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CAG ऑडिट पर अंकुश? 2020 में केवल 14 रिपोर्ट, 2015 में दी थीं 55- RTI के हवाले से दावा

कैग ने नोटबंदी जैसे अहम इश्यू का आडिट करने की भी जहमत नहीं उठाई। उसको देखना था कि 1000 को नोट को बैन करने से क्या असर पड़ा।

pm indiaपीएम नरेंद्र मोदी (फोटोः ट्विटर@bjp4india)

यूपीए के शासन काल में सुप्रीम कोर्ट ने CBI को पिंजरे में बंद तोता करार दिया था। मोदी सरकार में देखें तो ऐसा ही कुछ हाल कैग Comptroller and Auditor General का लगता है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट कहती है कि पिछले पांच सालों के दौरान कैग की आडिट रिपोर्ट की संख्या 55 से 14 तक गिर गई है। डिफेंस आडिट से जुड़ी रिपोर्ट की स्थिति तो और ज्यादा खराब है। 2017 में इनकी तादाद 8 थी तो पिछले साल ये शून्य तक पहुंच गई।

कैग का काम यह पता लगाना है कि सरकारी पैसे का नियमों के तहत सही इस्तेमाल किया गया या नहीं। इसके लिए संस्था सरकार के खर्चों का आडिट करती है। रिपोर्ट की संख्या में कमी से ऐसा लगता है कि या तो कैग ने कम मामलों पर ही अपनी नजर जाली या फिर उसे इन खातों में कोई गड़बड़ी नहीं मिली। इस संस्था की वजह से ही 2G, कोल ब्लॉक आक्शन, आदर्श हाउसिंग सोसायटी जैसे घोटाले सामने आए थे। कैग ही वह सबसे बड़ा कारक रहा जिसने मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि को तार तार किया। इसकी वजह से यूपीए को सत्ता से बाहर तक होना पड़ा।

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की RTI के जवाब में बताया गया है कि शुरुआती दिनों में मोदी सरकार कैग को लेकर संजीदा थी। यही वजह है कि उस दौरान संसद के पटल पर रखी जाने वाली रिपोर्ट की संख्या पिछले 10 सालों में सबसे ज्यादा थी। लेकिन समय के साथ इनकी तादाद घटती चली गई। डिफेंस जैसा ही कुछ हाल रेलवे का भी है। 2017 में रेलवे को लेकर कुल 5 रिपोर्ट तैयार की गईं। अलबत्ता पिछले साल इनकी तादाद सिमटकर 1 हो गई।

IAS ऑफिसर रहे जवाहर सिरकर कहते हैं कि यह चलन गलत है। कैग का काम जनता के पैसे के इस्तेमाल पर नजर रखना है। अगर संस्था काम ही नहीं करेगी तो उसे पता कैसे चलेगा कि सरकार कहां कुछ कमियां छोड़ रही है। उनका कहना है कि कैग में पैनापन भी खत्म होता दिख रहा है। जो तेवर विनोद रॉय के समय में थे, वह अब देखने को नहीं मिल रहे। संस्था ने नोटबंदी जैसे अहम इश्यू का आडिट करने की भी जहमत नहीं उठाई। कैग को देखना था कि 1000 को नोट को बैन करने से क्या असर पड़ा।

लोकसभा के सेक्रेट्री रहे पीडीटी आचार्य के मुताबिक, कैग का काम सरकार और पब्लिक सेक्टर के उपक्रमों के खर्चों की विवेचना करना होता है। अगर आडिट रिपोर्ट घट रही हैं तो जाहिर है कि कैग की विवेचना का दायरा लगातार सिमट रहा है। हालांकि, कैग की तरफ से किसी ने इस मसले पर रिएक्ट नहीं किया, लेकिन एक ऑफिसर का कहना था कि फाइनेंस अकाउंट्स की रिपोर्ट हर साल तैयार करके भेजी जाती हैं।

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