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CBI को लगा डेढ़ करोड़ का चूना, बिजली कंपनी के गड़बड़झाले में फंसी देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी

जो सीबीआई देश भर के भ्रष्टाचार की जांच करती है, उसको बिजली कंपनी ने ही चूना लगा दिया। वो भी करीब डेढ़ करोड़ रुपये का। कंपनी ने यह खेल मुख्यालय के भवन में बिजली उपभोग की गलत असेसमेंट रिपोर्ट बनाकर किया।

जो सीबीआई देश भर के भ्रष्टाचार की जांच करती है, उसको रिलायंस ग्रुप की बिजली कंपनी ने ही चूना लगा दिया। वो भी करीब डेढ़ करोड़ रुपये का। कंपनी ने यह खेल मुख्यालय के भवन में बिजली उपभोग की गलत असेसमेंट रिपोर्ट बनाकर किया। इससे पता चलता है कि बिजली कंपनियों की मनमानी और कार्यप्रणाली से आम-जन ही नहीं देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी को भी दो-चार होना पड़ गया। वर्ष 2018 की कैग की रिपोर्ट नंबर चार में सीबीआई को 1.42 करोड़ रुपये के चपत लगाने का जिक्र है।

दरअसल, दिल्ली स्थित सीबीआई मुख्यालय में बिजली व्यवस्था के लिए फरवरी 2011 में राजधानी पॉवर लिमिटेड(BSES) से एग्रीमेंट हुआ। कुल 7514 KVA बिजली सप्लाई की बात तय हुई। BSES का मालिकाना हक रिलायंस के पास है। एग्रीमेंट के मुताबिक सीबीआई से मासिक फिक्स चार्ज वसूला जाना था। 17 फरवरी 2011 से 31 अगस्त 2011 के बीच 11.27 लाख और फिर 31 अगस्त 2011 से 31 अक्टूबर 2011 के बीच 9.39 लाख रुपये प्रति महीने की दर से फिक्स चार्ज बिजली कंपनी ने वसूला भी। उस वक्त एग्रीमेंट में तय दरों के हिसाब से सीबीआई ने 150 और 125 रुपये प्रति केवीए की दर से बिजली उपभोग का शुल्क चुकाया। यह कांट्रैक्ट बिजली कंपनी की ओर से असेसमेंट के आधार पर तय हुआ था। बिजली कंपनी ने एक अनुमानित बिजली खर्च का आंकड़ा लगाया और उसी आधार पर फिक्स चार्ज तय कर दिया। मगर, हकीकत यह थी कि सीबीआई मुख्यालय में लोड के हिसाब से बिजली का उपभोग नहीं हो रहा था।

बाद में नेशनल कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन लिमिटेड(NBCC) ने नवंबर 2011 में दोबारा सीबीआई मुख्यालय में बिजली जरूरतों का आंकलन किया। एनबीसीसी ने बिजला का लोड कम कर 4294 केवीए करने का सुझाव दिया। जिस पर सीबीआई ने दिसंबर 2011 में बिजली कंपनी से कांट्रैक्ट डिमांड को घटाने को कहा। हालांकि बीएसईएस ने सीबीआई के इस अनुरोध को स्वीकार नहीं करते हुए यह तर्क दिया कि उनके बीच कांट्रैक्ट दो वर्षों के लिए हुआ है। इस नाते बीच में बिजली लोड घटाया नहीं जा सकता।

सीबीआई मुख्यालय पर बिजली सप्लाई का BSES ने अधिक वसूला बिल। कैग ने खोली पोल।

बहरहाल, बिजली कंपनी ने सीबीआई के साथ अक्टूबर 2013 में मीटिंग करने पर सहमति जताई। ताकि सीबीआई के अनुरोध के अनुसार कांट्रैक्ट डिमांड को 7514 से 4121 तक कर दिया जाए। इस मीटिंग के बाद फरवरी 2014 में सीबीआई और बीएसईएस के बीच 4121 केवीए लोड का फार्मल एग्रीमेंट हुआ। नतीजा यह रहा कि सीबीआई मुख्यालय का बिजली खर्च 9.39 लाख रुपये से घटकर 5.15 लाख रुपये महीना हो गया।

जब कैग ने सीबीआई के बिजली बिलों की जांच की तो पता चला कि रि असेसमेंट के बाद 4121 केवीए के कांट्रैक्ट भी काफी ज्यादा है। पता चला कि सीबीआई मुख्यालय में सिर्फ 936 से 2338 केवीए बिजली ही मार्च 2013 से 2016 तक खर्च हो रही है। इस प्रकार कैग को पता चला कि 125 रुपये प्रति केवीए की दर से सीबीआई ने 1.42 करोड़ रुपये का बिजली कंपनी को ज्यादा भुगतान किया। सजगता बरतकर यह धनराशि सीबीआई बचा सकती थी। मिनिस्ट्री ऑफ पर्सनल, पब्लिक, ग्रीवांस ने जून 2017 में जवाब दिया कि 20 अप्रैल 2017 को सीबीआई की फिर से बीएसईएस के साथ मीटिंग हुई। जिसमें एक बार फिर लोड घटाकर 4121 केवीए से 2473 केवीए किया गया। अब इस कांट्रैक्ट के आधार पर सीबीआई बिजली बिल का भुगतान कर रही है। कैग ने निष्कर्ष निकाला कि बिजली उपभोग के अनुचित आकलन के कारण सीबीआई को 1.42 करोड़ रुपये का अनावश्यक खर्च झेलना पड़ा।

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