क्या किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना सही था?

दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ (आरएसएस) के मुखपत्र पंचजन्य में एक ओर जहां किरण बेदी को पार्टी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने पर प्रश्न खड़ा किया गया है, वहीं भाजपा से यह सवाल भी किया गया है कि क्या पार्टी को एकजुटता एवं योजना के अभाव […]

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पुड्डुचेरी की उपराज्यपाल (एलजी) किरण बेदी (File Photo)

दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ (आरएसएस) के मुखपत्र पंचजन्य में एक ओर जहां किरण बेदी को पार्टी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने पर प्रश्न खड़ा किया गया है, वहीं भाजपा से यह सवाल भी किया गया है कि क्या पार्टी को एकजुटता एवं योजना के अभाव और हर परिस्थिति में डटे रहने वाले कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का खामियाजा भुगतना पड़ा?

आरएसएस के मुखपत्र में एक लेख में कहा गया है कि पार्टी के लिए नतीजों की चिंता करने से ज्यादा चिंतन करने की जरूरत है। भाजपा नेताओं को इस बात का जवाब तो देना ही चाहिए कि उनके पास विचार की पताका और हर परिस्थिति में डटे रहने वाले कार्यकर्ताओं के अलावा और कौन सी पूंजी है?

मुखपत्र में एक अलग से लिखे गए लेख में कहा गया है, ‘‘सवाल यह भी है कि भाजपा क्यों हारी? क्या किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाना सही निर्णय था? अगर हर्षवर्द्धन या दिल्ली के किसी दूसरे नेता को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया जाता या बिना किसी को पेश किये ही चुनाव लड़ते तब क्या परिणाम अलग होते?’’

लेख में कहा गया है, ‘‘क्या मोदी सरकार के आठ माह के शासन की उपलब्धियों को दिल्ली भाजपा के नेता जनता तक पहुंचाने में नाकाम रहे या सिर्फ मोदी नाम के सहारे चुनाव जीतने की आस लगाए बैठे थे? या फिर संगठन में एकजुटता, रणनीति और सबसे जरूरी कार्यकर्ताओं की भावनाओं के सम्मान की कमी हार की वजह रही?’’

पांचजन्य के संपादक ने लिखा, ‘‘संगठन और सत्ता में यदि कुछ लोगों को ऐसा लगता था कि पार्टी उनकी समझ बूझ से कुलांचे भरने वाली मशीन है तो यह भ्रम इन नतीतों के बाद टूट जाना चाहिए। यह कार्यकर्ताओं की तपस्या और विचार में निष्ठा का परिणाम है कि भाजपा की जमीन नहीं हिली।’’

लेख में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा गया है, ‘‘क्या नेताओं ने अपनी अतिशय स्वीकार्यता को लेकर कोई भ्रम तो नहीं पाला। या फिर कहीं व्यक्गित स्वीकार्यता पर मुहर लगवाने का आग्रह सीमा से बाहर तो नहीं चला गया। इन विचारों को सोचना…खंगालना भाजपा की अपनी जिम्मेदारी है।’’

आरएसएस के मुखपत्र में लेख में संपादक ने कहा है, ‘‘व्यक्तिगत निष्ठाओं की राजनीति के दौर में भाजपा के लिए नतीजे सीटों के लिहाज से भले ही झटकेदार हों, मत प्रतिशत के लिहाज से हौसले तोड़ने वाले हर्गिज नहीं हैं।’’

लेख में कहा गया है, ‘‘चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए मंथन का दौर, कांग्रेस का सफाया तो मुफ्त पानी, बिजली, वाई फाई के वादों और दिल्लीवासियों की आकांक्षओं से उपजे सवालों पर उड़ान भरने को तैयार केजरीवाल सरकार से संदर्भित है।’’

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