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शाही इमाम के बेटे की नियुक्ति को कानूनी मान्यता नहीं

केंद्र सरकार और वक्फ बोर्ड ने दिल्ली हाइकोर्ट में दलील दी कि जामा मस्जिद के शाही इमाम अपने बेटे को नायब इमाम और उत्तराधिकारी बनाने के लिए 22 नवंबर को जो समारोह करने जा रहे हैं उनकी कोई कानूनी मान्यता नहीं है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी रोहिणी और न्यायमूर्ति आरएस एंडला के पीठ के समक्ष […]

Author Updated: November 21, 2014 1:15 PM

केंद्र सरकार और वक्फ बोर्ड ने दिल्ली हाइकोर्ट में दलील दी कि जामा मस्जिद के शाही इमाम अपने बेटे को नायब इमाम और उत्तराधिकारी बनाने के लिए 22 नवंबर को जो समारोह करने जा रहे हैं उनकी कोई कानूनी मान्यता नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी रोहिणी और न्यायमूर्ति आरएस एंडला के पीठ के समक्ष गुरुवार को ये दलीलें दी गईं। पीठ तीन जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में 22 नवंबर के समारोह को चुनौती दी गई है जिसमें जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी की योजना अपने पुत्र को नायब इमाम नियुक्त करने की है।

वक्फ बोर्ड ने अदालत से यह भी कहा कि उसकी जल्दी ही बैठक होगी और बुखारी ने जो किया है, उसके लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। केंद्र का प्रतिनिधित्व अतिरिक्त सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किया। मेहता ने कहा कि इस समारोह का आयोजन जामा मस्जिद के अलावा किसी स्थान पर बिना किसी कानूनी मान्यता के किया जा सकता है।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं, केंद्र और बोर्ड की दलीलें सुनने के बाद कहा कि इस पर आदेश दिया जाएगा। अदालत ने सुनवाई के दौरान यह सवाल भी किया कि क्या जामा मस्जिद बोर्ड की निगरानी में है और अगर ऐसा है तो वह इस मुद्दे पर क्या कर रहा है। पीठ ने यह भी कहा कि अगर बोर्ड सक्षम प्राधिकार है तो उन्हें जांच करने दीजिए और जरूरी कदम उठाइए।

वक्फ बोर्ड ने स्वीकार किया कि जामा मस्जिद उसकी निगरानी में है और कहा कि मौजूदा इमाम खुद ही अपना उत्तराधिकारी नहीं बना सकते, क्योंकि उसकी मंजूरी के बिना नियुक्ति की कोई कानूनी वैधता नहीं होगी। बोर्ड ने यह भी कहा कि वह जामा मस्जिद के ‘मुतवल्ली’ है और इसके लिए एक प्रबंधन समिति की नियुक्ति की जाएगी। इसने यह भी कहा कि मौजूदा इमाम की नियुक्ति 2000 में की गई थी, लेकिन इमाम के रूप में उन्हें मंजूरी 2006 में मिली।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि इमाम बिना किसी कानूनी मान्यता के काम कर रहे हैं। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि जामा मस्जिद के आसपास उनकी कई दुकानें भी हैं जो हाइकोर्ट के 2005 के एक आदेश का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं ने यह आरोप भी लगाया कि केंद्र और अन्य प्राधिकार जो हो रहा है, उसके मूकदर्शक रहे हैं। उन्होंने यह दावा भी किया कि जहां तक जामा मस्जिद का सवाल है, बोर्ड ‘निरर्थक’ है।

 

 

 

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