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कर्नल होशियार सिंह: भारतीय फौज का ‘अभिमन्यु’, जिसने घायल होने पर भी लड़ना नहीं छोड़ा, तबाह कर दिया पाक का चक्रव्यूह

15 दिसंबर 1971 की जंग में पाकिस्तान के भारी हमले और गोलीबारी के बीच घायल होशियार सिंह बिल्कुल विचलित नहीं थे। उल्टा वह दोगुने जोश के साथ अपने साथियों का उत्साह बढ़ाते नज़र आ रहे थे। उस दिन की जंग में उनकी पल्टन ने 89 पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर कर दिया, जिसमें पाक फौज का एक लेफ्टिनेंट कर्नल रैंक का अफसर भी शामिल था। पाकिस्तानी फौज को अपने तमाम टैंक और गोलाबारूद के साथ पीछे हटना पड़ा।

Author November 26, 2018 12:46 PM
परमवीर चक्र विजेता कर्नल होशियार सिंह. फोटो क्रेडिट- ट्वीटर हैंडल, मेजर सुरेंद्र पुनिया

1971 की जंग में पाकिस्तानी सैनिक अपनी आख़िरी ताक़त लगा रहे थे। पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में आत्मसमर्पण के बावजूद पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान की फौज पीछे हटने को तैयार नहीं थी। उन्हें हर हाल में अपनी हारी हुई जमीन वापस चाहिए थी। लेकिन, कर्नल होशियार सिंह अपने बहादुर जवानों के साथ किसी फौलादी दीवार की तरह दुश्मनों के सामने डंटे हुए थे। उन्होंने ठान लिया था कि पाकिस्तान के हिस्से में अब एक इंच जमीन नहीं जाएगी। 15 दिसंबर 1971 पाकिस्तान के भारी हमले और गोलीबारी के बीच घायल होशियार सिंह बिल्कुल विचलित नहीं थे। उल्टा वह दोगुने जोश के साथ अपने साथियों का उत्साह बढ़ाते नज़र आ रहे थे। उस दिन की जंग में उनकी पल्टन ने 89 पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर कर दिया, जिसमें पाक फौज का एक लेफ्टिनेंट कर्नल रैंक का अफसर भी शामिल था। पाकिस्तानी फौज को अपने तमाम टैंक और गोलाबारूद के साथ पीछे हटना पड़ा। 1971 में पाकिस्तान के पश्चिमी सीमा पर हुई निर्णायक लड़ाई में कर्नल होशियार सिंह और उनकी पल्टन की बहादुरी से आज भी पाक सेना खौफ खाती है। उस जंग में पाकिस्तान के करीब 5 हजार सैनिकों के सामने भारत के 250 जांबाज डंटे हुए थे।

5 मई, 1935 को हरियाणा के सोनीपत में भारत के परमवीर चक्र विजेता होशियार सिंह का जन्म हुआ था। जाट परिवार में पैदा होशियार सिंह शुरू से ही पढ़ाई और खेलकूद में आगे थे। वह पहले वॉलीबॉल नेशनल टीम के कैप्टन भी रहे। होशियार सिंह की जिंदगी में बदलाव तब देखने को मिला जब उन्होंने 1957 में जाट रेजिमेंट में प्रवेश लिया और 3-ग्रेनेडियर्स में कमीशन लेकर अफसर बने। 1965 के बाद 1971 में उनके युद्ध कौशल और जांबाजी को देखते हुए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सम्मान ‘परवीर चक्र’ दिया गया। दरअसल, 1971 में बांग्ला-भाषी पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह हो गया। इस दौरान पश्चिमी पाकिस्तान के सैनिकों ने वहां क्रूरता की हदें लांघ डाली। इस दौरान बांग्लादेश सीमा (तब पूर्वी पाकिस्तान) पर पाकिस्तान से जंग छिड़ चुकी थी। मगर रणनीतिक रूप से बेहद अहम और संवेदनशील पश्चिमी सीमा का शकरगढ़ पठार (जम्मू-कश्मीर से सटा) पाकिस्तान के टारगेट पर था। पाकिस्तान इस इलाके से भारत के जम्मू-कश्मीर में दाखिल होने की फिराक में था। भारत ने भी इसी रास्ते पाकिस्तान में घुसने की कोशिश शुरू कर दी। क्योंकि, यहां से अगर दोनों सेनाओं में जो भी पहले एक दूसरे की सीमा में प्रवेश करता, वह भारी तबाही मचाता। लेकिन, भारतीय फौज कर्नल होशियार सिंह के नेतृत्व में पाकिस्तानी सीमा में दाखिल हो चुकी थी।

होशियार सिंह की 3-ग्रेनेडियर्स को 15 दिसंबर 1971 को जारपाल गांव पर कब्जा करने का आदेश मिला। मशीनगन की भारी गोलीबारी और बमबारी के बीच होशियार सिंह और उनके जवानों ने पाकिस्तानी सेना को पीछे खदेड़ दिया और जारपाल पर कब्जा जमा लिया। इस दौरान भारतीय फौज ने 20 पाक सैनिकों को बंदी बना लिया और उनके मोर्च से भारी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद बरामद किया। मगर, इस हार ने पाकिस्तान को बुरी तरह बौखला दिया। जिस रास्ते पाकिस्तान भारत में घुसने की फिराक में था। उस रास्ते पर तमाम टैंकों और लैंड-माइंस को ध्वस्त करते हुए भारतीय सेना उसकी सीमा में दाखिल हो चुकी थी। इसके अलावा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मोर्चों को भी अपने कब्जे में ले लिया था। पूर्वी सीमा (बांग्लादेश) पर पाकिस्तान की हालत पहले ही खस्ताहाल हो चुकी थी। उसके 95 हजार से अधिक सैनिकों को भारतीय फौज ने घेर रखा था और सरेंडर के लिए मज़बूर कर दिया था। इधर पश्चिमी सीमा पर भी तमाम हमलों के बावजूद पाकिस्तानी सेना भारतीय फौज को एक इंच भी पीछे नहीं हटा पा रही थी।

चारो तरफ मिल रही शिकस्त से तिलमिलाई पाक फौज ने 16 दिसंबर 1971 को भारी संख्या में जारपाल में डंटे होशियार सिंह की पल्टन पर हमला बोल दिया। इस दौरान 3-ग्रेनेडियर्स को घमासान युद्ध का सामना करना पड़ा। मगर, दुश्मन के बड़े आक्रमण का होशियार सिंह और उनकी पल्टन ने मुंहतोड़ जवाब दिया। एक वक्त ऐसा आया जब पाकिस्तानी फौज लाइट मशीनगन के जरिए भारतीय फौज को ज्यादा नुकसान पहुंचाने लगी। खुद कर्नल होशियार सिंह बुरी तरह जख्मी थे। बावजूद इसके वह एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे में अपने सैनिकों में जोश भर रहे थे और दुश्मन पर ताबड़तोड़ गोलियां दाग रहे थे। दुश्मन की ताकत को पूरी तरह नेस्तनाबूत करने का उन्होंने फाइनल सॉल्यूशन निकाला और अपने जवानों को पाकिस्तान फौज के मोर्चे तक कूंच करने का आदेश दिया। भारतीय फौज के इस बहादुरी को देख पाकिस्तानी फौज को पीछे हटना पड़ा। हालांकि, कुछ बचे खुचे सैनिक फायरिंग जारी रखे हुए थे। उस दौरान भारतीय फौज ने दुश्मन की खूब तबाही मचाई थी। उस दिन जंग में पाकिस्तान के 89 सैनिक मारे गए थे। इनमें उनका कमांडिंग अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल मोहम्मद अकरम राजा भी शामिल था।

17 दिसंबर 1971 को शाम 6 बजे आदेश मिला कि 2 घंटे बाद युद्ध विराम हो जाएगा। युद्ध विराम को देखते हुए 2 घंटे के भीतर एक दूसरे को ज्यादा से ज्यादा पीछे धकेलने के लिए जमकर लड़ाई हुई। आखिरकार युद्ध विराम की घोषणा हो गयी। तब तक होशियार सिंह की 3-ग्रेनेडियर्स के एक अधिकारी और 32 फौजी शहीद हो चुके थे। इस जंग के खत्म होने के बाद बाग्लादेश का अस्तित्व सामने आया और युद्ध भूमि में बहादुरी की मिसाल पेश करने वाले होशियार सिंह को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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