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एक समय आरएसएस में भी हुई थी आडवाणी की आलोचना, आज मोदी-शाह के राज में हुए किनारे

भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे लाल कृष्ण आडवाणी आज अपनी पार्टी में बिल्कुल अलग-थलग दिखाई दे रहे हैं। आज उनकी पार्टी ही उनके रुख से किनारा कर चुकी है। आडवाणी ही वह व्यक्ति हैं जो पार्टी के राम मंदिर आंदोलन का चेहरा रहे।

Author Updated: April 5, 2019 6:46 PM
6 दिसंबर को अपनी जिंदगी का दुखद दिन बता चुके हैं आडवाणी। (फाइल फोटोः इंडियन एक्सप्रेस)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पहचान के साथ ही राम मंदिर आंदोलन के अगुवा रहे लाल कृष्ण आडवाणी आज अपनी पार्टी में न सिर्फ अलग-थलग पड़ गए हैं बल्कि उनकी पार्टी ने उनके रुख से भी किनारा कर लिया है। आडवाणी महज 14 साल की उम्र से ही आरएसएस से जुड़ गए थे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के करीब सात दशक पार्टी को दिए।

पहले जनसंघ और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी। आडवाणी दोनों ही पार्टियों के संस्थापक सदस्य के रूप में जुड़े थे। आडवाणी ने हाल ही में अपने ब्लॉग में अपने जीवन के मार्गदर्शक सिद्धांत का जिक्र किया। इसमें उन्होंने ‘पहले देश, फिर पार्टी और आखिर में खुद’ की बात कही। Scroll ने लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय की अनुमति से उनकी किताब ‘The RSS: Icons Of The Indian Right’ के आधार पर एक रिपोर्ट लिखी है।

इसके अनुसार एक समय ऐसा भी आया जब आडवाणी को संघ में आलोचना का सामना करना पड़ा था। इसमें बताया गया है कि भाजपा में आडवाणी ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद के विध्वंस का मार्ग प्रशस्त किया था। विश्व हिंदू परिषद् व उसके नेता अपने अभियान के शुरुआती समय में यह तर्क देते थे कि विवादित जगह पर राम मंदिर का दावा एक दिन ‘साबित’ हो जाएगा।

भले ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अपनी रामायण स्थल प्रोजेक्ट की अपनी रिपोर्ट में यह बताया था कि 11वीं शताब्दी बीसी से पहले तत्कालीन अयोध्या में किसी भी प्रकार के मानव द्वारा निर्माण का कोई प्रमाण नहीं है। जिस समय संघ परिवार आस्था और तथ्यों की पहेली में उलझा हुआ था, उस समय आडवाणी ही थे जो उनके बचाव में सार्वजनिक रूप से यह कहते हुए आए थे कि राम आस्था का मुद्दा हैं।

उनके बयान का यह मास्टरस्ट्रोक ही था जिसने तर्क पर विश्वास की धारणा का मार्ग प्रशस्त किया। आडवाणी के इस रुख के बाद ही आरएसएस और उसकी सहायक इकाइयों को ऐतिहासिक तथ्यों के मुकाबले वाले बोझ से तुरंत निर्वाण मिला। ‘लिबटार्ड’ जैसे कई वाक्यांश जो आज शहरी राजनीतिक कथा का हिस्सा बन गए हैं, इसका अर्थ उस तरह के लोगों से है जो हठीला होने के साथ उदार हो।

आज के सत्ता के दौर में ‘भक्त’ आशय अंध भक्त से हो गया है। यह आडवाणी ही थे जिन्होंने भारतीय राजनीति के शब्दकोष में एक महत्वपूर्ण वाक्यांश दिया था। इसने भाजपा को अपने समर्थकों के बीच स्वीकार्यता दिलाई। उनका तर्क था कि संघ परिवार और उससे जुड़ी ईकाइयों को वास्तविक धर्मनिरपेक्ष में विश्वास करना चाहिए जो कि ‘सबके के लिए समानता, लेकिन किसी का तुष्टिकरण नहीं’ के सिद्धांत पर आधारित हो।

जबकि अन्य दल धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों का तुष्टिकरण कर रहे थे। इसलिए उन्हें हिंदू विरोधी और छद्म धर्मनिरपेक्ष माना जाए। राम मंदिर आंदोलन के एक समय में और विशेषकर बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आडवाणी ने अपना वास्तिवक तर्क पेश किया था। उन्होंने कहा था कि उनका अभियान अयोध्या में राम मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचार को प्रचारित करने की बड़ी योजना का हिस्सा होगा।

आडवाणी ने आधुनिक भारत के लिए एक प्रमुख हिंदुत्व आदर्श रखा था। जब अधिकतर वीएचपी नेता बड़ी-बड़ी बातें करते थे उस समय लालकृष्ण आडवाणी को अच्छे तर्क के साथ अपनी बात रखना पसंद था। वह हिंदुत्व के पीछे की राजनीतिक सोच को आगे बढ़ाने पर लगातार जोर देते थे। आडवाणी एक ऐसा शब्दभंडार गढ़ने में कामयाब हुए जो सुसंगत और तर्कसंगत था।

1990 का दशक पूरी तरह से आडवाणी के नाम था। उस समय बिहार के समस्तीपुर में लालू प्रसाद यादव ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत आडवाणी को गिरफ्तार किया था। इस बीच बीबीसी ने साल के व्यक्ति के लिए अवार्ड के लिए नामांकन आमंत्रित किए। बीबीसी ने पाया कि आडवाणी के अनेक समर्थकों ने उनका चयन सुनिश्चित करने के लिए कई नामांकन भेजे।

बाद में बीबीसी ने उस सूची से ही आडवाणी का नाम हटा दिया लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आडवाणी स्पष्ट रूप से अपने कैडर में ‘मैन ऑफ द मोमेंट’ थे। दो साल बाद झांसी के गेस्ट हाउस में आंशिक नजरबंदी में उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के लिए दो लेख लिखे। इसमें उन्होंने 6 दिसंबर को अपने जीवन का ‘सबसे दुखद दिन’ बताया था।

वहां से बाहर निकलने के बाद जब उनसे पूछा गया कि क्या वह वास्तव में मस्जिद विध्वंस पर राष्ट्र से माफी मांग रहे थे? इस पर उन्होंने नहीं में जवाब दिया था। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा कि उन्हें संघ की भीड़ को नियंत्रित नहीं कर पाने की क्षमता के कारण दुख पहुंचा था। इसका परिणाम था कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से नुकसान हुआ।

उन्होंने लिखा कि अपना दुख व्यक्त करने पर ना सिर्फ संघ परिवार में उनकी आलोचना की गई बल्कि सेक्यूलर समूह भी इस आलोचना में शामिल थे। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पार्टी ने आडवाणी के स्थान पर अटल के उदार चेहरे के साथ आगे बढ़ने का फैसला लिया। अटल के लिए जगह खाली करना आडवाणी की मजबूरी थी।

इसके बाद साल 2005 में जिन्ना प्रकरण से भी आडवाणी को काफी नुकसान हुआ। संघ ने आडवाणी से दूरी बना ली। साल 2013 में आडवाणी ने गोवा में पार्टी के सम्मेलन में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए खुद नरेंद्र मोदी का नाम प्रस्तावित किया।

उस समय उनके दर्द को साझा करने वाले उनके आसपास कोई भी नहीं था। आडवाणी ने भाजपा की लगभग एक पूरी पीढ़ी का मार्गदर्शन किया। इन सब के बदले उन्हें काफी दुखद प्रतिक्रिया मिली। राजनीति का शायद यही हकीकत है कि उसका चेहरा बड़ा ही क्रूर होता है।

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