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मोदी सरकार में अच्छे दिन नहीं, बुरी रातें आ गई हैं

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार नरेंद्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्व में अपने एक साल के कार्यकाल की उपलब्धियों को देश के समक्ष रखने में व्यस्त है। जश्न शुरू हो चुका है। ‘वर्ष एक, काम अनेक’ के विलक्षण नारे...

Author Published on: May 25, 2015 8:45 AM

देवी प्रसाद त्रिपाठी

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार नरेंद्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्व में अपने एक साल के कार्यकाल की उपलब्धियों को देश के समक्ष रखने में व्यस्त है। जश्न शुरू हो चुका है। ‘वर्ष एक, काम अनेक’ के विलक्षण नारे से वातावरण गुंजायमान है। योजना है कि 26 से 31 मई तक गठबंधन के दल इसे ‘जन कल्याण पर्व’ के रूप में मनाएंगे। सरकार अच्छी हो या बुरी, वह एक साल में कई काम करती है। इस लिहाज से ‘वर्ष एक काम अनेक’ नारा तो आकर्षक है। लेकिन गौर करने पर कुछ अर्थ हाथ नहीं आता। वैसे इसमें कोई शक नहीं कि इस एक साल के कार्यकाल में ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिससे सरकार की छवि धूमिल हो। विश्व समुदाय के बीच मोदी ऊर्जावान नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए। बारह महीनों में 18 देशों की उनकी यात्रा किसी रिकॉर्ड से कम नहीं है।

किसी भी देश की विश्व में प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर करती है कि उस देश की आतंरिक राज्य शासन विधि कितनी सुव्यवस्थित, सहिष्णु और उदार है। उसकी अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत है। यहां यह बात गौर करने लायक है कि जब भी कोई विदेशी राजनेता हमारे देश आता है तो अपनी सब बातों में यह बात अनिवार्य रूप से कहता है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और पूरा विश्व चाहता है कि भारत की अर्थव्यवस्था सामर्थ्यवान और उदार हो। यह महज औपचारिक खुशबयानी नहीं है।

इसके पीछे का रहस्य यह है कि विशाल भूखंड पर फैले 125 करोड़ की आबादी वाला बहुभाषी बहुधर्मी हिंदुस्तान व्यवसाय और व्यापार के लिए अद्भुत स्थान है। यहां खरीदारों की भारी तादाद है। सस्ते श्रमिकों की भरमार है और तरह-तरह के कच्चे माल उपलब्ध हैं। इस अर्थव्यवस्था की नीतियां अगर विश्व बाजार सम्मत हों और इसकी राजनीति भारत के बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु और उदार चरित्र को अक्षुण्ण रखे तो विदेशी यहां निवेश करने अपने आप आएंगे।

चीन का उदाहरण हमारे सामने है। आप ‘मेक इन इंडिया’ का नारा बुलंद करें। विश्व के सभी देशों की यात्रा करें। वहां के लोगों को भारत में निवेश का निमंत्रण दें। सौ तरह के छूटों की घोषणा करें और यहां देश में आपकी और आपके मित्र संगठनों के प्रतिक्रियावादी अल्पसंखयकों के धर्मस्थलों पर आक्रमण करें। मदर टेरेसा के सेवा भाव पर सवाल उठाएं, घर वापसी और लव जेहाद जैसी बातों का गर्व से एलान करें। ऐसे में क्या माहौल उत्पन्न होता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए, आपने उनके और उन्होंने आपकी शान में सौ कसीदे कहे। कई द्विपक्षीय समझौते हुए। लेकिन घर पहुंचते ही उन्होंने कहा कि भारत में धार्मिक झगड़ों से उत्पन्न असहिष्णुता के ऐसे कुकृत्य सामने आए हैं जिससे शांतिदूत मोहनदास महात्मा गांधी भी सदमे में आ जाते। इस टिप्पणी का विदेशों में भारत की छवि पर क्या असर होगा इस पर कुछ कहने की जरूरत नहीं है। भारत अनेकता में एकता का जीवंत प्रतीक है। इस पर एकरूपता थोपने की कोशिश करना भारत के मौलिक चरित्र के साथ अन्याय है। अगर इसे दृढ़ता के साथ न रोका गया तो इसके बड़े दूरगामी दुष्परिणाम होंगे।

दूसरे जिस महत्वपूर्ण मुद्दे का मैं जिक्र करना चाहता हूं वह है भारतीय संस्कृति में कृषि का स्थान। हमारी संस्कृति में कृषि को आजीविका का सर्वोत्तम साधन माना गया है। मुझे इस बात पर घोर आश्चर्य होता है कि अपने को संस्कृति का प्रबल प्रहरी मानने वाली यह सरकार कृषि की इतनी उपेक्षा क्यों कर रही है। देश के किसान विपरीत मौसम की मार से बदहाल हैं। आए दिन किसानों के आत्महत्या की खबरें आ रही हैं और इधर सरकार नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाने में व्यस्त है। पिछली सरकार ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम 2013 लागू किया था, जिसका समर्थन संसद में भारतीय जनता पार्टी ने भी किया था।

देश के विभिन्न हिस्सों में सरकार की अधिकृत 35 लाख एकड़ जमीन खाली पड़ी है। लेकिन यह सरकार उन पर विकास परियोजनाओं को बनाने के बदले भूमि अधिग्रहण कानून लागू करने पर आमादा है। हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों तक तो यह चुप रहे। चुनावों में आसमानी वादे किए। जीत हासिल की और अब प्रगति और राष्ट्रहित के नाम पर लोगों से जबरन जमीन लेने की साजिश कर रहे हैं। देश भर के किसान इस अध्यादेश के खिलाफ हैं। इसलिए इस विरोध को राजनीती से प्रेरित कह कर खारिज करना दुर्भाग्यपूर्ण और खतरनाक है।

पूरा देश उम्मीद कर रहा था कि बेमौसम की बरसात से हुए फसलों की बर्बादी और संभावित सूखे के मद्देनजर सरकार कुछ ठोस योजनाएं लेकर आएगी। लेकिन उलटे कृषि के क्षेत्र में सरकारी खर्चे में कटौती कर कुल खर्चे को पिछले साल के आबंटित 19852 करोड़ रुपए से घटा कर 17000 करोड़ रुपए कर दिया गया। राष्ट्रीय किसान विकास परियोजना पर सरकारी खर्चे को जो पिछले साल 8444 करोड़ रुपए थी, घटा कर 4500 करोड़ रुपए कर दिया गया।

इसी तरह पशुपालन पर भी कुल खर्च में 400 करोड़ रुपए की कटौती की गई है। अब अगर सरकार यहां यह दावा करती है कि खर्चों में इस कटौती से उत्पादन और किसानों के कल्याण पर कोई असर नहीं पड़ेगा तो यह बात गले नहीं उतरती। सच्चाई यह है कि खर्चे में कटौती के इस उपक्रम का मकसद राजकोषीय घाटे को कम करना है जिससे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के तय लक्ष्य हासिल किए जा सकें और अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजंसियां प्रभावित होकर भारत को बेहतर रेटिंग दें जिससे देश में विदेशी निवेश की वृद्धि हो सके। अब बताइए कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देने वाली यह सरकार किसकी हितैषी है, आम की या खास की?

‘जन कल्याण पर्व’ कितना सत्य और कितना असत्य है? ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पिछले वित्त वर्ष में उपभोक्ता सामान की खरीद में भारी कमी आई है जो पिछले दस सालों की तुलना में सबसे ज्यादा है। उपभोक्ता सामान की खरीद में यह गिरावट शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में दर्ज हुई है। लोग खाने-पीने और रोजमर्रा की दूसरी चीजों को खरीदे बिना नहीं रह सकते। लेकिन टीवी, फ्रिज, वाहन आदि टिकाऊ उपभोक्ता सामान तभी खरीदते हैं जब बचत की गुंजाइश हो।

उद्योग जगत को उम्मीद है कि उपभोक्ता सामान की खरीद में आई सुस्ती टूटेगी। लेकिन मानसून अगर सामान्य से कमजोर रहा, जिसकी भविष्यवाणी मौसम विभाग ने कर रखी है तो स्थिति और खराब हो सकती है। कॉरपोरेट जगत का एक बड़ा तबका अब कहने लगा है कि सरकार की दिशाहीन आर्थिक नीतियां अतिशयोक्तियों में गिरफ्तार हैं।

यहां यह कहा जा सकता है कि एक साल किसी सरकार के कार्यों के मूल्यांकन के लिए पर्याप्त नहीं है। इस बात से मैं भी सहमत हूं। लेकिन दिशा तो दिखनी चाहिए। अच्छे दिन के उदय का कुछ तो आभास होना चाहिए। वह कहां है? उलटे बुरी रातें आ गई हैं। महंगाई, आर्थिक तंगी और बेरोजगारी के कारण जनसाधारण की नींद हराम हो गई है। मोदी सरकार के एक साल का मूल्यांकन अगर राष्ट्री स्वयंसेवक संघ की शब्दावली में किया जाए तो इस सरकार ने ‘दक्ष’ में नहीं ‘आरम’ में काम किया है

लेकिन चार वर्षों का समय अब भी बाकी है। मेरा सुझाव है कि जुमले, नारों पर और समय न बर्बाद किया जाए। अब समय है कि संपूर्ण ऊर्जा और पूरी कल्पना समाज में सद्भाव बहाल करने, सभी तबकों के समेकित विकास में लगाई जाए।
(लेखक राजसभा के सदस्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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