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कहानी कारगिल शहीद कैप्टन मनोज पांडेय की जिन्होंने ‘मौत की हत्या’ करने का प्रण लिया था

हमने कारगिल के युद्ध को तो जीत लिया। लेकिन उसे जीतने की कोशिश में हमने कई बहादुर सैनिकों जैसे सौरभ कालिया, विजयंत थापर, पदमपाणि आचार्य, मनोज पांडेय, अनुज नायर और विक्रम बत्रा को खो दिया।

अमर शहीद कैप्टन मनोज कुमार पांडेय। फोटो- फेसबुक

कारगिल की जंग को भारतीय सरजमीं पर लड़े गए सबसे खूनी मुकाबलों में से एक माना जाता है। इस युद्ध में भारत के सैकड़ों बहादुर सैनिकों ने अपने प्राणों की कुर्बानी दी थी। इनमें अनुज नायर, विक्रम बत्रा और कैप्टन मनोज पांडे जैसे वीर सिपाही भी शामिल थे। इन सिपाहियों ने गोलियां लगने के बावजूद घुसपैठियों को कड़ी टक्कर दी और हर उस मोर्चे पर फतेह हासिल की जो सिर्फ उनके देश का था। आज कैप्टन मनोज कुमार पांडेय का शहीदी दिवस है। आज ही के दिन उन्होंने खालूबार की चोटी पर कब्जा किया था। इस चोटी पर तिरंगा फहराने के लिए ही उन्होंने अपनी शहादत दी थी।

सेना में शामिल होना था सपना : कैप्टन मनोज पांडेय का जन्म यूपी के सीतापुर के कमलापुर में 25 जून 1975 को हुआ था। उनके पिता का नाम गोपी चंद्र पांडे था। अपने बचपन से ही कैप्टन मनोज पांडेय अपनी मां से वीरों की कहानियां सुना करते थे। इन्हीं कहानियों ने उनके मन में सेना में जाने की भावना को पुख्ता किया था। मनोज की शिक्षा लखनऊ के सैनिक स्कूल में हुई। यहीं से उन्होंने अनुशासन और देशप्रेम का पाठ सीखा। इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद मनोज ने प्रतियोगी परीक्षा पास करके पुणे के पास खड़कवासला स्थित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में दाखिला लिया था।

‘तो मैं मौत को मार डालूंगा’: कारगिल युद्ध भारत के लिए बेहद तनाव भरी स्थिति थी। सभी सैनिकों की आधिकारिक छुट्टियां रद कर दी गईं ​थीं। महज 24 साल के कैप्टन मनोज पांडेय को आॅपरेशन विजय के दौरान जुबर टॉप पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई थी। हाड़ कंपाने वाली ठंड और थका देने वाले युद्ध के बावजूद कैप्टन मनोज कुमार पांडेय की हिम्मत ने जवाब नहीं दिया। युद्ध के बीच भी वह अपने विचार अपनी डायरी में लिखा करते थे। उनके विचारों में अपने देश के लिए प्यार साफ दिखता था। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था,”अगर मौत मेरा शौर्य साबित होने से पहले मुझ पर हमला ​करती है तो मैं अपनी मौत को ही मार डालूंगा।”

लखनऊ शहर के गोमती नगर इलाके में मनोज पांडेय चौराहे पर लगी अमर शहीद कैप्टन मनोज पांडेय की प्रतिमा। फोटो- फेसबुक

‘मैं परमवीर चक्र जीतना चाहता हूं’: अपने बचपन से ही कैप्टन मनोज पांडेय अपनी मां से वीरों की कहानियां सुना करते थे। सेवा चयन बोर्ड ने उनके इंटरव्यू के दौरान उनसे पूछा था,”आप सेना में क्यों शामिल होना चाहते हैं? मनोज ने कहा,”मैं परमवीर चक्र जीतना चाहता हूं।” मनोज पांडेय को न सिर्फ सेना में भर्ती किया गया बल्कि 1/11 गोरखा रायफल में भी कमिशन दिया गया था। इंटरव्यू में कहे हुए उनके शब्द सच साबित हुए। उन्हें कारगिल युद्ध में अपनी वीरता को साबित करने के लिए भारत के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

खुखुरी से मारे थे चार दुश्मन: तीन जुलाई 1999, कैप्टन मनोज पांडेय की जिंदगी का सबसे ऐतिहासिक दिन था। हाड़कंपाऊ ठंड में उन्हें खालुबर चोटी को दुश्मनों से आजाद करवाने का जिम्मा दिया गया। उन्हें दुश्मनों को दायीं तरफ से घेरना था। जबकि बाकी टुकड़ी बायीं तरफ से दुश्मन को घेरने वाली थी। वह दुश्मन के सैनिकों पर चीते की तरह टूट पड़े और उन्हें अपनी खुखुरी से फाड़कर रख दिया। उनकी खुखुरी ने चार सैनिकों की जान ली। ये लड़ाई हाथों से लड़ी गई ​थी।

सेना की ट्रेनिंग के दौरान मनोज कुमार पांडे। फोटो- फेसबुक

घायल होने पर भी लड़ी जंग: इस पूरी मुहिम में उनके कंधे और घुटनों पर चोट लगी थी। चोट लगने के बावजूद उन्होंने पीछे लौटने से इंकार कर दिया। घायल हालत में ही अपने सैनिकों को लड़ने की हिम्मत देते रहे। उन्होंने अपनी गोलियों और ग्रेनेड हमलों से दुश्मन के सारे बंकर तबाह कर दिए ​थे। इन्हीं हमलों की चोट उनकी जान पर भारी पड़ी और कैप्टन मनोज पांडेय ने खालुबर की चोटी पर ही शौर्य के सबसे ऊंचे शिखर को छू लिया। हमने कारगिल के युद्ध को तो जीत लिया। लेकिन उसे जीतने की कोशिश में हमने कई बहादुर सैनिकों जैसे सौरभ कालिया, विजयंत थापर, पदमपाणि आचार्य, मनोज पांडेय, अनुज नायर और विक्रम बत्रा को खो दिया।

सेना की ट्रेनिंग के दौरान अपनी डायरी लिखते हुए मनोज पांडेय। फोटो- फेसबुक

हमेशा याद रहेंगे कैप्टन: 2003 में बनी फिल्म एलओसी कारगिल में कैप्टन मनोज पांडेय का किरदार अजय देवगन ने निभाया था। अमर चित्र कथा ने भी उनकी वीरता पर कॉमिक बुक प्रकाशित की थी। भारत सरकार ने अदम्य साहस और शौर्य के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया था। उनकी वीरता हर भारतीय के लिए आदर्श है। उन्होंने अपनी डायरी में एक लाइन लिखी थी, जो सिर्फ उनके जैसा दिलेर ही लिख सकता था। उन्होंने लिखा था,”कुछ लक्ष्य इतने महान होते हैं कि उन्हें पाने में विफल होना भी गौरवपूर्ण होता है।”

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