पश्चिम बंगाल की राजनीति का असर अब महाराष्ट्र तक पहुंच सकता है। तृणमूल कांग्रेस में मची भगदड़ ने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की चिंताएं बढ़ा दी हैं। दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के करीब 20 सांसद एनडीए को समर्थन दे सकते हैं। इस संबंध में कुछ पत्र भी सामने आए हैं। अगर यह स्थिति हकीकत में बदलती है तो संसद में एकनाथ शिंदे की बारगेनिंग पावर कमजोर पड़ सकती है।
2024 के लोकसभा चुनाव में एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 7 सीटें जीती थीं। इन सात सांसदों के साथ उनकी पार्टी एनडीए के भीतर चौथी सबसे बड़ी सहयोगी बनकर उभरी थी। यह वह समय था, जब भाजपा अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर पाई थी। ऐसे में शिंदे का राजनीतिक महत्व सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा बल्कि दिल्ली तक उनकी आवाज सुनी जाने लगी।
महाराष्ट्र की राजनीति की बदलती तस्वीर
हालांकि, इसके बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में तस्वीर बदल गई। भाजपा ने 132 सीटें जीत लीं, जबकि शिवसेना को 57 सीटें मिलीं। मुख्यमंत्री पद भी एकनाथ शिंदे से निकलकर देवेंद्र फड़नवीस के पास चला गया और शिंदे को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। इसके साथ ही राज्य की राजनीति में शक्ति संतुलन भी बदल गया।
भाजपा अब बहुमत के लिए शिवसेना पर उतनी निर्भर नहीं थी। ऊपर से अजित पवार की एनसीपी के 41 विधायक भी महायुति सरकार को अतिरिक्त मजबूती दे रहे थे। इसके बावजूद राजनीतिक जानकार मानते हैं कि टीएमसी में संभावित टूट शिंदे के लिए नई चुनौती पैदा कर सकती है।
टीएमसी फूट का कैसा असर?
असल में, यदि टीएमसी के 20 सांसद एनडीए को समर्थन दे देते हैं तो संसद में भाजपा की स्थिति और मजबूत हो जाएगी। कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए पार्टी को अपने कुछ चुनिंदा सहयोगियों पर पहले जैसी निर्भरता नहीं रहेगी। ऐसे में शिंदे की राजनीतिक उपयोगिता और बारगेनिंग क्षमता प्रभावित हो सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि एकनाथ शिंदे खुद शिवसेना में विभाजन के बाद राजनीतिक रूप से मजबूत होकर उभरे थे। इसे कई विश्लेषक “महाराष्ट्र मॉडल” भी कहते हैं। अब कुछ वैसी ही स्थिति पश्चिम बंगाल में बनती दिखाई दे रही है जहां एक क्षेत्रीय दल कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। इसका अप्रत्यक्ष असर शिंदे की राजनीति पर पड़ सकता है।
शिंदे की अहमियत
अब तक संसद में भाजपा को शिंदे के सांसदों का खुला समर्थन मिलता रहा है। चाहे बात संविधान संशोधन से जुड़े विधेयकों की हो या ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसे प्रस्तावों की, शिवसेना लगातार एनडीए के साथ खड़ी रही है। इसी समर्थन ने गठबंधन को मजबूती दी है। लेकिन अगर टीएमसी का एक बड़ा धड़ा भी एनडीए के साथ आ जाता है तो शिंदे की बारगेनिंग पावर पहले जैसी नहीं रह सकती।
जानकारी के लिए बता दें कि एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस के रिश्ते कभी पूरी तरह सहज नहीं रहे हैं। जब शिंदे मुख्यमंत्री बने थे, तब भी सत्ता के बंटवारे को लेकर असहमति की चर्चाएं थीं। 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद यह खींचतान और स्पष्ट रूप से सामने आई।
नासिक और रायगढ़ जिलों में गार्जियन मंत्री नियुक्त करने के मुद्दे पर भी दोनों दलों के बीच विवाद हुआ था। स्थिति ऐसी बन गई थी कि नियुक्तियों पर रोक लगानी पड़ी। इसके अलावा कैबिनेट विस्तार, राज्य निगमों में नियुक्तियों और फंड आवंटन जैसे मुद्दों पर भी भाजपा और शिवसेना के बीच कई बार मतभेद देखने को मिले।
मनभेद और दिल्ली में समाधान
जब भी महाराष्ट्र में इस तरह के तनाव पैदा हुए, एकनाथ शिंदे अक्सर दिल्ली का रुख करते रहे। वे केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश करते थे। कई मौकों पर दिल्ली नेतृत्व ने दोनों दलों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई और विवादों को सुलझाने में मदद की।
यह व्यवस्था भाजपा और शिवसेना, दोनों के लिए फायदेमंद रही। एक ओर एनडीए की एकजुटता बनी रही, तो दूसरी ओर शिंदे को महाराष्ट्र से बाहर राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी पहचान मजबूत करने का अवसर मिला।
हालांकि, अब टीएमसी में संभावित बगावत की चर्चाओं के बीच राजनीतिक समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि बंगाल में भी वही स्थिति बनती है जो कभी शिवसेना में बनी थी तो आने वाले समय में शिंदे की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
हालांकि, शिवसेना के कुछ नेताओं ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में दावा किया है कि भाजपा गठबंधन धर्म का पालन करती रहेगी और सहयोगी दलों की राजनीतिक अहमियत को नजरअंदाज नहीं करेगी।
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