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बंगाल में ममता से दोस्ती भारी पड़ रही भाजपा को

भारतीय जनता पार्टी के भीतर जमकर चल रही गुटबाजी, तृणमूल कांग्रेस की ओर अनुमानित झुकाव और हाल में हुए निकाय चुनाव में बेहद खराब प्रदर्शन को देखते हुए पश्चिम बंगाल...
Author July 1, 2015 09:19 am
भाजपा को निकाय चुनाव में राज्य के 2090 वॉर्ड में से सिर्फ चार फीसद सीटों पर ही जीत मिली। (एक्सप्रेस फ़ोटो)

भारतीय जनता पार्टी के भीतर जमकर चल रही गुटबाजी, तृणमूल कांग्रेस की ओर अनुमानित झुकाव और हाल में हुए निकाय चुनाव में बेहद खराब प्रदर्शन को देखते हुए पश्चिम बंगाल में भाजपा की लोकप्रियता घटती नजर आ रही है। हालत लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी की ओर से बढ़-चढ़ कर किए गए दावे के बिल्कुल उलट है। पिछले साल लोकसभा चुनाव में पार्टी को राज्य में भी काफी लाभ मिला और 2009 के चुनाव की अपेक्षा वोट प्रतिशत छह फीसद बढ़ कर 16.8 हो गया था।

लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद भाजपा नेता बड़बोलापन अपनाते हुए अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने का दावा तक कर डाला। भाजपा को पिछले साल सितंबर में छोटी सी सफलता तब मिली थी, जब बसीरहाट (दक्षिण) उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी शामिक भट्टाचार्य ने जीत हासिल की। राज्य विधानसभा में 15 साल बाद भाजपा का कोई विधायक चुना गया था। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और दूसरे नेता उसके बाद से ही दावा करने लगे थे कि राज्य में तृणमूल की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

सूत्रों के मुताबिक राज्य में खुद को तृणमूल के एकमात्र विकल्प के रूप में जोरदार तरीके से पेश कर रही भाजपा को निकाय चुनाव में राज्य के 2090 वॉर्ड में से सिर्फ चार फीसद सीटों पर ही जीत मिली। यहां तक कि पार्टी 91 निकयों में से एक पर भी जीत हासिल नहीं कर सकी। कोलकाता नगर निगम के 144 वार्डों में से सिर्फ सात पर जीत हासिल हुई। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि भाजपा ने राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर गंवा दिया है।

राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने भाजपा की राज्य में घट रही लोकप्रियता के पीछे सारदा चिटफंड घोटाले में कड़ा रुख अख्तियार न करने को बड़ा कारण बताया है। रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर चक्रवर्ती ने कहा कि भाजपा राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए सारदा घोटाले का इस्तेमाल कर सकती थी। हालांकि इस मामले में कमजोर रवैया अपनाने का ही पार्टी को खामियाजा भुगतना पड़ा है।

सारदा घोटाले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) की ओर से तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं और सांसदों की गिरफ्तारी और पूछताछ के बावजूद मामले में सीबीआइ जांच की रफ्तार काफी धीमी रही है। इस कारण भाजपा और तृणमूल के बीच सौदेबाजी ही संभावनाएं भी व्यक्त की गईं। प्रेक्षकों के अनुसार भाजपा की नीति सिर्फ तृणमूल की गिरावट पर निर्भर रहने की रही, जिसका उसे उल्टा नुकसान ही हुआ।

राजनीतिक प्रेक्षक अनिल कुमार जना का मानना है कि शुरुआत में मुखर होने के बाद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने सारदा घोटाले पर चुप्पी साध ली। अनिल ने कहा कि इन सबसे अलग भाजपा को अहसास हो गया है कि ग्रामीण इलाकों में अपना आधार मजबूत किए बगैर वह राज्य में कभी भी राजनीतिक विकल्प नहीं बन सकती। इसलिए अपेक्षित आधार हासिल करने तक दल ने तृणमूल के साथ मौन समझौता कर लिया है।

दूसरी ओर, निकाय चुनाव में प्रत्याशियों के चयन को लेकर भाजपा में काफी घमासान देखने को मिला और चुनाव के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल निकला और कई भाजपा नेता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सराहना करते पाए गए।

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