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अमित शाह की रैली के बहाने भाजपा सीमांचल में अपने दम पर चुनाव जीतने की जुगत में

आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बिहार में भाजपा को कमल खिलाने की चिंता साफ नजर आ रही है।

अमित शाह की रैली के बहाने भाजपा सीमांचल में अपने दम पर चुनाव जीतने की जुगत में
जनभावना रैली की तैयारी पूरी।

सीमांचल की चारों सीटें किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार पर एनडीए को 2014 में करारी हार का सामना करना पड़ा था। जबकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने यहां ताबड़तोड़ रैलियां की थी। अब फिर 23 सितंबर को गृहमंत्री अमित शाह की पूर्णिया में रैली हो रही है।

इस रैली को 2024 के लोकसभा चुनाव के नजरिए से राजनीतिक पंडित देख रहे हैं। जदयू के एनडीए से अलग होने के बाद पहली यह बड़ी जनसभा भाजपा की है। इसमें आतंकवाद और नक्सलवाद को फोकस कर सुरक्षा का मुद्दा उछालने की तैयारी है। तभी तो अमित शाह के बिहार आने से पहले कहा गया कि बिहार के भीमबांध के दुर्गम क्षेत्रों को नक्सलियों से मुक्त करा लिया गया है। साथ ही झारखंड के बूढ़ा बांध और चक्रबन्धा का भी नाम लिया गया। मसलन सीमांचल की रैली से अमित शाह बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल की सीटों पर प्रभाव डालने की कोशिश में हैं।

बुधवार को भाजपा नेता शाहनबाज हुसैन ने भागलपुर में बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि गृहमंत्री अमित शाह के दौरे से सीमावर्ती इलाकों में अपराध व आतंकवाद की जड़ें हिलेंगी। और घुसपैठियों पर लगाम लगेगी। विदित हो कि बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा भाजपा का पुराना है। भाजपानीत एनडीए की केंद्र सरकार को आठ साल हो चुके हैं। मगर यह अलाप आज भी जारी है।

बिहार भाजपा की कार्यसमिति की बैठक 2 मई 2017 को किशनगंज में हुई थी। उत्तर बिहार खासकर सीमांचल में भारतीय जनता पार्टी अपनी पैठ कैसे मजबूत करे इस पर किशनगंज में मंथन हुआ था । उस वक्त भी बंगलादेशी घुसपैठ का मुद्दा उठा था । यह मुद्दा हमेशा से प्रमुखता से उठता रहा है। दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 सीटों में से 31 सीटें भले ही एनडीए को मिली हों , मगर सीमांचल की चारों सीटें किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार पर एनडीए को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

मसलन, भागलपुर और आसपास के इलाकों में भाजपा की मोदी लहर भी बेअसर रही। इसके बाद 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी लाख कोशिशों के बावजूद एनडीए को भारी शिकस्त मिली तो भाजपा आलाकमान की नींद उड़ गई। उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ताबड़तोड़ सभाएं यहां की थी। मगर वे वोटों का ध्रुवीकरण कराने में उत्तर प्रदेश की तरह कामयाब नहीं हो सके थे।

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव महागठबंधन नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा था। अब फिर वही हालात बन गए हैं। हालांकि, नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन और बिहार सरकार पर भाजपा का खासकर राजद और लालू परिवार पर हमला 2015 से 2017 की तरह फिर तेज हो गया है। सरकार में फूट डालने की कोई कोशिश भी ये नहीं छोड़ रहे हैं। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार एनडीए का हिस्सा बनकर चुनाव लड़े थे। तब 40 सीट में से 39 सीटें जीती थी।

भाजपा को 17, जदयू को 16 और लोजपा को 6 सीटें मिली थी। किशनगंज सीट पर कांग्रेस के डॉ. मो. जावेद जीते थे। नीतीश कुमार के एनडीए से अलग होने पर अब हालात बदल गए हैं। महागठबंधन में राजद, कांग्रेस, जदयू समेत कई राजनीतिक दल एक साथ हैं। भाजपा एक तरह से अकेली पड़ गई है। इसीलिए 2024 का लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए मुश्किलों भरा है। अब भाजपा के पास केवल किशनगंज की सीट ही रह गई है। बाकी जदयू के पास चली गई।

इसी को ध्यान में रख (शुक्रवार) 23 सितंबर को आयोजित अमित शाह की रैली की सफलता के लिए भाजपा के तमाम बड़े नेता पूर्णिया और आसपास डेरा डाले हुए हैं। और सीमांचल के चार जिलों के अलावे कोशी, भागलपुर, बांका से भी लोगों को रैली में ले जाने की कोशिश में हैं। इसके लिए कार्यकर्ताओं ने भी ग़ांव-ग़ांव का दौरा किया है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता मनोज शर्मा रैली की भारी सफलता का दावा करते हैं। मगर यह वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश है।

सीमांचल के चारों ज़िले को मिलाकर 24 विधानसभा सीटें हैं। यह इलाका मुस्लिम बहुल है। जानकार बताते हैं कि 67.70 फीसदी किशनगंज की आवादी मुस्लिम है। 43 फीसदी कटिहार, 40 फीसदी अररिया और 38 फीसदी पूर्णिया में मुसलमान आवादी है। अररिया से 2014 में राजद के तस्लीमुद्दीन जीते थे। इनके इंतकाल के बाद उपचुनाव 2018 में हुआ तो यहां से राजद के सरफराज जीते। मगर 2019 के आमचुनाव में भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह जीते। उस वक्त जदयू भाजपा एक साथ थी। पूर्णिया से जदयू के संतोष कुशवाहा ,कटिहार से जदयू के दलाल चंद्र गोस्वामी और किशनगंज से कांग्रेस के डॉ.मो. जावेद सांसद हैं, जो अब महागठबंधन का हिस्सा बन गए हैं।

दूसरी तरफ नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन को डर है कि अमित शाह की रैली से कौमी माहौल खराब होगा। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने भी इस बाबत बयान दिया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक महागठबंधन जल्द सदभावना रैली करेगी। पैदल मार्च निकालने की भी योजना है। ताकि मतदाताओं को घर-घर जाकर भाजपा की कौमी जहर फैलाने की साजिश का पर्दाफाश किया जा सके। फिलहाल महागठबंधन नेताओं के यह चिंतन और मंथन में है। अभी साफ तस्वीर सामने नहीं है। लेकिन अमित शाह की रैली के बाद इसकी घोषणा तय मानी जा रही है।

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