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डॉ कफील खान ने खुद को बताया बेगुनाह, योगी सरकार बोली- प्राइवेट प्रैक्टिस के दोषी, अभी भी चल रही जांच

सरकार के मुताबिक, कफील खान पर दो आरोप साबित नहीं हो सके। पहला यह कि बच्चों की मौत के वक्त खान हॉस्पिटल में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने अपने सीनियरों को ऑक्सीजन की कमी के बारे में सूचित नहीं किया। जांच में सामने आया कि 11 मई 2016 को डॉक्टर भूपेंद्र सिंह वार्ड 100 के इनचार्ज थे और खान ने तुरंत ही सीनियरों को ऑक्सीजन की कमी के बारे में सूचित किया था।

Author , लखनऊ, नई दिल्ली | Published on: September 29, 2019 9:47 AM
kafeel khanडॉक्टर कफील खान। (Express Photo: Tashi Tobgyal)

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल से निलंबित डॉक्टर कफील खान ने शनिवार को कहा कि उनकी ‘बेगुनाही’ का दावा सही साबित हुआ है। कफील ने उस विभागीय जांच की कॉपी भी दिखाई, जिसमें उन्हें कुछ आरोपों में बरी करने की बात कही गई है। हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा कि जांच प्रक्रिया अभी भी जारी है और आखिरी फैसला फिलहाल नहीं हुआ है।

अधिकारियों के मुताबिक, कफील खान के खिलाफ अनुशासनहीनता और नियमों को न मानने के आरोप में एक अतिरिक्त विभागीय जांच चल रही है। सीएम योगी आदित्यनाथ के मीडिया अडवाइजर मृत्युंजय कुमार ने कहा कि कफील ने चार आरोपों में जांच का सामना किया, जिनमें से दो में उन्हें दोषी पाया गया। उन्होंने कहा कि जांच की डिटेल्स ‘आरोपी अफसर के सामने’ जवाब देने के लिए पेश किए गए हैं और अभी कोई फाइनल डिसिजन नहीं हुआ है।

वहीं, दिल्ली में शनिवार को मीडिया को संबोधित करते हुए खान ने कहा कि उन्हें इन दो सालों में ‘काफी कुछ से गुजरना पड़ा है’ और वह अपना ‘आत्मसम्मान’ वापस चाहते हैं। उन्होंने बीआरडी अस्पताल में 2017 में मारे गए 60 नवजात बच्चों के लिए भी न्याय की मांग की। कफील ने मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट की उस इंटरनल इंक्वायरी रिपोर्ट को भी सामने रखा, जिसमें उन्हें लापरवाही वाले केस में बरी कर दिया गया था।

खान ने कहा, ‘मेरी बेगुनाही का दावा सही साबित हुआ। रिपोर्ट कहती है कि मैं उस वक्त सबसे जूनियर डॉक्टर था। मैंने बतौर जूनियर लेक्चरर प्रोबेशन के तहत जॉइन किया था और मुझे ऑक्सीजन सुनिश्चित करने और दूसरे प्रशासनिक फैसले लेने की इजाजत नहीं थी।’ वहीं, एक बयान में यूपी सरकार ने कहा कि खान नियमों के खिलाफ प्राइवेट प्रैक्टिस करने में लिप्त पाए गए। वह 23 मई 2013 को बीआरडी हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट में बतौर सीनियर रेजिडेंट नियुक्त हुए थे। वह अगस्त 2016 में लेक्चरर नियुक्त हुए। सरकार का दावा है कि डॉक्टर कफील प्राइवेट प्रैक्टिस करते रहे।

प्रदेश सरकार की ओर से जारी बयान के मुताबिक, खान की 2013 की नियुक्ति में यह साफ कर दिया गया था कि वह प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर सकते हालांकि, उनका नाम गोरखपुर के मेडिस्प्रिंग हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट में बतौर डॉक्टर दर्ज है। सरकार के मुताबिक, खान पर यह आरोप भी साबित हुआ है कि वह सरकारी डॉक्टर के तौर पर सेवा करते हुए प्राइवेट नर्सिंग होम चला रहे थे। सरकार के मुताबिक, खान ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि उनके खिलाफ प्राइवेट प्रैक्टिस का आरोप साबित नहीं हुआ। सरकार के मुताबिक, खान का जवाब ‘संतोषजनक’ नहीं था।

सरकार के मुताबिक, दो आरोप साबित नहीं हो सके। पहला यह कि बच्चों की मौत के वक्त खान हॉस्पिटल में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने अपने सीनियरों को ऑक्सीजन की कमी के बारे में सूचित नहीं किया। जांच में सामने आया कि 11 मई 2016 को डॉक्टर भूपेंद्र सिंह वार्ड 100 के इनचार्ज थे और खान ने तुरंत ही सीनियरों को ऑक्सीजन की कमी के बारे में सूचित किया था। सरकार के बयान के मुताबिक, दूसरा आरोप जो साबित नहीं हो सका कि पीडियाट्रिक्स जैसे संवेदनशील विभाग की सुविधाओं, ट्रीटमेंट और स्टाफ के लिए जिम्मेदार होने के बावजूद खान ने अपनी जिम्मेदारियों को नहीं निभाया। जांच में पाया गया कि खान वार्ड 100 के इनचार्ज नहीं थे। जो सबूत पेश किए गए, उससे आरोप नहीं साबित हुए।

प्राइवेट प्रैक्टिस के आरोपों पर द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में खान ने कहा, ‘रिपोर्ट कहती है कि दावे को सत्यापित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं मिला, लेकिन मुझे दोषी घोषित कर दिया गया। घटना 2017 में हुई जबकि मैं प्राइवेट प्रैक्टिस इससे काफी पहले कर रहा था। बीआरडी मेडिकल हॉस्पिटल जॉइन करने से पहले सारे पेपरवर्क कर लिए थे।’

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