पंजाब विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हरियाणा में पार्टी की सफलता के रणनीतिकार माने जाने वाले सतीश पूनिया पर भरोसा जताया है। राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किए जाने के अगले ही दिन पूनिया को पंजाब का प्रभारी बनाया गया।

राजस्थान के रहने वाले और राज्यसभा सांसद पूनिया (61) को हरियाणा के प्रभारी पद पर भी बरकरार रखा गया है।

हरियाणा विधानसभा चुनाव में हासिल की सफलता

पूनिया को 2024 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों से पहले जुलाई 2023 में हरियाणा का प्रभारी नियुक्त किया गया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन में गिरावट आई और वह राज्य की 10 में से केवल 5 सीटें ही जीत सकी, जबकि 2019 में उसने सभी 10 सीटों पर जीत दर्ज कर क्लीन स्वीप किया था। हालांकि, कुछ ही महीनों बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने वापसी करते हुए 90 में से 48 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया।

हरियाणा में भाजपा की जीत में उनकी भूमिका के लिए बाद में पार्टी के भीतर पूनिया की सराहना की गई। उन्होंने इस सफलता का श्रेय बेहतर चुनाव प्रबंधन, प्रभावी अभियान रणनीति और सही उम्मीदवारों के चयन को दिया। साथ ही, उन्होंने नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाए जाने के पार्टी के फैसले को भी जीत में अहम बताया।

एबीवीपी से राजनीतिक सफर की शुरुआत

पूनिया ने 1982 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के साथ अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और बाद में राजस्थान में भाजपा के युवा मोर्चा में सांगठनिक जिम्मेदारियां संभालीं। वह 2019 में राजस्थान भाजपा के अध्यक्ष बने और मार्च 2023 तक इस पद पर रहे। उन्होंने 2018 में आमेर विधानसभा सीट जीती और बाद में राजस्थान विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष के रूप में कार्य किया। हालांकि, 2023 के विधानसभा चुनावों में, राजस्थान में भाजपा की सत्ता में वापसी के बावजूद वह आमेर से चुनाव हार गए।

आगे की चुनौतियाँ

हरियाणा के मुकाबले पंजाब में भाजपा के सामने कहीं अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां हैं। 117 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी के फिलहाल केवल दो विधायक हैं और पंजाब से उसका एक भी लोकसभा सांसद नहीं है। हालांकि, राज्यसभा में भाजपा की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत है। पंजाब से उसके सात राज्यसभा सदस्य हैं, जिनमें से छह सांसद आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व नेता हैं, जो अप्रैल में एक साथ भाजपा में शामिल हुए थे। इनके अलावा चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के मालिक और भाजपा द्वारा नामित सांसद सतनाम सिंह भी राज्यसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

पूनिया ऐसे समय में पंजाब की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जब भाजपा अपने पारंपरिक शहरी आधार से आगे बढ़कर ग्रामीण और अन्य क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर शिरोमणि अकाली दल के राजग से अलग होने के बाद पार्टी को राज्य में अपना संगठनात्मक आधार नए सिरे से मजबूत करना पड़ा है। ऐसे में भाजपा का लक्ष्य व्यापक जनाधार तैयार करने के साथ-साथ राज्य में अपनी राजनीतिक पहुंच का विस्तार करना है।

भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन को लेकर एक बार फिर अटकलें तेज हैं। हालांकि, दोनों दलों ने अब तक यही कहा है कि वे आगामी विधानसभा चुनाव अपने-अपने दम पर लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

पूनिया के लिए पंजाब की जिम्मेदारी एक तरह से राजनीतिक घर-वापसी भी है। उन्होंने 2004 से 2014 तक भाजपा के पंजाब प्रभारी के रूप में कार्य किया, यह वह दौर था जिसके दौरान अकाली-भाजपा गठबंधन ने 2007 और 2012 में सरकारें बनाई थीं। एक वरिष्ठ पार्टी नेता ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “लगभग 12 साल बाद, पूनिया उस राज्य में वापस लौट रहे हैं जहां भाजपा खुद को एक स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है।”

हालांकि, भाजपा के सामने चुनौतियां केवल चुनावी समीकरणों तक सीमित नहीं हैं। पंजाब में संयुक्त किसान मोर्चा और किसान मजदूर मोर्चा के बैनर तले कई किसान संगठन अब भी सक्रिय हैं और किसान आंदोलन का राज्य की राजनीति पर खासा प्रभाव है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ते हुए किसानों के साथ भाजपा के संबंधों को बेहतर बनाना और उनका भरोसा जीतना पूनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा।

पार्टी के भीतर आंतरिक उथल-पुथल भी एक चुनौती है। पंजाब में भाजपा के पुराने नेताओं के एक वर्ग ने पार्टी के भीतर “कांग्रेस संस्कृति” के बढ़ते प्रभाव पर बार-बार असहजता व्यक्त की है, खासकर प्रमुख संगठनात्मक और राजनीतिक पदों पर कई पूर्व कांग्रेस नेताओं को शामिल किए जाने के बाद।

पूनिया की पंजाब प्रभारी के रूप में नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब जून 2025 में अहमदाबाद विमान हादसे में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के निधन के बाद यह पद खाली हो गया था। इसके बाद नरिंदर सिंह रैना ने सह-प्रभारी के तौर पर पंजाब की जिम्मेदारी संभाली थी, लेकिन अब उन्हें इस दायित्व से मुक्त कर दिया गया है।

राजस्थान के राजपूत समुदाय से आने वाले पूनिया अकेले ऐसे भाजपा नेता नहीं हैं जिन्हें कोई प्रमुख संगठनात्मक जिम्मेदारी मिली है। इस साल जून में मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए पूर्व राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ को गुजरात का प्रभारी नियुक्त किया गया है, जबकि राज्यसभा सांसद विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है।

यह भी पढ़ें- सतीश पूनिया के अलावा और किन दो चेहरें को दी गई जिम्मेदारी।

बता दें कि साल 2027 के शुरुआती महीनों में उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनाव होने हैं, जबकि गुजरात के विधानसभा चुनाव 2027 के अंत में होंगे। तीनों ही राज्यों में नए चुनाव प्रभारियों की नियुक्तियों को भाजपा की चुनावी तैयारियों को मजबूत करने के तौर पर देखा जा रहा है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें