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विशेष: भारतीय नदियों के जीवाणुओं को बचाने की मुहिम

भारतीय नदियों में जीवाणुओं की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के तरीकों की खोज का अभियान शुरू किया गया है। नदियों के पानी में मौजूद जीवाणुओं को बचाकर यह प्रयास किया जा रहा है कि उनका पानी अब जहरीला नहीं हो सके। इंग्लैंड की बर्मिंघम विश्वविद्यालय ने इस विषय पर शोध शुरू किया है। इस शोध में वहां के विशेषज्ञों के अलावा आइआइटी हैदराबाद के विशेषज्ञ भी हिस्सा लेने वाले हैं।

नदियों में जीवाणुओं की जांच कर रही विशेषज्ञों की कमेटी।

भारत और ब्रिटेन के विशेषज्ञ मिलकर भारतीय नदियों और नहरों में पड़ रहे कीटनाशकों के असर का अध्ययन कर रहे हैं। इस तरह के कीटनाशक कारखानों से बहाए जाने वाले अपशिष्ट में होते हैं। ये पदार्थ नदी और नहरों में आक्सीजन की मात्रा कम कर देते हैं, जिस कारण उनका परिस्थितिकी तंत्र चौपट हो जाता है। इस कारण जल में रहने वाले तमाम तरह के जीव खत्म हो जाते हैं। इनमें लाभदायक जीव भी होते हैं। भारत में ज्यादातर नदियों-नहरों के साथ यह स्थिति बन गई है। उनका पानी प्रदूषित हो गया है और वह बीमारियां पैदा करने की वजह बन गया है।

इंग्लैंड की बर्मिंघम यूनिवर्सिटी ने इस तरह का शोध शुरू किया है। इस शोध में इस ब्रिटिश विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के अलावा आइआइटी हैदराबाद के विशेषज्ञ भी हिस्सा लेंगे। विशेषज्ञों का यह दल 12 लाख पाउंड (1.15 करोड़ रुपए) के खर्च से नदियों में मौजूद जीवाणुओं में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के तरीकों की खोज करेगा। इससे नदियों का पारिस्थितिकी तंत्र बरकरार रह सकेगा।

शोध टीम का नेतृत्व कर रहे बर्मिंघम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन केफ्ट ने कहा कि हम नहीं जानते कि कितनी मात्रा में वातावरण में कीटाणुनाशक आ रहे हैं और वर्षा या किसी अन्य स्रोत से पानी आने पर वह उसमें किस तरह से घुल जाते हैं। हम अपने शोध में नदियों के इन जीवाणुओं को बचाए रखने का तरीका तलाशेंगे, जिससे वे नदियों के पानी को जहरीला बनने से रोकने में सहायक साबित हों।

दरअसल, नदियों और नहरों का यह प्रदूषित पानी ही सिंचाई के लिए खेतों में प्रयुक्त हो रहा है। इसका नतीजा यह होता है कि भारत में हर साल 58 हजार बच्चे सुपर बग के संक्रमण से जान गंवा देते हैं। जबकि यूरोप में इस कारण 28 हजार से 38 हजार लोग समय पूर्व मृत्यु के शिकार हो जाते हैं।

भारत में गंगा नदी को अब सुपरबग का बड़ा स्रोत माना जा रहा है। सुपरबग उस प्रकार के जीवाणु को कहते हैं जिस पर एंटीबायोटिक्स का कोई असर नहीं होता। बीमारी फैलाने वाले ऐसे जीवाणु ऋषिकेश और हरिद्वार की गंगा में पाए गए हैं। हाल ही लखनऊ के भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान यानी आइआइटीआर ने भी अपने शोध में कुछ ऐसा ही पाया। वहां के वैज्ञानिकों ने कानपुर के बिठूर से शुक्लागंज के बीच गंगाजल पर किए अपने प्रयोगों में पाया कि गंगा में डायरिया, खूनी पेचिश और टायफायड पैदा करने वाले जीवाणु तेजी से पैदा हो रहे हैं। इन सभी बीमारियों पर अब वो एंटीबायोटिक्स काम नहीं करते जो दस साल पहले आसानी से मरीज को ठीक कर देते थे। यह समस्या पूरे गंगापथ को अपने में समेटते हुए बांग्लादेश तक जा रही है।

कुछ समय पूर्व लखनऊ के नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनबीआरआइ) के निदेशक डॉक्टर चंद्रशेखर नौटियाल ने एक अनुसंधान में प्रमाणित किया कि गंगा के पानी में बीमारी पैदा करने वाले ई-कोलाई बैक्टीरिया को मारने की क्षमता बरकरार है। डॉक्टर नौटियाल ने यह परीक्षण ऋषिकेश और गंगोत्री के गंगा जल में किया था, जहां प्रदूषण ना के बराबर है।

उन्होंने परीक्षण के लिए तीन तरह का गंगा जल लिया था। एक ताजा, दूसरा आठ साल पुराना और तीसरा सोलह साल पुराना। उन्होंने तीनों तरह के गंगा जल में ई-कोलाई बैक्टीरिया डाला। डॉ. नौटियाल ने पाया कि ताजे गंगा पानी में बैक्टीरिया तीन दिन जीवित रहा, आठ दिन पुराने पानी में एक एक हफ्ते और सोलह साल पुराने पानी में 15 दिन। यानी तीनों तरह के गंगा जल में ई कोलाई बैक्टीरिया जीवित नहीं रह पाया। लेकिन गंगा में लगातार कचरा प्रवाह होने से कानपुर और इलाहाबाद के संगम तक गंगा में खतरनाक बैक्टीरिया पाए जाने की बात कई अध्ययन में सामने आई है।

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