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किताब में बीजेपी सांसद का दावा: टीम मोदी में अयोग्यों, चापलूसों की भरमार, मंत्री और साथी भी नहीं देते सही सलाह

बतौर स्वामी, "इनमें से कुछ तो मोटे तनख्वाह और भत्तों पर नियुक्त हुए हैं लेकिन असलियत में वो डरपोक अर्थशास्त्री हैं जो प्रधानमंत्री को वही चीजें बताते हैं जो वो सुनना चाहते हैं। यह देश को अंधेरे में रखने वाली भयावह स्थिति जैसी है।"

Author नई दिल्ली | Updated: September 11, 2019 3:40 PM
स्वामी ने अपनी किताब में लिखा है कि राजनीतिक तौर पर मुखर मोदी को अर्थव्यवस्था जैसे जटिल विषय पर अनिर्वाचित राजनीतिक सलाहकार और सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ता है। (फोटो-PTI)

पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टीम में अयोग्य और चापलूसों की भरमार है। स्वामी का दावा है कि पीएम मोदी के सहयोगी मंत्री और सलाहकार भी उन्हें न तो सही सलाह देते हैं और न ही उन्हें सच्चाई से रू-ब-रू कराते हैं। अपनी नई किताब ‘रिसेट: रिगेनिंग इंडियाज इकॉनोमिक लेगेसी’ में स्वामी ने लिखा है, “नरेंद्र मोदी अपने पूर्ववर्ती डॉ. मनमोहन सिंह से ठीक विपरीत हैं। माइक्रो इकॉनोमिक्स से तो ये अनौपचारिक रूप से परिचित हैं पर मैक्रो इकॉनोमिक्स के अंतर-क्षेत्रीय गतिशील पेचीदगियों से वो वाकिफ नहीं हैं। बावजूद इसके उन्होंने कठिन परिश्रम और जनमानस के बीच लोकप्रिय छवि के बलबुते बहुत सुधारात्मक कदम उठाए हैं। वो पैसे के मामले में ईमानदार हैं।”

‘द प्रिंट’ में छपे स्वामी की किताब के उद्धरण के मुताबिक, “शैक्षणिक रूप से आंशिक तौर पर पिछड़े होने की वजह से पीएम मोदी अपने दोस्तों और जड़हीन मंत्रियों पर ज्यादा निर्भर हैं, जो कभी उन्हें अर्थव्यवस्था के मसलों पर न तो सच्चाई बताते हैं और न ही उन्हें मैक्रो इकॉनोमिक्स की सही व्याख्या कर उन्हें उचित सलाह दे पाते हैं, जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है। इसी के बल पर इस आर्थिक संकट से पार पाया जा सकता है।”

बीजेपी सांसद ने लिखा है, “अयोग्य सलाहाकारों की वजह से ही हमने नोटबंदी और जीएसटी की वजह से कई परेशानियां देखी हैं। हालांकि, दोनों ने अर्थव्यवस्था की गति को तेज कर दिया है। लेकिन एक प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी एक दबंग शख्सियत हैं जो बिना राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के जीतते रहे हैं।” स्वामी ने अपनी किताब में लिखा है कि राजनीतिक तौर पर मुखर मोदी को अर्थव्यवस्था जैसे जटिल विषय पर अनिर्वाचित राजनीतिक सलाहकार और सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनके बारे में वो भी बहुत कम जानते हैं।

बतौर स्वामी, “इनमें से कुछ तो मोटी तनख्वाह और भत्तों पर नियुक्त हुए हैं लेकिन असलियत में वो डरपोक अर्थशास्त्री हैं जो प्रधानमंत्री को वही चीजें बताते हैं जो वो सुनना चाहते हैं। यह देश को अंधेरे में रखने वाली भयावह स्थिति जैसी है।” रूपा पब्लिकेशन से प्रकाशित  सुब्रमण्यम स्वामी की इस किताब का लोकार्पण 30 सितंबर को मुंबई में किया जाएगा।

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