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पीएम नरेंद्र मोदी के सुधारों पर ब्यूरोक्रेसी ने लगाया ब्रेक, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने अपनी किताब में बताया पूरा विवरण

उन्होंने कहा कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की बड़ी संख्या के निजीकरण लिए प्रयासरत है। उन्होंने आगे कहा कि NITI Aayog द्वारा तैयार की गई कंपनियों की सूची के लिए कैबिनेट की मंजूरी पाने के बावजूद रुके हुए हैं।

Arvind Pangadhiya, BJP, NITI Ayogनीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया का कहना है कि मोदी सरकार के सुधारों पर ब्यूरोक्रेसी के चलते ब्रेक लगा। (फाइल फोटो)

नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया का कहना है कि मोदी सरकार के सुधारों पर ब्यूरोक्रेसी के चलते ब्रेक लगा गया  है। उन्होंने कहा कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की बड़ी संख्या के निजीकरण लिए प्रयासरत है। उन्होंने आगे कहा कि NITI Aayog द्वारा तैयार की गई कंपनियों की सूची के लिए कैबिनेट की मंजूरी पाने के बावजूद रुके हुए हैं। इसके अलावा उन्होंने कहा कि लेबर लॉ रिफार्म इस बात का उदाहरण है कि कैसे राजनीतिक कार्यकारिणी के प्रयासों को ब्यूरोक्रेसी ठप कर देती है।

उन्होंने अपनी किताब ‘India Unlimited, Reclaiming the Lost Glory’में इस पर विस्तार से लिखा है। नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष पनगढ़िया ने कहा कि, समाजवादी विचारधारा एक आदर्श दुनिया का विचार देती है और युवा इसकी तरफ आकर्षित होने लगते हैं। लेकिन यह आकर्षण बाजार विरोधी विचारों को थोपता है। युवाओं को यह विचार उनके कॉलेजों में उनके शिक्षकों द्वारा मिलते हैं।

उन्होंने भारतीय कंपनियों को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि भारत में भी बिजनेस हस्तियों ने बाजार के अनुकूल सुधारों को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अधिकांश देशों में आर्थिक संकट के दौर में कंपनियां इसे अवसर के तौर पर देखती हैं और  उन नियमों को हटाने की वकालत करती हैं जो उनकी प्रगति में बाधक होती हैं लेकिन, भारत में कंपनियां आर्थिक संकट को सब्सिडी और आयात से बचने के मौके के तौर पर देखती हैं।

आपको बता दें कि अरविंद पनगढ़िया दुनिया के सबसे अनुभवी अर्थशास्त्रियों में से एक हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अरविंद पहले भी कोलम्बिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थे, चूंकि इस विश्वविद्यालय से किसी भी शिक्षक को रिटायर नहीं किया जाता है, इसलिए उन्हें विश्वविद्यालय द्वारा दो बार वापस अपना पद सम्भालने के लिए नोटिस भेजा गया था। नीति आयोग से इस्तीफा देने के बाद वह कोलम्बिया विश्वविद्यालय में छात्रों को इकॉनोमिक्स पढ़ाते हैं।

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