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ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी, जो 77 साल की उम्र में सरहद पर लड़ना चाहते थे

23वीं पंजाब रेजीमेंट के उन जवानों का नेतृत्व उस वक्‍त मेजर कुलदीप सिह चांदपुरी ने किया था। आज (17 नवंबर,2018) देश का ये रणबांकुरा सिपाही चिर निद्रा में सो चुका है।

महावीर चक्र और विशिष्ट सेवा मैडल विजेता ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी। Express photo.

रेगिस्तान की सर्द रात में पाकिस्तानी फौज के सैकड़ों जवानों के राजस्थान में घुसने के दु:स्वप्नों को हमारे महज 120 जवानों के पराक्रम ने चकनाचूर कर दिया था। 23वीं पंजाब रेजीमेंट के उन जवानों का नेतृत्व उस वक्‍त मेजर कुलदीप सिह चांदपुरी ने किया था। आज (17 नवंबर,2018) देश का ये रणबांकुरा सिपाही चिर निद्रा में सो चुका है। पीटीआई-भाषा को साल 2017 में दिए एक इंटरव्यू में ब्रिगेडियर चांदपुरी ने 1971 की जीत का श्रेय अपने साथी जवानों को दिया था। ब्रिगेडियर चांदपुरी ने कहा था कि मैं आज भी खुद को सरहद पर लड़ने के लिए तैयार हूं और आखिरी सांस तक देश के लिए उपलब्ध हूं।

आज भी जैसलमेर से करीब 120 किलोमीटर दूर लोंगेवाला पोस्ट पर जाकर 46 साल पहले की चार-पांच दिसंबर की उस दरमियानी रात के मंजर को महसूस किया जा सकता है। वहां खडे पाकिस्तान के टैंक आपको भारतीय सपूतों की वीरता की कहानी बताते हैं। कुछ साल पहले पोस्ट को आम लोगों के लिए खोला गया था और आप भी उस रेत के गर्त में दबी भारतीय रणबांकुरों के साहस की कहानी को सामने से महसूस कर सकते हैं।

Longewala जीत के बाद मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी। फोटो- reportmysignal.blogspot.com से साभार

ब्रिगेडियर चांदपुरी हर साल पांच दिसंबर की सुबह यानी लोंगेवाला की उसी पोस्ट पर आयोजित समारोहों में भाग लेते थे। ये वही पोस्ट थी जिसकी 5 दिसंबर, 1971 की रात में उन्होंने जान पर खेलकर हिफाजत की थी। साल 2017 में भी 77 साल के ब्रिगेडियर चांदपुरी ने बिगड़ती सेहत और बढ़ती उम्र के बावजूद लोंगेवाला पोस्ट पर सेना के कार्यक्रम में शिरकत की थी। मेजर चांदपुरी चंडीगढ़ में रहा करते थे। उन्होंने भाषा को फोन पर दिए इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें जब भी सेना के अधिकारी किसी भी कार्यक्रम के लिए बुलाते हैं तो वह अवश्य जाते हैं चाहे सेहत साथ ना भी दे रही हो।

बड़े इत्मिनान से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘मैंने कभी न नहीं कहा। जब तक जिंदा हूं, देश के लिए हूं। सेना जब चाहे, मैं उपलब्ध हूं। आखिरी सांस तक लोंगेवाला जाता रहूंगा।’ ब्रिगेडियर चांदपुरी ने ये भी कहा, ‘हमें तो सरहद पर बुला लें तो आज भी लड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। सारी उम्र यही काम किया तो डरना कैसा।’ लोंगेवाला पोस्ट पर आयोजित समारोह में भारतीय सेना के जवान हर साल लड़ाई के उसी मंजर को जिंदा करते हैं। ये भारतीय वीरता और शौर्य के उस इतिहास की झलक पेश करता है।

Longewala1 जीत के बाद मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी। फोटो- reportmysignal.blogspot.com से साभार

अपने इंटरव्यू में ब्रिगेडियर चांदीपुरी ने कहा था,”1971 की लड़ाई में भारतीय सेना ने टी-35 टैंकों के साथ आए पाकिस्तान के सैकड़ों जवानों को रात भर रोककर रखा था। हमने उन्हें लोंगेवाला से आगे नहीं बढ़ने दिया। इस जंग में मेरे साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर लड़ने वाले जवानों की सर्वाधिक प्रशंसनीय भूमिका रही। मौत सामने देखकर भी पांव पीछे नहीं खींचने वाले इन जवानों की बहादुरी की वजह से ही अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी लडाई लड़ी गई और दुश्मन को नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया।”

उन्होंने कहा था कि एक सैनिक के तौर पर मैं उन जवानों को ही इस जीत का श्रेय देना चाहूंगा। बड़ी विनम्रता के साथ ब्रिगेडियर बोले, ‘मुझे महावीर चक्र और अन्य बहादुरी पुरस्कार मिले लेकिन इसका श्रेय आज भी मैं अपने साहसी और बहादुर जवानों को देता हूं।’

Longowal 2 लोंगोवाला युद्ध का ऐतिहासिक क्षण, जिसमें भारतीय सेना ने लोगोंवाला को पैटन टैंक की कब्रगाह बना दिया था। Express photo.

लड़ाई के मंजर के बारे में बयान करते हुए उन्होंने बताया था, ‘हमारे पास टैंक नहीं थे, हम चारों तरफ से घिरे थे। उस पर भी रेत के गुबार चुनौती पैदा करने वाले थे। सर्द रात भयावह लंबी लग रही थी। हम दिन चढ़ने की प्रार्थना कर रहे थे ताकि वायु सेना के विमान आ सकें।’ अंतत: वायुसेना के लड़ाकू हंटर विमानों ने आकर दुश्मन के कई टैंकों को तबाह कर दिया और लोंगेवाला के रास्ते राजस्थान के अंदर तक आने और यहां बड़े हिस्से पर कब्जा करने की पड़ोसी देश की साजिश नाकाम हो गयी।”

ब्रिगेडियर चांदपुरी ने कहा था, ‘भारतीय वायुसेना को मेरा सलाम। उनकी अपनी समस्याएं और सीमाएं थीं लेकिन उनके आते ही पाकिस्तान के टैंक तबाह हो गए।’ उन्होंने हल्के फुल्के अंदाज में यह भी कहा कि दुश्मन इतनी बड़ी फौज के साथ आया लेकिन वह 23वीं पंजाब बटालियन के जवानों के साथ फंस गया। ब्रिगेडियर चांदपुरी को जब पाकिस्तानी फौजों के लोंगेवाला की तरफ बढ़ने का पता चला था तो उनके पास दो ही विकल्प थे। या तो वे अपनी पोस्ट पर तैयार रहें या उसे छोड़कर पीछे चले जाएं। उन्होंने और उनके जवानों ने अपने मोर्चे से पीछे नहीं हटने और वही डटे रहने का फैसला किया।

उन्होंने बताया कि उन्हें और सारे जवानों को लोंगेवाला पोस्ट पर स्थित देवी के एक छोटे से मंदिर पर पूरा भरोसा रहा है, जहां वे रोज प्रसाद चढ़ाते थे और रात को देसी घी का दीया जलाते थे। ब्रिगेडियर चांदपुरी ने बताया कि मैं इस बार भी वहां जाकर पहले मंदिर पर मत्था टेकूंगा फिर आगे के कार्यक्रमों में हिस्सा लूंगा। फिल्मकार जेपी दत्ता की 1997 में आई हिट फिल्म ‘बार्डर’ लोंगेवाला की लड़ाई पर ही बनी थी जिसमें सनी देओल ने तत्कालीन मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी का किरदार अदा किया था।

(एजेंसी इनपुट के साथ।)

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