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कलकत्ता हाईकोर्ट ने गलत फैसले के लिए खुद को दी सजा, अपने ऊपर लगाया एक लाख का हर्जाना

मामले में जज मलिक के स्वत: संज्ञान लेने और रेलवे कर्मचारियों की कोर्ट में पेशी से मामला बिगड़ गया। कई ट्रेन ड्राइवर इकट्ठे हुए और उन्होंने कोर्ट के बाहर प्रदर्शन किया था।

Calcutta High Courtजज मिंटू मलिक ने कोर्ट के आदेश के बाद फिर से अपने पद पर लौट आए हैं।

हाल ही में कलकत्ता हाई कोर्ट ने खुद पर ही 1 लाख रुपये का हर्जाना लगाया। कोर्ट ने पाया कि उससे एक रेलवे कम जुडिशल मजिस्ट्रेट को अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा देने में गलती हुई है। मजिस्ट्रेट को 2007 में सस्पेंड कर दिया गया था।

आरोप था कि उन्होंने अपने न्यायिक क्षेत्र का दायरा पार किया। हाई कोर्ट के जस्टिस संजीब बी बनर्जी और सूर्य घोष ने माना कि मजिस्ट्रेट से जुड़े मामले को हैंडल करने में हाई कोर्ट के तरीके से अपीलकर्ता को धोखा महसूस हुआ होगा।

बार ऐंड बेंच डॉट कॉम की खबर के मुताबिक, सस्पेंशन के वक्त जज मिंटू मलिक पर जुडिशल मजिस्ट्रेट और सियालदह रेलवे मजिस्ट्रेट की दोहरी जिम्मेदारी थी। मई 2007 में जज ने कुछ ट्रेनों के लेट चलने के मामले में स्वत: संज्ञान लिया था। इस बात का शक था कि ऐसी ट्रेनें प्रतिबंधित सामग्रियों को गिराने के लिए कई जगहों पर रुकती हैं।

इस मामले में जज ने पहली उस ट्रेन के ड्राइवर की जांच की, जो 15 मिनट लेट पहुंची थी। जज ड्राइवर के केबिन में घुसे और उन्होंने देरी की वजह जाननी चाही। जज को जब कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो उन्होंने ड्राइवर और ट्रेन के गार्ड को उसी दिन रेलवे कोर्ट में पेश होने के लिए कहा।

हालांकि, इस मामले में जज मलिक के स्वत: संज्ञान लेने और रेलवे कर्मचारियों की कोर्ट में पेशी से मामला बिगड़ गया। कई ट्रेन ड्राइवर इकट्ठे हुए और उन्होंने कोर्ट के बाहर प्रदर्शन किया। इसकी वजह से उस दिन कोर्ट का कामकाज बाधित हुआ। जज ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अवमानना की प्रक्रिया शुरू कर दी। जब कलकत्ता हाई कोर्ट को इस मामले के बारे में पता चला तो एक जांच की गई। शुरुआती रिपोर्ट के आधार पर दिसंबर 2007 में मलिक को सस्पेंड कर दिया गया।

मलिक पर आरोप लगा कि वह ड्राइवर के केबिन में अवैध तरीके से घुसे। यह भी आरोप लगा कि वह अपने पद का फायदा उठाते हुए अमूमन बिना टिकट ही ट्रेन में सफर करते हैं। कहा गया कि उन्होंने अपने कार्य क्षेत्र का दायरा पार करते हुए ड्राइवर से पूछताछ की। और तो और, कोर्ट के बाहर हुए प्रदर्शन के लिए भी उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया। बाद में मलिक को अनिवार्य रिटायरमेंट की सजा दी गई। कलकत्ता उच्च न्यायालय के फुल कोर्ट ने इस सजा पर मुहर लगाई।

इस फैसले को 2017 में चुनौती दी गई, लेकिन इसे भी खारिज कर दिया गया। हालांकि, डिविजन बेंच ने मलिक की सजा के खिलाफ अपील पर विचार किया। बेंच ने पाया कि मलिक के मामले को जिस तरीके से हैंडल किया गया, उसमें कई तरह की खामियां थीं। प्रक्रियाओं का सही से पालन नहीं किया गया।

4 जुलाई को सुनाए अपने फैसले में कोर्ट ने कहा, ‘न्यायिक अधिकारी की यह सोच बचकानी ही थी कि उन्हें लगा कि वह अकेले ही स्मगलर माफिया से निपट सकते हैं।’ हाई कोर्ट ने उनकी पहल की तारीफ की, लेकिन यह भी माना कि जज ने अपने न्यायक्षेत्र की सीमा पार की।

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