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केंद्र सरकार का न्यायालय में दावा- CAA नहीं करता है मूल अधिकार का हनन

संशोधित नागरिकता कानून में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में कथित रूप से उत्पीड़न का शिकार हुये हिन्दू, सिख, बौद्ध, ईसाई, जैन और पारसी अल्पसंख्यक समुदाय के उन सदस्यों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है, जो 31 दिसंबर, 2014 तक यहां आ गये थे।

Author नई दिल्ली | March 17, 2020 9:44 PM
CAA, BJP, NDA, Narendra Modi, Amit Shah, Central Government, SC, National News, India News, Hindi News, Jansatta Newsदिल्ली के शाहीन बाग में CAA, NRC और NPR विरोधी प्रदर्शन से प्रेरित होने के बाद मदनपुरा में प्रदर्शन करती औरतें व बच्चे। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः प्रशांत नादकर)

केंद्र सरकार ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में दावा किया कि संशोधित नागरिकता कानून (CAA), 2019 संविधान में प्रदत्त किसी मूल अधिकार का हनन नहीं करता है। न ही यह किसी भारतीय नागरिक के कानूनी, लोकतांत्रिक या धर्मनिरपेक्ष अधिकारों को प्रभावित करता है। केंद्र ने सीएए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपने 129 पन्नों के हलफनामे में इस कानून को वैध बताया और कहा कि उसके द्वारा किसी भी तरह की संवैधानिक नैतिकता की सीमा लांघने का सवाल ही नहीं है।

याचिकाओं को खारिज करने की मांग करते हुए केंद्र ने कहा कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता ‘गैर धार्मिक’ नहीं है, इसके बजाय यह सभी धर्मों का संज्ञान लेता है और सौहार्द एवं भाईचारे को बढ़ावा देता है। गृह मंत्रालय के निदेशक बी सी जोशी द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया है कि यह कानून कार्यपालिका को किसी भी तरह की मनमानी करने और अनियंत्रित अधिकार प्रदान नहीं करता है क्योंकि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न का शिकार हुये अल्पसंख्यकों को इस कानून के अंतर्गत र्निदिष्ट तरीके से ही नागरिकता प्रदान की जाएगी।

इसमें कहा गया है, ‘‘संशोधन के लागू होने से पहले मौजूद रहे किसी मौजूदा अधिकार का सीएए अतिक्रमण नहीं करता है और यह कहीं से भी किसी भारतीय नागरिक के कानूनी, लोकतांत्रिक या धर्मनिरपेक्ष अधिकारों को प्रभावित नहीं करता है। किसी विदेशी द्वारा भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए मौजूदा व्यवस्था को सीएए द्वारा नहीं छुआ गया है और वह पहले की तरह ही है।’’

संशोधित नागरिकता कानून में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में कथित रूप से उत्पीड़न का शिकार हुये हिन्दू, सिख, बौद्ध, ईसाई, जैन और पारसी अल्पसंख्यक समुदाय के उन सदस्यों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है, जो 31 दिसंबर, 2014 तक यहां आ गये थे।

शीर्ष न्यायालय ने पिछले साल 18 दिसंबर को सीएए की संवैधानिक वैधता की पड़ताल करने का निश्चय किया था, लेकिन इसके क्रियान्वयन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ केरल और राजस्थान सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 का सहारा लेते हुये वाद दायर किया है, जबकि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, माकपा, तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस के जयराम रमेश, द्रमुक मुन्नेत्र कषगम, एआईएमआईएम, भाकपा और कई अन्य संगठनों ने 160 से अधिक याचिकायें शीर्ष अदालत में दायर की गई हैं।

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