेकिन उसके बाद राज्य सरकारों को जांच लागू करने की जिम्मेदारी दी गई। इसलिए हर राज्य में, आधार केंद्रों में प्राप्त आवेदन राज्य को भेजे जाते हैं और वहां से ज़िलों को यह सत्यापित करने के लिए भेजे जाते हैं कि आवेदक उस विशेष जिले में रहता है या नहीं।
हालांकि, यूआईडीएआई की नामांकन प्रक्रिया में यह तो कहा गया है कि आवेदनों का सत्यापन राज्य अधिकारियों के माध्यम से किया जा सकता है, लेकिन 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी आवेदकों के पहली बार आधार नामांकन के लिए जिला स्तरीय मंजूरी का कोई प्रावधान नहीं है।
प्रसन्ना कुमार के अनुसार, यूआईडीएआई के कानून के तहत राज्य द्वारा किसी भी प्रकार की अतिरिक्त जांच की अनुमति नहीं है। भले ही राज्य जवाब न दे, कानून आपको यह अधिकार देता है। इनकार करने के वैध कारण केवल यही हैं कि व्यक्ति निवासी नहीं है या धोखाधड़ी कर रहा है। यदि कोई व्यक्ति वैध दस्तावेजों के साथ निवासी है, तो असम या कोई भी अन्य राज्य आधार कार्ड जारी करने में बाधा नहीं डाल सकता।
रमनाथन का कहना है कि राज्य सरकार की भूमिका केवल एक रजिस्ट्रार के रूप में नामांकन प्रक्रिया को आसान बनाना और आवेदन को UIDAI तक पहुंचाना है। उनके मुताबिक, आधार नामांकन के लिए UIDAI जितनी जानकारी मांगता है, उससे अधिक कोई भी जानकारी या दस्तावेज किसी व्यक्ति से नहीं मांगे जा सकते।
वह आगे कहती हैं कि असम में यह आशंका है कि न केवल गैर-नागरिकों को नामांकन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। बल्कि जिन्हें नामांकन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, उन्हें नागरिकता से वंचित कर दिया जाएगा, जब तक कि तत्कालीन सरकार अन्यथा निर्णय न ले ले।
न्यायालय की व्याख्या
सर्वोच्च न्यायालय ने पहले भी आधार कार्ड और असम सरकार के आदेशों के परस्पर संबंध पर विचार किया है। 2022 में, एक बेंच ने केंद्र सरकार, यूआईडीएआई और असम को एक याचिका पर नोटिस जारी किया था जिसमें तर्क दिया गया था कि आधार अधिनियम में किसी भी वर्ग के निवासियों को आधार कार्ड जारी करने पर कोई रोक नहीं है, और राष्ट्रीय नागरिक गणना (एनआरसी) के आधार पर इनकार करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हुए एक वर्ग के भीतर एक और वर्ग का निर्माण करता है। ये मामले अभी भी लंबित हैं।
पिछले महीने, सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने एक जनहित याचिका का निपटारा किया। जिसमें 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए नए आधार पंजीकरण को प्रतिबंधित करने की मांग की गई थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि अवैध घुसपैठियों द्वारा इस प्रणाली का दुरुपयोग किया जा रहा है। न्यायालय ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि ये कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आने वाले नीतिगत मामले हैं।
असम में एक्टिव आधार धारक
31 मई 2026 तक के UIDAI के राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, असम में आधार की पहुंच लगभग 91.46 प्रतिशत है। राज्य में करीब 3.36 करोड़ सक्रिय आधार धारक हैं, जबकि अनुमानित आबादी 3.67 करोड़ है। यह आंकड़ा देश के 94.43 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से कम है।
UIDAI के अनुसार, ये आंकड़े आधार में दर्ज वर्तमान पते के आधार पर तैयार किए जाते हैं। इसलिए इससे यह पता नहीं चलता कि आधार धारक मूल रूप से किस राज्य के निवासी हैं। यानी केवल इन आंकड़ों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि कितने आधार धारक वास्तव में असम के मूल निवासी हैं।
असम में 18 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए आधार कार्ड जारी करने पर रोक, कैबिनेट का बड़ा फैसला
कैबिनेट बैठक की जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “असम कैबिनेट ने फैसला किया है कि 18 वर्ष से अधिक उम्र के किसी भी व्यक्ति को आधार कार्ड नहीं दिया जाएगा। हालांकि ST, SC और चाय बागान समुदाय के लोगों को मार्च 2027 तक आधार कार्ड मिलते रहेंगे।” पढ़ें पूरी खबर।
