पिछले हफ्ते सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें वायरल होने के बाद एक विवाद खड़ा हो गया। इन तस्वीरों में मुंबई की मेयर रितु तावड़े की सरकारी गाड़ी पर लाल और नीली चमकने वाली लाइट लगी हुई दिखाई दे रही थीं। नियमों के संभावित उल्लंघन को लेकर हुई आलोचना के बाद बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) ने रविवार (15 मार्च) को बताया कि मेयर की गाड़ी और उनके साथ चलने वाली एस्कॉर्ट गाड़ी से लाइट हटा दी गई हैं। इस घटना ने एक बार फिर महाराष्ट्र में गाड़ियों पर लाल-नीली लाइटों के इस्तेमाल से जुड़े नियमों की ओर लोगों का ध्यान खींचा है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

पिछले हफ़्ते सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट सामने आए जिनमें मेयर की सरकारी गाड़ी के बोनट पर लगी लाल और नीली लाइट का ज़िक्र था। यह मामला सामने आते ही रविवार को BMC ने मेयर की गाड़ी और उनकी एस्कॉर्ट गाड़ी से लाइट हटा दीं। नगर निगम ने बताया कि जब कोई पदाधिकारी अपना पद संभालता है, तो प्रशासन की ओर से उसे ये गाड़ियां मुहैया कराई जाती हैं और जैसे ही यह मामला उनके संज्ञान में आया, तुरंत ही उन गाड़ियों से लाइट हटा दी गईं।

नियम क्या कहते हैं?

भारत में लाल-नीली या चमकने वाली लाइटों से जुड़े नियमों का संचालन मुख्य रूप से ‘केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989’ के तहत होता है। ये नियम ही तय करते हैं कि गाड़ियों पर किस तरह की लाइटें लगाई जा सकती हैं। कई सालों तक, लाल लाइटों (जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में लाल बत्ती कहा जाता था) का इस्तेमाल मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और अन्य गणमान्य व्यक्ति सड़कों पर अपनी विशेष हैसियत या रुतबा दिखाने के लिए करते थे।

2017 में इस चलन में बदलाव आया, जब केंद्र सरकार ने नियमों में संशोधन करते हुए पूरे देश में सरकारी गाड़ियों पर लाल लाइटों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी। यह नया नियम 1 मई, 2017 से लागू हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य उस ‘VIP संस्कृति’ को खत्म करना था, जिसकी भारतीय सड़कों पर अक्सर आलोचना की जाती थी। संशोधित नियमों के अनुसार, अब राजनीतिक नेता, मंत्री और सरकारी अधिकारी अपनी गाड़ियों पर लाल लाइटों का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं।

किन गाड़ियों पर चमकने वाली लाइटों का इस्तेमाल किया जा सकता है?

अब चमकने वाली लाइटों का इस्तेमाल केवल उन गाड़ियों तक ही सीमित है जो आपातकालीन या कानून-व्यवस्था से जुड़े कार्यों में लगी होती हैं। इनमें पुलिस की गाड़ियां, एंबुलेंस, दमकल विभाग की गाड़ियां और आपदा राहत कार्य में लगी गाड़ियां शामिल हैं। इन लाइटों का मुख्य मकसद सड़क पर चल रहे अन्य वाहन चालकों को सचेत करना और आपातकालीन स्थितियों के दौरान इन गाड़ियों को तेज़ी से आगे बढ़ने में मदद करना होता है।

आमतौर पर लाल और नीली लाइटों का एक साथ इस्तेमाल पुलिस या आपातकालीन सेवा से जुड़ी गाड़ियों की पहचान के तौर पर किया जाता है। इसी वजह से अगर राजनीतिक पदाधिकारियों या सरकारी अधिकारियों की गाड़ियों पर इन लाइटों का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह सवाल उठ सकता है कि क्या नियमों का सही ढंग से पालन किया जा रहा है या नहीं। अलग-अलग राज्यों के ट्रैफिक अधिकारियों ने बार-बार चेतावनी दी है कि ऐसी लाइटों का बिना इजाज़त इस्तेमाल गैर-कानूनी है और मोटर वाहन अधिनियम के तहत इस पर जुर्माना लग सकता है।

चूंकि ये नियम केंद्रीय मोटर वाहन नियमों का हिस्सा हैं, इसलिए ये महाराष्ट्र समेत सभी राज्यों पर लागू होते हैं। निजी या सरकारी गाड़ियों पर बिना इजाज़त ऐसी लाइटें लगवाने पर ट्रैफिक पुलिस कार्रवाई कर सकती है।

इस पर राजनीतिक प्रतिक्रिया क्या आई?

मुंबई की पूर्व मेयर किशोरी पेडनेकर ने इस कदम की आलोचना की और सवाल उठाया कि इन नियमों को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है। हालांकि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने कहा कि मेयर को बेवजह निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें लाल बत्ती पर रोक लगाने वाले नियमों की जानकारी थी। फड़नवीस ने पत्रकारों से कहा, “मैंने इस मामले में जानकारी ली और पता चला कि लाल बत्ती गाड़ी के बोनट पर लगी थी। इसमें मेयर की कोई गलती नहीं है। एक पुराने फैसले में साफ तौर पर कहा गया है कि राज्य में कोई भी लाल बत्ती का इस्तेमाल नहीं करेगा और मेयर को इस बात की पूरी जानकारी है। उन्हें बेवजह निशाना बनाया जा रहा है, जो कि गलत है।”

(यह भी पढ़ें- रितु तावड़े के BMC मेयर बनने के बाद देवेंद्र फड़नवीस की पहली प्रतिक्रिया)

भारतीय जनता पार्टी की पार्षद रितु तावड़े बिना किसी विरोध के मुंबई की सिविक बॉडी, बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (BMC) की मेयर चुनी गई हैं और शिवसेना के संजय घाड़ी डिप्टी मेयर चुने गए हैं। उनके मेयर बनने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने अपना वादा पूरा करने का पोस्ट किया है।