पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव ने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में निर्णायक बदलाव ला दिया है। भाजपा ने 294 में से 207 सीटें जीतकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वर्चस्व को समाप्त कर दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि यह परिणाम क्षणिक लहर या सत्ता विरोधी लहर का नतीजा नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित अभियान का परिणाम है जिसने विभिन्न क्षेत्रों में लंबे समय से चले आ रहे मतदान पैटर्न को पूरी तरह से बदल दिया है।
चुनाव से पहले किए गए आंतरिक आकलन (Internal Assessments) से पता चला कि टीएमसी ने मुस्लिम आबादी वाले महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी बढ़त बरकरार रखी है। हालांकि, 170 से ज्यादा सीटों पर भाजपा करीब तीन प्रतिशत अंकों की बढ़त बनाए हुए थी। इससे यह संकेत मिलता है कि जमीनी स्तर पर उसकी मेहनत और वोटरों तक पहुंच बनाने की रणनीति असरदार साबित हो रही थी।
भाजपा की रणनीति का एक प्रमुख स्तंभ उन समुदायों तक पहुंचना था जो राजनीतिक रूप से हाशिए पर महसूस करते थे। उत्तरी बंगाल में, जिसमें कूच बिहार, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, दार्जिलिंग, कालीम्पोंग, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर जिले शामिल हैं। पार्टी ने राजबंशी और कुर्मी मतदाताओं के बीच उनकी भाषाओं और सांस्कृतिक पहचान को मान्यता देने का वादा करके, साथ ही आधिकारिक ढांचों में शामिल करने की मांगों को पूरा करने का वादा किया और अपना समर्थन मजबूत किया।
पहचान की राजनीति के साथ-साथ भाजपा ने आर्थिक चिंताओं को भी प्रमुखता दी। जिसमें आलू और धान किसानों के लिए बेहतर कीमतों का वादा किया और सरकारी कर्मचारियों को आश्वासन दिया कि सत्ता में आने के 45 दिनों के भीतर 7वें वेतन आयोग के लाभ लागू किए जाएंगे।
दार्जिलिंग, अलीपुरदुआर और जलपाईगुड़ी के चाय बागान क्षेत्रों में भाजपा ने उल्लेखनीय बढ़त हासिल की। खासकर महिला मतदाताओं के बीच। कई महिलाएं टीएमसी समर्थित प्रत्यक्ष लाभ योजनाओं से दूर होती नजर आईं और इसके बजाय दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता, रोजगार सुरक्षा और बागानों में बेहतर कामकाजी परिस्थितियों के वादों पर भरोसा जताया।
उत्तर बंगाल को भाजपा का गढ़ माना जाता है। हालांकि कुछ इलाकों में टीएमसी मजबूत नजर आती है। यहां, टीएमसी कई जिलों में एक भी सीट जीतने में नाकाम रही। भाजपा ने दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी में शानदार जीत हासिल की और दोनों जिलों की सभी पांचों सीटें जीत लीं।
बाहरी होने की धारणा को खत्म किया
पार्टी ने कोलकाता जैसे शहरी केंद्रों में अपनी छवि को सुधारने के लिए कोशिश की। बाहरी होने की धारणा को दूर करने के लिए भाजपा उम्मीदवारों ने स्थानीय स्तर पर ज्यादा मेहनत की। उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों में बांग्ला का उपयोग किया, क्षेत्रीय त्योहारों और परंपराओं में भाग लिया और आवासीय परिसरों और पड़ोसी लोगों से बातचीत की। इससे उस सांस्कृतिक खाई को पाटने में मदद मिली जिसने पहले शहरी मतदाताओं के बीच पार्टी की लोकप्रियता को सीमित कर रखा था।
आसपास के शहरी क्षेत्रों में भी जिन्हें परंपरागत रूप से टीएमसी का गढ़ माना जाता था। इसने भाजपा की “भूमिपुत्र” वाली छवि ने विरोध को कम करने में मदद की। सांस्कृतिक अनुकूलन और निरंतर जनसंपर्क के संयोजन से भाजपा ने महानगरीय मध्यम वर्ग के कुछ वर्गों के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाई।
मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में चुनाव प्रचार के संदेशों में स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया। जिनमें कानून व्यवस्था और मानव तस्करी जैसे मुद्दे शामिल थे। ये मुद्दे मतदाताओं को पसंद आए, क्योंकि उनका मानना था कि टीएमसी के 15 साल के शासनकाल में शासन संबंधी चुनौतियों का पर्याप्त समाधान नहीं हुआ था। दलित और राजबंशी वोटों का पूर्ण समर्थन हासिल करते हुए भाजपा ने मालदा सीट 50,000 से ज्यादा वोटों से जीत ली।
टॉप लीडरशिप का कोऑर्डिनेशन
भाजपा के चुनाव प्रचार अभियान का समन्वय एक सुसंगठित नेतृत्व दल द्वारा किया गया था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राज्य में लंबे समय तक रहकर कई रैलियां कीं और रणनीति की समीक्षा की। धर्मेंद्र प्रधान और भूपेंद्र यादव जैसे वरिष्ठ नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व को राज्य इकाइयों के साथ समन्वय स्थापित करने का काम किया, जबकि सुनील बंसल जैसे संगठनात्मक व्यक्तियों ने बूथ स्तर पर क्रियान्वयन और चुनाव प्रचार की व्यवस्था का जिम्मा संभाला।
भाजपा नेताओं के अनुसार, पार्टी ने अगस्त 2022 में कैलाश विजयवर्गीय की जगह बंसल को पश्चिम बंगाल का प्रभारी बनाकर राज्य में जीत हासिल करने के लिए ज्यादा धैर्यपूर्ण और व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाने का संकेत दिया।
एक सूत्र ने बताया, “बंसल की रणनीति बड़े-बड़े भाषणों के बजाय बारीक आंकड़ों पर आधारित है। उत्तर प्रदेश, ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्यों में पार्टी को सफलता दिलाने के बाद वे बूथ से लेकर जिला स्तर तक की रणनीति पर बारीकी से ध्यान देते हैं। राज्य भर में फैले 80,000 से ज्यादा मतदान केंद्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए भाजपा ने 2024 के अंत तक 65,000 से ज्यादा मतदान केंद्रों पर कार्यात्मक समितियां स्थापित कर ली थीं। राज्य में किसी भी विपक्षी दल के लिए यह अभूतपूर्व है।”
एक अन्य सूत्र ने बताया कि भूपेंद्र यादव ने रणनीतिक गहराई प्रदान की और कार्यकर्ताओं के साथ दैनिक समन्वय का प्रबंधन किया। सूत्र ने आगे कहा कि उन्होंने कई जिलों का दौरा करते हुए कई महीने बिताए। वह स्थानीय परंपराओं से जुड़े, जिससे उन्हें राज्य के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को ज्यादा प्रभावी ढंग से समझने में मदद मिली।
त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने भी पार्टी के चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभाई। चूंकि त्रिपुरा के भाजपा कार्यकर्ता बांग्ला भाषा बोल सकते हैं। इसलिए अन्य राज्यों से जुटाए गए कार्यकर्ताओं की तुलना में वे भाषा की बाधा को दूर करने में ज्यदा उपयोगी साबित हुए। इन नेताओं को चुनाव से पहले और चुनाव प्रचार के दौरान बूथ स्तर और जिला स्तर पर तैनात किया गया था।
बूथों पर लोगों को जुटाने के उनके अनुभव (त्रिपुरा में 2018 में भाजपा ने वामपंथी दलों को हराया था) ने पार्टी के पन्ना प्रमुखों (कार्यवाहक) को प्रशिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन बूथ कार्यकर्ताओं को टीएमसी की मशीनरी को बेअसर करने के लिए चुनिंदा रूप से तैनात किया गया। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, देब ने टीएमसी के शासन में हाशिए पर धकेले जाने से नाखुश वामपंथी कार्यकर्ताओं से भी संपर्क साधा।
इसमें एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक विशेषता “पन्ना प्रमुख” प्रणाली का विस्तार भी था। बूथ स्तर के कार्यकर्ता जो मतदाताओं के छोटे समूहों के साथ सीधा संपर्क बनाए रखने के लिए जिम्मेदार थे। इस संरचना ने पार्टी को निर्वाचन क्षेत्रों में निरंतर जुड़ाव बनाए रखने और स्थानीय चिंताओं का तुरंत समाधान करने में सक्षम बनाया।
डेटा का लाभ उठाना
रणनीतिक योजना विस्तृत डेटा मैपिंग पर भी आधारित थी। वरिष्ठ अभियान प्रबंधकों ने कथित तौर पर प्रमुख प्रचारकों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बड़े निर्वाचन क्षेत्र के नक्शों का उपयोग किया और राजनीतिक आवश्यकताओं के आधार पर नेताओं को अलग-अलग क्षेत्र आवंटित किए। इससे संसाधनों का ज्यादा कुशल उपयोग संभव हुआ और यह सुनिश्चित हुआ कि अभियान के दौरान दूरदराज के क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया जाए।
जंगलमहल क्षेत्र- पुरुलिया, झारग्राम, बांकुरा, पश्चिम मेदिनीपुर में पार्टी ने कुर्मी प्रतिनिधित्व पर ध्यान केंद्रित किया और राजेश महतो और बिस्वजीत महतो जैसे स्थानीय नेताओं को मैदान में उतारा। साथ ही पेयजल, आवास और सांस्कृतिक मान्यता जैसे मुद्दों को भी उठाया। इससे पुरुलिया और झारग्राम जैसे जिलों में पार्टी के मजबूत प्रदर्शन में योगदान मिला।
चुनाव प्रचार में आर्थिक विकास पर भी जोर दिया गया। जिसमें भाजपा नेताओं ने चाय और सिनकोना के बागानों, कोयला क्षेत्रों और बंदरगाह अवसंरचना जैसे क्षेत्रों की अपार संभावनाओं की ओर इशारा किया। उन्होंने तर्क दिया कि टीएमसी के शासनकाल में औद्योगिक विकास धीमा हो गया था और अपने अभियान को नए सिरे से निवेश और रोजगार के द्वार के रूप में प्रस्तुत किया।
कोलकाता के DCP शांतनु सिन्हा के खिलाफ ED ने जारी किया लुकआउट नोटिस, ममता ने दिया था सेवा विस्तार
कोलकाता के पुलिस उपायुक्त (DCP) शांतनु सिन्हा के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया गया है। शांतनु सिन्हा के देश छोड़कर भागने की आशंका के चलते है ईडी ने यह लुकआउट नोटिस जारी करवाया है। जानकारी के मुताबिक, ईडी ने यह लुकआउट नोटिस सोना पप्पू केस से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जारी किया गया है। पढ़ें पूरी खबर।
