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मोदी सरकार ने विदेश नीति को ‘रूमानियत’ से निकाल कर ‘व्यावहारिकता’ में पहुंचाया: राम माधव

माधव ने कहा, ‘हमें पाकिस्तान के साथ वार्ता करनी है, हम वार्ता करेंगे। मैं नहीं कह रहा हूं कि हमें वार्ता नहीं करनी चाहिए। हम अपनी शर्तों पर वार्ता करेंगे।’

Author हैदराबाद | July 24, 2016 9:45 PM
भाजपा के महासचिव राम माधव। (फाइल फोटो)

भाजपा के महासचिव राम माधव ने रविवार (24 जुलाई) को कहा कि मोदी सरकार ने भारत की विदेश नीति को पहले की ‘रूमानियत’ से निकाल कर ‘व्यावहारिकता’ में पहुंचाया है और केन्द्र पाकिस्तान के साथ बात करेगा, लेकिन ‘अपनी शर्तों’ पर। माधव ने गैर सरकारी संगठन ‘अवेयरनेस इन ऐक्शन’ की ओर से ‘लुक ईस्ट, ऐक्ट ईस्ट, व्हाट नेक्स्ट?’ विषय पर आयोजित एक चर्चा में कहा, ‘आज हम अपनी विदेश नीति में बहुत व्यावहारिक हैं, हम जानते हैं कि अपने पड़ोसियों से कैसे निबटा जाए। अमेरिका हमें सलाह देता है कि वार्ता ही एकमात्र विकल्प है। जब जरूरत होगी हमें वार्ता करेंगे, हमारे प्रधानमंत्री ‘मौनी स्वामी’ नहीं हैं। लेकिन हम अपनी शर्तों पर बात करेंगे।’ भाजपा महासचिव ने कहा, ‘हमने 1971 की जंग की जीत को 1973 के शिमला समझौते से कूटनीतिक हार में बदल दिया। यह व्यावहारिकता पर रूमानपरस्ती के कब्जे का एक क्लासिक मामला है। 90,000 से ज्यादा पाकिस्तानी युद्धबंदी, आपके पास पाकिस्तान से पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) को आजाद कराने का एक शानदार मौका था। लेकिन हम बिना बदले में कुछ पाए सभी को रिहा करने पर तैयार हो गए। हम 40 साल बाद भी जम्मू-कश्मीर में इसकी कीमत चुका रहे हैं।’

माधव ने कहा, ‘आज, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कहते हैं कि वह उस दिन का ख्वाब देख रहे हैं जब भारत का कश्मीर पाकिस्तान के कश्मीर के साथ जुड़ेगा, हमारी विदेश मंत्री उनका जवाब देंगी। यह व्यावहारिकता कहलाती है।’ माधव ने कहा, ‘हमें पाकिस्तान के साथ वार्ता करनी है, हम वार्ता करेंगे। मैं नहीं कह रहा हूं कि हमें वार्ता नहीं करनी चाहिए। हम अपनी शर्तों पर वार्ता करेंगे।’ भाजपा महासचिव ने कहा कि देशों को सामरिक संस्कृति की जरूरत होती है। माधव ने कहा, ‘बदकिस्मती से हमारे देश में सामरिक संस्कृति विकसित नहीं हो पाई है। चाहे यह पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते हों या चीन के साथ या किसी अन्य देश के साथ हमारे रिश्ते हों, हमारे सामरिक मुद्दे ज्यादा रूमानी या आदर्शवादी हैं।’ वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा, ‘आजादी के बाद हमने कुछ खास रूमानी विचारों में – पंचशील, निर्गुट आंदोलन और ‘हिंदी चीनी भाई भाई’ में यकीन किया। यह नारे हमारे लिए बेहद आकर्षक थे और हमने माना कि यह हमारी नीति होनी चाहिए। इसमें (इन नारों में) कोई गलती नहीं है।’

माधव ने कहा, ‘हमारे साथ यह समस्या रही कि ये नारे महज रणनीति नहीं नीति हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, आप रूमानी नहीं हो सकते और आप महज आदर्शवादी नहीं हो सकते। आपको व्यावहारिक होना होगा। आपको निष्ठुर व्यावहारिक होना होगा।’ उन्होंने कहा कि चीनी अपनी व्यवस्था को ‘चीनी विशेषताओं के साथ साम्यवाद’ बताते हैं, लेकिन यह वास्तव में साम्यवाद के भेष में राष्ट्रवाद है। माओ त्से तुंग को साम्यवादी सोवियत संघ से बैर था और उन्होंने देश के हितों के लिए 1971 में अमेरिका से दोस्ती की थी। माधव ने कहा कि इस तरह की व्यावहारिकता भारत के लिए जरूरी है। भाजपा नेता ने कहा, ‘हम मानते थे कि (शीतयुद्ध के दौरान) हम इस या उस गुट में शामिल नहीं हैं और हमारा अपना गुट – निर्गुट आंदोलन होना चाहिए। लेकिन हमारी रूमानियत आज भी जारी है। हमें इसे बदलना होगा। यह एक बेहद व्यावहारिक विदेश नीति होनी चाहिए। (दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री) नरसिंह राव ने अपने कार्यकाल में इसे बदलने का प्रयास किया था।’

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