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लोस चुनाव में अधिकतम 77 लाख रुपए खर्च कर सकेंगे उम्मीदवार, केंद्र सरकार ने तय की लोकसभा और विधानसभा चुनाव में खर्च की सीमा; अधिसूचना जारी

कानून मंत्रालय द्वारा जारी की गई एक अधिसूचना के अनुसार लोकसभा चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार अब अधिकतम 77 लाख रुपए खर्च कर सकता है।

Author नई दिल्ली | October 20, 2020 7:44 PM
Bihar electons bihar election 2020तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (पीटीआई)

चुनाव आयोग के सुझाव पर सरकार ने लोकसभा और विधानसभा उम्मीदवारों की अधिकतम व्यय सीमा 10 प्रतिशत बढ़ा दी है, क्योंकि कोविड-19 के कारण जारी दिशा-निर्देशों के चलते उन्हें प्रचार करने में परेशानी का सामना कर पड़ सकता है। इससे बिहार विधानसभा चुनाव और लोकसभा की एक तथा विधानसभा की 59 सीटों पर होने वाले उप चुनाव में उम्मीदवारों को मदद मिलेगी। चुनाव आयोग ने एक महीने पहले कोविड-19 के मद्देनजर उम्मीदवारों के धन व्यय की सीमा 10 प्रतिशत बढ़ाने का सुझाव दिया था।

कानून मंत्रालय द्वारा जारी की गई एक अधिसूचना के अनुसार लोकसभा चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार अब अधिकतम 77 लाख रुपए खर्च कर सकता है। पहले यह सीमा 70 लाख रुपए थी। वहीं विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार अब 28 लाख रुपए की जगह 30.8 लाख रुपए खर्च कर सकता है। उम्मीदवारों की प्रचार के लिए खर्च करने की अधिकतम सीमा हर राज्य में अलग है।

चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘अधिकतम व्यय सीमा किसी कारण से बढ़ाई गई है। लेकिन अधिसूचना में कारण का उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है।’ लोकसभा चुनाव से पहले 2014 में आखिरी बार अधिकतम व्यय सीमा बढ़ाई गई थी। बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान 28 अक्टूबर, तीन नवम्बर और सात नवम्बर को होना है। अधिकतर उपचुनाव तीन नवम्बर को होंगे। बिहार में वाल्मीकि नगर लोकसभा सीट और मणिपुर की कुछ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव सात नवम्बर को है।

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इधर चुनाव आयोग ने बिहार में तीन चरणों में होने वाले चुनाव में मतदान वाले दिन और उससे एक दिन पहले राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों एवं अन्य द्वारा अप्रमाणित विज्ञापन प्रकाशित किए जाने पर रोक लगाई है। आयोग ने कहा है कि जब तक विज्ञापन की सामग्री को स्क्रीनिंग समिति प्रमाणित नहीं करती तब तक उन्हें प्रकाशित नहीं किया जा सकता। यही पाबंदी सात नवंबर को बिहार के वाल्मीकि नगर लोकसभा उपचुनाव के लिए भी लागू होगी।

आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला किया है। चुनाव आयोग ने पहली बार 2015 के बिहार चुनाव में इस तरह का फैसला किया था। मतदान वाले दिन और उससे एक दिन पहले राजनीतिक विज्ञापनों पर रोक लगाने का प्रस्ताव कुछ साल से विधि मंत्रालय के पास लंबित है।

आयोग ने बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को लिखे पत्र में कहा कि प्रिंट मीडिया में भ्रामक प्रकृति के विज्ञापन प्रकाशित किए जाने के मामले पहले भी उसके संज्ञान में आए हैं। उसने कहा, ‘मतदान के अंतिम चरण में इस तरह के इश्तहार पूरी चुनाव प्रक्रिया को खराब कर देते हैं। इस तरह के परिदृश्य में प्रभावित उम्मीदवारों और पार्टियों को स्पष्टीकरण देने का कोई अवसर ही नहीं मिलेगा।’

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