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लोकसभा चुनाव के बाद से तीन सहयोगी छोड़ चुके हैं बीजेपी का साथ! जानें- अब किसकी हो सकती है बारी और क्यों?

हिंदू वोटबैंक के साथ ही भाजपा देश के विभिन्न जातीय वोटबैंक को भी टारगेट कर रही है और इसका असर भी दिख रहा है क्योंकि साल 2014 में उच्च हिंदू जातियों में से 47 फीसदी ने भाजपा को वोट दिया। 2019 के चुनावों में यही आंकड़ा 52 फीसदी हो गया।

Author नई दिल्ली | Updated: November 17, 2019 6:59 PM
आम चुनावों के बाद से 2 सहयोगी घटक दल एनडीए छोड़ चुके हैं। (पीटीआई/फाइल फोटो)

महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के बीच का गठबंधन टूट चुका है और सिर्फ औपचारिक ऐलान होना बाकी है। अब शिवसेना महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिशों में जुटी है। इस बीच संसद के शीतकालीन सत्र से पहले हुई एनडीए की बैठक से भी शिवसेना नदारद रही। एनडीए में शिवसेना अकेली ऐसी पार्टी नहीं है, जिसका बीजेपी से मोहभंग हुआ हो। 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से दो और दल भी एनडीए छोड़ चुके हैं। इनमें पहला नाम गोवा फॉरवर्ड पार्टी का है, जिसने प्रमोद सावंत के सीएम बनते ही गठबंधन से नाता तोड़ लिया। झारखंड में सीटों के बंटवारे से नाराज ‘आजसू’ ने भी डेढ़ दशक पुराना गठबंधन तोड़ लिया है।

हालिया चुनावों पर नजर डालें तो पता चलता है कि भाजपा अपने एनडीए के अन्य सहयोगियों से भी धीरे-धीरे दूरी बना रही है। केन्द्र में सहयोगी होने के बावजूद बीजेपी ने झारखंड में जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी से दूरी ही बरती। हालांकि ये दोनों दल 2014 में भी बीजेपी के साथ गठबंधन में नहीं थे। वहीं हरियाणा चुनावों में भी भाजपा ने शिरोमणि अकाली दल से अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया था।

क्या है सहयोगी दलों से भाजपा की दूरी की वजह?: भाजपा की पहचान एक हिंदुत्वादी पार्टी के तौर पर है। ऐसे में स्वभाविक तौर पर देश के अल्पसंख्यकों मुस्लिम, सिख और ईसाई वोटबैंक में भाजपा की संभावना बेहद कम हो जाती है। ऐसे में भविष्य में अपने को और मजबूत करने और सत्ता को बचाए रखने के लिए भाजपा को देश के हिंदू वोटबैंक में ही अपना जनाधार और मजबूत करना होगा। इस स्थिति में भाजपा के सहयोगी दल उसके आड़े आ रहे हैं! जो कि उसके वोटबैंक को शेयर करते हैं। ऐसे में राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस वजह से भी भाजपा धीरे-धीरे अपने सहयोगी दलों से दूरी बना रही है, ताकि पूरे हिंदू वोटबैंक को अपने पाले में कर सके!

भाजपा का हिंदू वोटबैंक बढ़ाः द क्विंट ने लोकनीति-CSDS के सर्वे के हवाले से अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि 2014 के आम चुनावों में भाजपा को 36 फीसदी हिंदुओं के वोट मिले थे, जबकि 2019 में यह आंकड़ा 44 फीसदी तक पहुंच गया है। इस दौरान भाजपा के घटक दलों को हिंदुओं के 7-8 फीसदी वोट ही मिले।

जातीय वोटबैंक में भी भाजपा लगा रही सेंधः हिंदू वोटबैंक के साथ ही भाजपा देश के विभिन्न जातीय वोटबैंक को भी टारगेट कर रही है और इसका असर भी दिख रहा है क्योंकि साल 2014 में उच्च हिंदू जातियों में से 47 फीसदी ने भाजपा को वोट दिया। 2019 के चुनावों में यही आंकड़ा 52 फीसदी हो गया। वहीं हिंदुओं की अनुसूचित जनजातियों में भी भाजपा का वोट शेयर 37 फीसदी से बढ़कर 44 फीसदी पहुंच गया है। हालांकि दलितों में अभी भी भाजपा की स्वीकार्यता में बहुत ज्यादा उछाल नहीं आया है, लेकिन इसमें मामूली बढ़ोत्तरी जरुर हुई है।

महाराष्ट्र और बिहार को छोड़कर भाजपा की सहयोगी पार्टियों को गिनी-चुनी सीटें ही मिलती हैं। महाराष्ट्र और बिहार ही ऐसे राज्य हैं, जहां भाजपा को सहयोगी पार्टियों की जरुरत होती है। अब महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के बीच दूरी बढ़ ही गई है। भाजपा को उम्मीद है कि हिंदुत्ववादी छवि वाली शिवसेना को कांग्रेस के साथ जाने का नुकसान होगा और भाजपा को इससे लाभ मिल सकता है। गोवा फॉरवर्ड पार्टी का जनाधार बीजेपी से ज्यादा अलग नहीं है। इसी तरह झारखंड में आजसू का जनाधार ओबीसी और आदिवासी हैं। इन वर्गों में भी भाजपा की पैठ तेजी से बढ़ रही है।

अब किस दल से दूरी बनाएगी भाजपा?: एनडीए में गैर हिंदू वोटबैंक वाले दलों को फिलहाल भाजपा से खतरा नहीं है, चूंकि भाजपा की महत्वकांक्षाएं राष्ट्रव्यापी हैं और एक-दो राज्यों में गैर-हिंदू समुदाय के वोट उसका ज्यादा भला नहीं करेंगे। ऐसे में पंजाब के शिरोमणि अकाली दल, नागालैंड के एनडीपीपी और मेघालय की एनपीपी जैसी पार्टियों को अभी भाजपा से शायद ही कोई खतरा हो। AIADMK और PMK जैसी पार्टियां दक्षिण भारत की राजनैतिक पार्टियां हैं, जहां भाजपा का जनाधार बेहद कमजोर है। ऐसे में इन राज्यों में भाजपा अभी अकेले चुनाव मैदान में उतरने के बारे में शायद ही सोचे।

जाति विशेष की पार्टियों जैसे लोजपा, अपना दल, राजस्थान की आरएलपी, हरियाणा की जजपा, महाराष्ट्र की आरपीआई (अठावले) आदि का कुछ जातियों में ही दबदबा है। परंपरागत तौर पर भाजपा का इन जातियों में दबदबा कुछ कम है, ऐसे में भाजपा इन पार्टियों को भी अभी साथ लेकर ही चलेगी। जिन पार्टियों को अभी भाजपा से खतरा है, उनमें बिहार की ‘जनता दल यूनाइटेड’ और असम की ‘असम गण परिषद’ का नाम लिया जा सकता है, चूंकि ये दोनों ही पार्टियां बिहार और असम में खासा प्रभाव रखती हैं और दोनों पार्टियों का वोटबैंक भाजपा के वोटबैंक से बहुत ज्यादा भिन्न नहीं है, जिसके चलते भाजपा को इसमें संभावनाएं जरुर दिख रहीं होंगी। ऐसे में इन पार्टियों को लेकर भगवा पार्टी का, भविष्य में कैसा रवैया रहता है, यह देखने वाली बात होगी।

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