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चार साल में बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर पर यूं लिया यू-टर्न, पीडीपी से गठबंधन के वक्त कुछ और था एजेंडा

एजेंडा ऑफ अलायंस में उल्लेख है, "श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) सरकार ने "इन्सानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत" की भावना से हुर्रियत कॉन्फ्रेंस सहित सभी राजनीतिक समूहों के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू की थी।"

Author नई दिल्ली | July 4, 2019 4:47 PM
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती। (एक्सप्रेस फोटो-ताशी तोबग्याल)

साल 2015 में जब जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने के लिए बीजेपी और पीडीपी के बीच गठबंधन के लिए कई दौर की बातचीत के बाद डील पर अंतिम मुहर लग रही थी, तब वहां दोनों पक्षों से मात्र सात व्यक्ति ही मौजूद थे। बीजेपी की तरफ से पीएम मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमत शाह, महासचिव राम माधव और केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली थे जबकि पीडीपी की तरफ से मुफ्ती मोहम्मद सईद, महबूबा मुफ्ती और हसीब द्राबू थे। दोनों दलों के बीच गठबंधन के एजेंडे में इस बात का साफ उल्लेख किया गया था कि गठबंधन राज्य में शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगी और इस दिशा में पाकिस्तान और हुर्रियत से भी बातचीत करेगी।

एजेंडा ऑफ अलायंस में उल्लेख है, “श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) सरकार ने “इन्सानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत” की भावना से हुर्रियत कॉन्फ्रेंस सहित सभी राजनीतिक समूहों के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू की थी।” समझौते के तहत गठबंधन में बाधक विवादास्पद मुद्दों को परे रखने का फैसला किया गया था। इनमें अफस्पा पर सेना के साथ विचार विमर्श की बात कहकर मामले को टाला गया था। भाजपा का तर्क था कि यह सीधा सेना से जुड़ा मामला है।

अनुच्छेद 370 और 35A पर भी भाजपा यथा स्थिति बनाए रखने पर सहमत हुई थी। यानी एक तरह से भाजपा अफस्पा और अनुच्छेद 370 पर भाजपा पीडीपी के सामने झुक गई थी। दोनों दलों ने राज्य में अमन-चैन की बहाली को सबसे ऊपरी प्राथमिकताओं में रखा गया लेकिन पिछले चार सालों में जम्मू-कश्मीर में न तो कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार हो सका और न ही आतंकी घटनाओं पर लगाम लग सका।

2014 में 222 आतंकी घटनाएं हुई थीं जो बढ़कर 2018 में 614 हो गईं। इसी तरह 2014 में 47 जवान शहीद हुए थे जिनकी संख्या बढ़कर 2018 में 91 हो गई। 2014 में आतंकी घटनाओं में जहां 28 नागरिक मारे गए थे, उसकी संख्या बढ़कर 2018 में 38 हो गई। इनके अलावा आतंकी संगठनों से युवाओं के जुड़ने की घटनाएं बढ़ गईं। आतंकी घटनाओं की वजह से 70 फीसदी पंचायत चुनावों में मतदान नहीं हो सका।

पिछले साल जून में महबूबा मुफ्ती के इस्तीफे की वजह से वहां लगातार राज्यपाल और राष्ट्रपति शासन है। एक तरह से कहा जाय तो सीधे केंद्र सरकार का शासन है लेकिन वहां न तो जम्हूरियत, न कश्मीरियत और न ही इन्सानियत की भावना से शासन संचालित हो रहा है, जो अटल बिहारी वाजपेयी का सपना था। केंद्र वहां विधान सभा चुनाव को लगातार टाल रहा है। वहां जो कोई भी मानव अधिकारों की बात करता है, उसे ‘एंटी नेशनल’ कहा जाता है। आपसी बातचीत की प्रक्रिया ठंडे बस्ते में है, जबकि 2015 में हुर्रियत से भी बातचीत जारी रखने का फैसला किया गया था।

अनुच्छेद 370 और 35A पर भी बीजेपी संवैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ काम कर रही है। अमित शाह ने पिछले दिनों राज्य सभा में इसे अस्थाई करार दिया था। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कश्मीर में धारा 370 एक स्थायी प्रावधान बन चुकी है जिसे खत्म करना असंभव हो गया है। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि 2017 के एक मामले में वह पहले ही इस बहस को यह कहकर खत्म कर चुकी है कि धारा 370 अब संविधान का एक स्थायी हिस्सा है।

जस्टिस एके गोयल और जस्टिस आरएफ नरीमन की बेंच ने टिप्पणी की थी, धारा 370 एक अस्थायी प्रावधान के तहत लाई गई थी जिसे 26 जनवरी 1957 को जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के भंग होने के साथ ही खत्म हो जाना था लेकिन अब यह स्थाई हो चुका है, जिसे राज्य विधानसभा की अनुमति के बिना हटाना असंभव है।” अब जब केंद्र की बीजेपी सरकार राज्य से धारा 370 हटाना चाह रही है, जबकि राज्य में विधानसभा प्रभावी नहीं है।

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