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अपनी तीन खान होने के बावजूद कोयला आयात कर रहा SAIL, सीएजी ने खूब फटकारा

सेल को हर साल लगभग 15 मिलियन टन कोकिंग कोयले की जरूरत होती है। इसमें से सेल 12 से 13 मिलियन टन कोयला आयात करता है। इसके लिए वैश्विक टेंडर आमंत्रित किये जाते हैं या फिर लंबी अवधि के समझौते होते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

सरकारी ऑडिट एजेंसी कैग ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी सेल को कड़ी फटकार लगाई है। कैग ने सेल के पास तीन कैप्टिव कोयला खान होने के बावजूद आयातित कोयले पर निर्भर रहने के लिए आलोचना की है। सेल को हर साल लगभग 15 मिलियन टन कोकिंग कोयले की जरूरत होती है। इसमें से सेल 12 से 13 मिलियन टन कोयला आयात करता है। इसके लिए वैश्विक टेंडर आमंत्रित किये जाते हैं या फिर लंबी अवधि के समझौते होते हैं। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, “कंपनी आयातित कोयले पर निर्भर है, जबकि इसके पास तीन कैप्टिव कोयला खाने हैं, कैप्टिव माइंस का विकास देशी कोयले की उपलब्धता को मजबूत करता है और आयात की कीमतों में होने वाली उतार-चढ़ाव से रक्षा करता है।”

बता दें कि सेल के पास दो पूर्णरुप से चालू कैप्टिव कोल ब्लॉक जीतपुर और चासनाला में हैं। जबकि तसरा कोलियरी से भी छोटे पैमाने पर कोयले की निकासी की जाती है। ऑडिट में कहा गया है कि कोयले की उत्पादन में कमी की वजह बताते हुए सेल ने कहा है कि यह बाहरी एजेंसियों की मदद नहीं लता है, इसके पास उपकरणों और मैटेरियल की कमी है। इसके अलावा बालू की कमी, मशीनों की खराबी भी कम उत्पादन की वजह हैं। सेल ने कहा है कि जीतपुर और चासनाला कोलियरी से उत्पादन में कमी, और तसरा माइंस को विकसित करने में हो रही देरी भी कोयले में उत्पादन की कमी का मुख्य कारण है।

हालांकि कंपनी ने तसरा माइंस से माइनिंग प्लान की योजना बनाने में काफी देर की। इस रिपोर्ट को कोयला मंत्रालय को सौंपने में कंपनी को पांच साल (2002-2007) लगे, इस मामले में मंत्रालय से आखिरी अनुमति जून 2009 में ही मिल सकी। तसरा में छोटे स्तर पर कोयला निकालने का काम 2009 में शुरू हो सका। लेकिन कंपनी ने चार साल और लिये इसके बाद कंपनी ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया। आखिरकार 2013 में इस माइंस से कोयला पूर्णरुप से खनन शुरू हो सका। रिपोर्ट के मुताबिक सेल ने ऑडिट के दौरान की गई सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है और घाटे को कम करने की कोशिश कर रहा है।

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