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कछुआ रफ्तार से चल रहा मोदी का ड्रीम प्रोजेक्‍ट, साल भर में सिर्फ 0.9 हेक्‍टेयर भूमि का अधिग्रहण

बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की वजह से प्रभावित हो रहे किसानों के एक समूह ने गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। कोर्ट ने इस मामले में 22 नवंबर को सरकार से पक्ष रखने को कहा है।

कछुआ रफ्तार से चल रहा मोदी का ड्रीम प्रोजेक्‍ट, साल भर में सिर्फ 0.9 हेक्‍टेयर भूमि का अधिग्रहण
धीमी गति से चल रहा बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट का काम। (प्रतीकात्मक तस्वीर- एक्सप्रेस फाइल फोटो)

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट कछुए की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। किसान भी इस प्रोजेक्ट के लिए अपनी जमीन देने में विरोध जता रहे हैं। अहमदाबाद से मुंबई के बीच शुरू होने वाली बुलेट ट्रेन परियोजना जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है और जिस रफ्तार से जमीन का अधिग्रहण हो रहा है, उससे ऐसा लग रहा है कि समय पर इसे पूरा करने का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, एक साल बाद सिर्फ 0.9 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हुआ है। जबकि, इस प्रोजेक्ट पर काम कर रही कंपनी के अनुसार 1400 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है। वर्ष 2023  तक 316 मील की इस परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर राघबेंद्र झा कहते हैं, “भारत में जमीन अधिग्रहण एक आम समस्या है। इस वजह से कई प्रोजेक्ट में देरी हुई है। यहां इस पर किसी तरह का सवाल नहीं उठता है। मैंने इस तरह के कई उदाहरण देखें हैं।”

यह प्रोजेक्ट यह दर्शा रहा है कि पीएम मोदी को रेलवे, बंदरगाहों और हवाई अड्डों को लेकर अपनी प्रमुख परियोनाओं को लागू करने में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मुताबिक, करीब 754 अरब रुपये की परियोजनाएं ही सितंबर 2018 में समाप्त तिमाही तक पूरी की जा सकी है, जो कि लक्ष्य से अाधे से भी ज्यादा कम है। राजनीतिक विश्लेषक और पीएम मोदी की जीवनी पर लिखने वाले निलंजन मुखोपध्याय कहते हैं, “यह प्रोजेक्ट काफी उच्च स्तर का है। इसका काफी प्रचार प्रसार किया गया। यह पीएम मोदी की छवी से भी जुड़ा हुआ है। यदि लोग प्रदर्शन कर रहे हैं तो कहीं न कहीं इससे पीएम मोदी की छवी को नुकसान पहुंचा रहा है।”

नेशनल हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन इस प्रोजेक्ट का निर्माण कर रही है। कंपनी के प्रवक्ता धनंजय कुमार का कहना है, “परियोजना के लिए पैसों की कमी नहीं है, लेकिन जमीन अधिग्रहण की वजह से देरी हो रही है। इस प्रोजेक्ट को अगस्त 2022 तक ऑपरेशनल किया जाना है। यह आधिकारिक रूप से लक्ष्य प्राप्त करने से एक साल पहले का समय है। कंपनी प्रभावित किसानों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।” इस प्रोजेक्ट की वजह से प्रभावित हो रहे किसानों के एक समूह ने गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। कोर्ट ने इस मामले में 22 नवंबर को सरकार से पक्ष रखने को कहा है। साथ ही किसानों ने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप प्रोजेक्ट के लिए सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण के अधिकार पर भी सवाल उठाया है। हालांकि, कोर्ट ने पहले जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था।

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