कर्नाटक और तेलंगाना में होने वाले विधानसभा चुनाव भले ही अभी करीब दो साल दूर हैं। लेकिन इन राज्यों के लिए बीजेपी-आरएसएस ने चुनावी रणनीति बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं।

कर्नाटक और तेलंगाना विधानसभा चुनावों को सिर्फ राज्य स्तर की लड़ाई नहीं माना जा रहा बल्कि इन्हें 2029 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA के लिए ‘शक्ति प्रदर्शन’ के एक बड़े मौके के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, ये चुनाव दक्षिण भारत में बीजेपी-आरएसएस के लिए अपनी जड़ें मजबूत करने का आखिरी बड़ा मौका भी माने जा रहे हैं। खासकर ऐसे समय में जब केंद्र में लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी की तैयारी की जा रही है।

सूत्रों का कहना है कि इन चुनावों के जरिए बीजेपी हाल के वर्षों में क्षेत्रीय दलों से मुकाबले को लेकर सीखे गए राजनीतिक सबक को भी लागू करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि दक्षिण भारत में मजबूत पकड़ के बिना राष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय तक बढ़त हासिल करना मुश्किल होगा।

अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि पश्चिम बंगाल में सफलता और असम व पुडुचेरी में सत्ता बरकरार रखने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लगातार कर्नाटक और तेलंगाना दौरों को पार्टी के बढ़ते संगठनात्मक और चुनावी फोकस के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

मोदी-शाह की रणनीति

कर्नाटक में मोदी और शाह ने 9 मई को बेंगलुरु में लिंगायत समुदाय के बड़े नेता और वरिष्ठ बीजेपी नेता बी.एस. येदियुरप्पा की राजनीतिक विरासत को प्रमुखता से सामने रखा। दोनों नेताओं ने पार्टी कार्यकर्ताओं से ‘कर्नाटक में कमल खिलाने’ का आह्वान किया। बीएस येदियुरप्पा कर्नाटक के चार बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और राज्य में बीजेपी के सबसे प्रभावशाली लिंगायत चेहरों में गिने जाते हैं।

एक दिन बाद ही 10 मई 2024 को जब अभिनेता से राजनेता बने तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) चीफ विजय ने तमिलनाडु के सीएम पद की शपथ ले रहे थे। उसी दिन मोदी ने तेलंगाना का दौरा किया। 2014 में अलग राज्य बनने के बाद से बीजेपी अब तक यहां चुनावों में जीत हासिल नहीं कर सकी है। हैदराबाद में कई प्रोजेक्ट का उद्घाटन करने के बाद मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को यह याद दिलाया कि 2024 में हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी राज्य में सबसे कम (2) सीट जीत पाई थी और उनसे राज्य में ‘प्रचंड बहुमत’ के साथ बीजेपी सरकार बनाने को सुनिश्चित करने का आह्वान किया।

वहीं दूसरी तरफ आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने अप्रैल में तेलंगाना में संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के नाम पर एक मंदिर का उद्घाटन किया। हाल ही में 7 मई को दोनों राज्यों में पीएम मोदी के दौरे से पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कर्नाटक के चिक्कोडी गए थे। यह वह जगह है जहां 1930 में आरएसएस की पहली शाखा शुरू हुई थी। इसके अलावा मैसूरु में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने भारत में “जनसांख्यिकीय असंतुलन” (Demographic Imbalance) का मुद्दा भी उठाया।

भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हमेशा खुलकर कहा है कि ‘सनातन धर्म’ उनकी विचारधारा की बुनियाद है और इसे राष्ट्रवाद के समान माना जाता है। हालांकि, 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद तक ‘सनातन धर्म’ का इस्तेमाल मुख्य रूप से हिंदू संस्कृति और परंपराओं के व्यापक प्रतीक के रूप में राजनीतिक चर्चाओं में होता रहा। लेकिन 2023 में इसका राजनीतिक अर्थ और प्रभाव काफी बदल गया।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कई कार्यक्रमों में सनातन धर्म को ‘भारत का मूल स्वभाव’ बताया। वहीं, 2023 में DMK नेता उदयनिध स्टालिन द्वारा ‘सनातन धर्म के उन्मूलन’ संबंधी टिप्पणी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे INDIA गठबंधन को ‘सनातन-विरोधी’ ताकतों के रूप में पेश किया।

इसके बाद से ‘सनातन धर्म’ धीरे-धीरे RSS-BJP के लिए एक वैचारिक हथियार के रूप में उभरने लगा जिसके जरिए क्षेत्रीय राजनीतिक दलों और नेताओं को चुनौती देने की रणनीति तैयार की गई।

पुराना जुड़ाव

RSS का जन्मस्थान माने जाने वाले नागपुर से सटे कर्नाटक और तेलंगाना में संघ की संगठनात्मक जड़ें काफी पुरानी और मजबूत रही हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1925 में स्थापना के कुछ ही वर्षों बाद 1930 के दशक से इन दोनों राज्यों में सक्रिय रूप से काम शुरू कर दिया था। आज कर्नाटक और तेलंगाना संघ के मजबूत क्षेत्रीय गढ़ माने जाते हैं जहां हजारों दैनिक शाखाएं संचालित होती हैं।

RSS के मुताबिक, कर्नाटक में 4100 से ज्यादा और तेलंगाना में करीब 3400 शाखाएं हैं। सूत्रों का कहना है कि दक्षिण भारत में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए RSS-BJP की चुनावी रणनीति का आधार यही शाखाएं बनने जा रही हैं। संघ का दावा है कि 100 वर्षों में उसकी शाखाओं का नेटवर्क देशभर में लगभग 90000 तक पहुंच चुका है और 55000 से अधिक स्थानों पर उसकी मौजूदगी है।

एक अंदरूनी सूत्र ने बताया, ”आज के तेलंगाना क्षेत्र में संघ ऐतिहासिक रूप से बेहद सक्रिय रहा है। 1984 में जनसंघ नेता चंदुपटला जंग रेड्डी ने हनमकोंडा सीट से कांग्रेस के दिग्गज पी.वी. नरसिम्हा राव को हराया था जो सात साल बाद प्रधानमंत्री बने। यह राज्य में संघ की ताकत को दिखाता है।”

सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक में संघ की जड़ों की मजबूती इस बात से भी साबित होती है कि RSS के कई प्रमुख प्रचारक और नेता इसी राज्य से आते रहे हैं।

आरएसएस संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का परिवार तेलंगाना के निजामाबाद से जुड़ा था जबकि संघ के तीसरे सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस तेलुगु पृष्ठभूमि से थे। मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत के पूर्ववर्ती के. एस. सुदर्शन मैसूर से थे। वहीं पूर्व सरकार्यवाह एच.वी. शेषाद्रि वर्तमान सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और बीजेपी संगठन महासचिव बी.एल. संतोष की जड़ें भी कर्नाटक से जुड़ी हैं।

पुराने तौर-तरीके लेकिन नई शुरुआत

कर्नाटक में कथित जबरन धर्मांतरण ‘लव जिहाद’ और 2022 में मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनने को लेकर हुए विवाद जैसे मुद्दों के बीच ‘हिंदू जागरण’ के नाम पर समुदायों के ध्रुवीकरण ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव को दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जैसे तटीय इलाकों से आगे तक फैलाने में मदद की है।

संघ इस समय ओल्ड मैसूर क्षेत्र समेत पूरे कर्नाटक में अपनी जमीनी पकड़ मजबूत करने के लिए करीब 3000 जनसंपर्क और संवाद कार्यक्रम चला रहा है। वहीं तेलंगाना में पूर्व निजाम शासन से मुक्ति और भारतीय राष्ट्रवाद को केंद्र में रखकर संघ लगातार अपने अभियान का विस्तार कर रहा है। RSS के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में 10700 से ज्यादा स्वयंसेवकों के जरिए लगभग 25 लाख घरों तक पहुंच बनाई गई।

सूत्रों का कहना है कि हालिया चुनावों में NDA के प्रदर्शन, खासकर तमिलनाडु में बढ़े वोट शेयर में इन अभियानों का असर देखा गया है। ऐसे में ‘वंशवाद’ और ‘एंटी-सनातन’ जैसे मुद्दे आगामी कर्नाटक और तेलंगाना चुनावों में बीजेपी-आरएसएस अभियान के प्रमुख केंद्र बन सकते हैं।

एक सूत्र ने कहा, ”वंशवाद के मुद्दे ने भ्रष्टाचार और सत्ता विरोधी माहौल पर सवाल उठाने में मदद की। वहीं DMK के उदयनिधि स्टालिन, TMC के अभिषेक बनर्जी और कांग्रेस के गौरव गोगोई जैसे नेताओं के ‘सनातन-विरोधी’ बयानों पर फोकस करने से बीजेपी को ‘बाहरी पार्टी’ वाली छवि से बाहर निकलने में मदद मिली।”

सूत्रों के मुताबिक, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, उनके सहयोगी प्रियांक खड़गे और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के कुछ बयानों को भी आरएसएस-बीजेपी अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना सकती है।

एक अन्य सूत्र ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में स्थानीय मुद्दे भले बदल जाएं लेकिन पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में ‘सनातन धर्म’ नैरेटिव से मिले चुनावी सबक भविष्य की चुनावी रणनीतियों में अहम भूमिका निभाते रहेंगे।