सामाजिक कार्यकर्ता और तर्कवादी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में मुख्य दोषी सचिन अंदुरे को बॉम्बे हाई कोर्ट ने जमानत दे दी है। साथ ही उम्रकैद की सजा पर रोक भी लगा दी गई है। नरेंद्र दाभोलकर की अगस्त 2013 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जस्टिस सारंग कोतवाल और जस्टिस रंजीतसिंह भोंसले की डिवीजन बेंच ने यह आदेश सुनाया। मामले में एक अन्य दोषी शरद कालस्कर को इस साल अप्रैल में जस्टिस अजय गडकरी की अगुवाई वाली को-ऑर्डिनेट बेंच ने जमानत दी थी।
दोषी ने की थी सजा रद्द करने की मांग
सचिन अंदुरे ने अपने वकील वीरेंद्र इचलकरंजीकर के जरिए जमानत और सजा सस्पेंड करने की मांग की थी। उसने स्पेशल UAPA कोर्ट के 10 मई, 2024 के फैसले को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन्हें आरोपी शरद कालस्कर के साथ दोषी ठहराया गया था और उम्रकैद की सजा दी गई थी।
सचिन अंदुरे ने जमानत मांगने के लिए जो मुख्य आधार बताए, उनमें से एक यह था कि CBI ने कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं की थी और कुछ गवाहों ने कोर्ट में सीधे उनकी पहचान की थी। उन्होंने चश्मदीद गवाहों के बयानों में भी अंतर बताया, जिसमें कुछ गवाहों ने दावा किया कि उन्होंने उसे नरेंद्र दाभोलकर को गोली मारते हुए देखा था और कुछ ने उसे मौके पर देखने से इनकार किया था।
एक और वजह यह बताई गई कि वह लंबे समय से जेल में थे और यह बात कि स्पेशल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उनकी अपील पर जल्द ही सुनवाई नहीं होगी। हालांकि नरेंद्र दाभोलकर परिवार ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि इससे समाज में गलत मैसेज जाएगा क्योंकि न केवल दाभोलकर बल्कि कॉमरेड गोविंद पानसरे, पत्रकार गौरी लंकेश और एमएम कलबुर्गी जैसे दूसरे बुद्धिजीवियों को भी इसी तरह मारा गया था। उन्होंने तर्क दिया कि कुछ खास आवाज़ों को खत्म करने के लिए एक सोची-समझी साज़िश रची गई थी।
स्पेशल कोर्ट ने ठहराया था दोषी
स्पेशल कोर्ट ने अंदुरे और शरद कालस्कर को इंडियन पीनल कोड की हत्या (सेक्शन 302) और कॉमन इंटेंशन (सेक्शन 34) के आरोपों के तहत दोषी ठहराया था। कोर्ट ने दूसरे आरोपियों (डॉ. वीरेंद्र तावड़े- हत्या के कथित मास्टरमाइंड, विक्रम भावे- वकील संजीव पुनालेकर को हत्या) को कॉमन इंटेंशन और क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी (सेक्शन 120B) के आरोपों से बरी कर दिया था। कोर्ट ने पांचों आरोपियों में से किसी को भी आतंकवादी गतिविधियों (अनलॉफुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट (UAPA) के सेक्शन 16) और आर्म्स एक्ट के संबंधित प्रावधानों के लिए दोषी नहीं ठहराया था।
दाभोलकर अपने संगठन महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के जरिए अंधविश्वास के खिलाफ काम करते थे। उनको 20 अगस्त, 2013 को पुणे में सुबह की सैर पर बाइक सवार दो लोगों ने गोली मार दी थी। सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने 2014 में बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद जांच अपने हाथ में ली थी। सीबीआई ने अंदुरे और कालस्कर की पहचान इस जघन्य अपराध के पीछे के अपराधियों के रूप में की।
2021 में शुरू हुआ था केस का ट्रायल
केस का ट्रायल 2021 में शुरू हुआ, हालांकि सेशन केस 2016 में शुरू किया गया था। अभियोजक ने तर्क दिया कि दाभोलकर की हत्या अंधविश्वास को चुनौती देने और तर्कवाद को बढ़ावा देने वाली आवाज़ों को चुप कराने की साज़िश का हिस्सा थी।
2015 में दाभोलकर के परिवार ने केस की जांच के लिए एक इंडिपेंडेंट स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाने के लिए हाई कोर्ट में अर्जी दी थी। हाई कोर्ट ने अगस्त 2015 में जांच की मॉनिटरिंग शुरू की। हालांकि दिसंबर 2022 में, हाई कोर्ट ने ट्रायल प्रोसेस पर भरोसा जताते हुए जांच की मॉनिटरिंग बंद करने का फैसला किया। पुणे कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद, दाभोलकर के परिवार के सदस्यों ने उनकी बेटी मुक्ता के नेतृत्व में हाई कोर्ट में एक अपील दायर की, जिसमें स्पेशल कोर्ट के तीनों आरोपियों को केस से बरी करने के फैसले को चुनौती दी गई। कलास्कर और अंदुरे ने भी एक और क्रॉस अपील दायर की है, दोनों ने अपनी सज़ा को चुनौती दी है।
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