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सपा के कमजोर चेहरे दे रहे भाजपा को ताकत

सुरेंद्र सिंघल देवबंद (सहारनपुर)। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरने के पीछे गैर भाजपाई दलों खासकर सत्तारूढ़ सपा के पास मजबूत धर्मनिरपेक्ष चेहरों के अभाव को खासतौर से जिम्मेदार माना जा रहा है। इसने सपा की चुनौती को बढ़ाने का काम किया है। उपचुनाव की 11 विधानसभा सीटों […]

Author Published on: October 4, 2014 8:21 AM

सुरेंद्र सिंघल

देवबंद (सहारनपुर)। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरने के पीछे गैर भाजपाई दलों खासकर सत्तारूढ़ सपा के पास मजबूत धर्मनिरपेक्ष चेहरों के अभाव को खासतौर से जिम्मेदार माना जा रहा है। इसने सपा की चुनौती को बढ़ाने का काम किया है।
उपचुनाव की 11 विधानसभा सीटों में से सपा आठ सीटें जीत गई थी। सारी सीटें उसने भाजपा से छीनी थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चार सीटों में से सपा बिजनौर और ठाकुरद्वारा पर ही जीत दर्ज कर पाई थी। यह भी तब जब बसपा मैदान में नहीं थी। ताकतवर सेकुलर चेहरों का अभाव सपा को खास तौर से खटक रहा है। उसकी यह कमी सहारनपुर उपचुनाव के दौरान सामने आई थी। जब मुलायम सिंह यादव को बाहर से दर्जन भर नेताओं को सहारनपुर भेजने को मजबूर होना पड़ा था। मुलायम सिंह यादव यही कसरत अब सहारनपुर मंडल की कैराना विधानसभा सीट के 15 अक्तूबर को होने वाले उपचुनाव में दोहराते दिख रहे हैं।

सहारनपुर उपचुनाव में सपा चुनाव भले ही हारी पर वहां उसकी उपलब्धि उसके उम्मीदवार संजय गर्ग के सेकुलर नेता के रूप में स्थापित होने में सामने आई। सपा आलाकमान को कैराना में बाहर से अपने कई प्रमुख नेताओं को भेजना पड़ा। जाहिर है, सपा स्थानीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला करने की हालत में नहीं है। अगर 2017 के विधानसभा के आम चुनावों तक उसकी यह कमी दूर नहीं होती है तो उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। तब उसके सामने ताकतवर बसपा की चुनौती भी होगी।

यही रणनीति उसकी 13 सितंबर को हुए 11 सीटों के उपचुनाव में सामने आई थी। सपा भले ही आठ सीटें भाजपा से छीनने में सफल रही। लेकिन उसमें उसकी मेहनत कम भाजपा की बड़ी गलतियां जिम्मेदार मानी गर्इं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट पट्टी में मुलायम सिंह यादव जनाधार नेताओं के अभाव में हमेशा ही बेअसर रहे हैं। यादवों की अनुपस्थिति भी उन्हें कमजोर साबित करती है। जाटों के अजित सिंह को छोड़कर भाजपा का रुख कर लेने से इस पूरे इलाके में सेकुलर ताकतें किनारे हो गई हैं। उपचुनावों के नतीजों से यह तो साबित हो गया है कि यह सपा ही है जो भाजपा को चुनौती देने की हालत में है। लेकिन सपा के पास स्थानीय स्तर पर विश्वसनीय सेकुलर नेताओं का अभाव है। उसकी मुसलिमों पर निर्भरता ज्यादा बढ़ जाती है और ध्रवीकरण का लाभ भाजपा को मिल जाता है।

उपचुनावों में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आगे बढ़कर सेकुलर चेहरों को सामने लाने की जो साहसिक पहल की उसके नतीजे सार्थक रहे। मुख्यमंत्री ने विवादास्पद नेता इमरान मसूद की छाया भी सपा पर नहीं पड़ने दी। उन्होंने इमरान का साथ लेने के सभी दबावों को दरकिनार करते हुए इमरान की सपा में एंट्री रोकी। यही वजह थी कि सपा हिंदू और मुसलिम दोनों वर्गोें का भरपूर समर्थन लेने में सफल रही। इसी भावना की कमी के कारण लोकसभा चुनाव में सहारनपुर नगर सीट पर सात हजार वोट भी नहीं ले पाई थी जबकि अब उसके उम्मीदवार संजय गर्ग के खाते में 82 हजार वोट जमा हो गए। संजय गर्ग भले ही न जीत सके हों लेकिन उन्हीं की वैश्य बिरादरी की रानी रुचि वीरा बिजनौर में सफल रही।

जाटों का सपा से मोहभंग है। जबकि मुलायम सिंह यादव ने पांच जाट नेताओं को अहम जिम्मेदारी दी हुई है। इसी तरह सरकार ने कई जनाधारहीन मुसलिमों को सरकारी पद देकर उपकृत किया हुआ है। महाराज सिंह डिग्री कालेज सहारनपुर के पूर्व प्राचार्य व राजनीतिक समीक्षक प्रोफेसर योगेश गुप्ता कहते हैं कि सामाजिक संतुलन और समन्वय के आधार के बिना सपा का मिशन 2017 पूरा होना संदिग्ध है। वे कहते हैं कि अगर सपा उपचुनाव में मिले नतीजों से सबक लेकर आगे बढ़ती है तो ही वह ताकतवर हो भाजपा के मुकाबले में खड़ी हो सकती है। गुप्ता के मुताबिक, सपा को दूसरे समुदायों के भरोसे लायक चेहरों को सामने लाना होगा।

उप चुनावों में सामाजिक समीकरणों के नए सिरे से आकार लेने से सपाइयों का उत्साहित होना स्वाभाविक है। इसे बरकरार रखकर ही सपा अगले चुनावों में अपनी सत्ता सलामत रख सकेगी नहीं तो उसे गद्दी भाजपा के लिए खाली करनी पड़ेगी।

चालीस फीसद मुसलिम मतदाताओं वाले सहारनपुर उपचुनाव में जिस तरह से मुसलिमों में उग्र तेवर रखने वाले इमरान मसूद और उसकी सियासत को नकारा है। उससे साफ संकेत मिला कि अगर चुनाव में सेकुलर छवि के नेता की मौजूदगी है तो वह हिंदू और मुसलिम दोनों समुदायों का समर्थन प्राप्त कर सकता है। लोकसभा चुनाव में सहारनपुर के रशीद मसूद को नकार चुके हैं। संसदीय सीट पर शाजान मसूद 50 हजार वोट ही ले पाए थे। अब अकेली सहारनपुर नगर सीट पर ही उसके वोटों का आंकड़ा 82 हजार तक पहुंच गया।

कैराना विधानसभा सीट के उपचुनाव में सपा ने चौधरी नाहिद हसन पर दांव लगाया है। वे लोकसभा चुनाव में इसी संसदीय सीट पर भाजपा के हुकम सिंह के हाथों हार चुके हैं। यह अलग बात है कि उनकी मां तबस्सुम बेगम 2009 का लोकसभा चुनाव आराम से जीत गई थीं। उनकी जीत की वजह उनका बसपा उम्मीदवार होना था। तब उन्हें मुसलिमों के साथ-साथ दलितों का भारी समर्थन मिला था। अब नाहिद को जिताने के लिए मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश सरकार के मंत्री ओमप्रकाश सिंह, प्रदेश सपा व्यापार सभा के अध्यक्ष गोपाल अग्रवाल समेत एक दर्जन प्रमुख बाहरी नेताओें की जिम्मेदारी लगाई है। उन सभी ने कैराना पहुंचकर मोर्चा संभाल लिया है। देखना है कि मुलायम सिंह की यह रणनीति कितनी कारगर रहती है।

 

 

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