भारत का भूगोल नहीं जानता था बंटवारे का नक्शा बनाने वाला अंग्रेज वकील, ऐसे पाक के हिस्से में चला गया था करतारपुर गुरुद्वारा

आज गुरुद्वारा है, वहीं पर 22 सितंबर 1539 को गुरुनानक देवजी ने आखिरी सांस ली। यह गुरुद्वारा रावी नदी के करीब स्थित है।

Kartarpur Corridor, Sikh Community, Pakistan
पाकिस्तान के गुरुद्वारा करतारपुर साहिब और भारत के गुरदासपुर स्थित डेरा बाबा साहिब को जोड़ने वाला गलियारा श्रद्धालुओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। (फाइल फोटो-PTI)

वर्षों के संघर्ष के बाद जब देश को आजादी मिलने का वक्त आया तो साथ में देश काे विभाजन की त्रासदी भी झेलनी पड़ी। इसकी वजह से देश दो टुकड़ों में बंट गया। इस बंटवारे में हमारा इतिहास और ऐतिहासिक स्थल भी बंट गए। कुछ इस पार रह गए कुछ उस पार रह गए।ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जिन्हें दोनों देशों की सीमाएं बनाने और नक्शा बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी, वे खुद इससे अंजान थे। इसका बड़ा नुकसान यह हुआ कि करतारपुर गुरुद्वारा वाली जगह पाकिस्तान वाले पंजाब के हिस्से में चली गई।

पाकिस्तान स्थित सिखों के सबसे पूजनीय तीर्थस्थलों तक जाने के लिए करतारपुर साहिब गलियारे को बुधवार से दोबारा खोला जा रहा है। मंगलवार को केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने इसको खोले जाने की घोषणा की थी। कोविड-19 के प्रकोप के बाद मार्च 2020 से रुकी हुई तीर्थयात्रा को फिर से शुरू करने की घोषणा शुक्रवार को गुरु नानक देव की जयंती से तीन दिन पहले की गई।

असल में देश के बंटवारे के वक्त अंग्रेज वकील सर क्रिल रेडक्लिफ को बंटवारे का नक्शा बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। उन्हें भारत की भौगोलिक स्थिति की कोई जानकारी नहीं थी और समय भी बहुत कम सिर्फ दो महीने दिया गया था। वह यह नहीं समझ पाए कि दोनों देशों की सीमाएं कौन हैं। ऐसे में उन्होंने रावी नदी की धारा को ही बॉर्डर बना दिया। करतारपुर गुरुद्वारा रावी के दूसरी तरफ था, लिहाजा यह पाकिस्तान के हिस्से में चला गया। अंग्रेज लेखक लैरी कॉलिन्स और डॉमिनिक लैपियर की किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में इसका जिक्र किया गया है

पाकिस्तान के नारोवाल जिले में बसा करतारपुर पाकिस्तान स्थित पंजाब में आता है। यह जगह लाहौर से 120 किलोमीटर दूर है। जहां पर आज गुरुद्वारा है, वहीं पर 22 सितंबर 1539 को गुरुनानक देवजी ने आखिरी सांस ली। यह गुरुद्वारा रावी नदी के करीब स्थित है और डेरा साहिब रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी चार किमी है। यह गुरुद्वारा भारत-पाकिस्तान सीमा से सिर्फ तीन किलोमीटर दूर है। भारत की तरफ से यह साफ दिखाई देता है।

करतारपुर साहिब गुरुद्वारा जिसे मूल रूप से गुरुद्वारा दरबार साहिब के नाम से जाना जाता है, सिखों का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहां गुरु नानक देव ने अपने जीवन के अंतिम 16 वर्ष बिताए थे। 22 सितंबर 1539 को इसी गुरुद्वारे की जगह पर गुरु नानक देव जी ने अपना देह त्याग दिया था। इसके बाद गुरुद्वारा दरबार साहिब बनवाया गया।

पढें राष्ट्रीय समाचार (National News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

Next Story
तुर्की ने मार गिराया रूसी लड़ाकू विमान
अपडेट